Wednesday, 30 August 2023

‘कविता की अर्थवत्ता’ की तलाश : आलोचक जीवन सिंह की दृष्टि में


कविता आलोचना व पुस्तक समीक्षा से संबंधित वरिष्ठ समीक्षक जीवन सिंह की नई किताब इस वर्ष प्रकाशित हुई है ‘कविता की अर्थवत्ता’ नाम से। इस शिकायत के साथ कि पुस्तक समीक्षा को दोयम दर्जे की आलोचना मानकर संपादकगण पत्रिकाओं में उन्हें सबसे अंतिम हिस्सों में डाल देते हैं। जबकि अपने देशकाल से संबद्ध रचना की समीक्षा भी देशकाल की परिस्थितियों के प्रभाव से स्वच्छंद नहीं रहती। उस पर समीक्षक की भाषा और विचारशीलता, जो देशकाल की परिस्थितियों से निर्मित होती है, का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। साहित्य क्षेत्र में किसी नई रचना का आगमन साहित्य की समृद्धि की सूचक है। इस सूचना को परिपक्व समालोचना की दृष्टि और हर्ष के साथ पत्रिकाओं के प्रारम्भिक हिस्से में रखना न्यायोचित होता। ज्ञात हो कि इस पुस्तक के प्रारम्भिक हिस्से में हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवियों की अतिप्रसिद्ध कविताओं के पुनर्पाठ के बाद का पूरा हिस्सा पुस्तक समीक्षा पर आधारित है, परंतु जीवन सिंह इन पुस्तक समीक्षाओं को आज की घोषित बेस्टसेलर किताबों के ‘बुक रिव्यू’ की परंपरा से अलग अच्छी और गंभीर विश्लेषणपरक पुस्तक समीक्षा मानते हैं, जिससे साहित्य में समीक्षा के नए मानदंड सृजित होते हैं। इस पुस्तक में भी कवियों की कविताओं के मूल्यांकन और उनकी अर्थमीमांसाओं का अध्ययन करने पर विशेष नए मूल्यों की ओर ध्यान आकर्षित होता है।   

पूरी पुस्तक दो खंडों में विभाजित है – प्रथम खंड, शब्दार्थ और दूसरा खंड, अर्थवत्ता नाम से। भारतीय काव्यशास्त्र में शब्दार्थ की महत्ता को दृष्टि में रखते हुए उन्होंने प्रथम खंड में हिंदी के कुछ प्रतिष्ठित कवियों की प्रसिद्ध कविताओं का पुनर्पाठ करते हुए उनके वास्तविक रचना-उत्पत्ति के कारणों के केंद्र की तलाश की है। इन कवियों में निराला की कविता ‘तोड़ती पत्थर’, ‘वनबेला’ और ‘महगू महंगा रहा’, नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके बाद’, केदारनाथ सिंह की कविता ‘भोजपुरी’ और विजेंद्र की कविता ‘कठफूला बाँस’ शामिल है। दूसरे खंड में उन्होंने अपने अध्ययन-क्रम में समय-समय पर प्रकाशित भिन्न आयुवर्ग के कवियों के काव्यसंग्रहों की पुस्तक समीक्षाओं को शामिल किया है। इन कवियों में नंद चतुर्वेदी, विजेंद्र, ऋतुराज, ज्ञानेन्द्रपति, अनिल गंगल, एकांत श्रीवास्तव, निर्मला पुतुल, केशव तिवारी, बलभद्र, महेशचंद्र पुनेठा, सुरेश सेन ‘निशांत’ और अविनाश मिश्र के एक-एक काव्यसंग्रहों की पुस्तक समीक्षा शामिल है। इस खंड के अंतर्गत ही रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, धूमिल, विष्णुचंद्र शर्मा और केदारनाथ सिंह की कविताओं पर लंबा आलेख भी है।

साहित्य में ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ की महत्ता का प्रतिपादन काव्यशास्त्र के महान आचार्यों ने शताब्दियों पहले ही कर दिया था, परंतु आधुनिक हिंदी साहित्य के मूल्यांकन के दौरान प्रायः पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को विशेष महत्त्व दिया गया। यह महज वैश्विक साहित्यिक प्रचलन के प्रभाववश ही था। वास्तव में किसी भाषा के साहित्य रूपों में प्रयुक्त शब्द उस भाषिक समाज के किन्हीं विशेष बोध का सूचक होता है। यह विशिष्ट बोध किसी जीवनदृष्टि का परिचायक हो सकता है। जीवन सिंह निराला की कविता ‘तोड़ती पत्थर’, ‘वनबेला’ और ‘महगू महंगा रहा’ में प्रयुक्त शब्द संरचना में निहित जीवन दृष्टियों को प्रकट करने का प्रयास करते हैं। ‘तोड़ती पत्थर’ कविता को वे ‘गुंफित कविता’ की संज्ञा देते हैं। जीवन सिंह इस कविता के पुनर्पाठ की मांग को पाठकों से गंभीरता से कहते हैं। अपने विश्लेषण में वे लिखते हैं कि निराला की इस कविता में ‘इलाहाबाद के पथ पर’ पद की प्रयुक्ति को साधारण बात नहीं है, बल्कि अपने स्थान-विशेष के प्रति कवि की सजगतापूर्ण चेतनदृष्टि का बोध है। किसी स्थान-विशेष में कर्मसौंदर्य में तल्लीन पेशेवर जातियों की दशा और उस स्थान के अर्थवैभव के बीच की खाई समाज के सत्ता-संरचना का प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध कराता है। इसी तरह ‘तरुमालिका अट्टालिका’ जैसे शब्द की प्रयुक्ति सड़क पर भरी दुपहरी पत्थर तोड़ने वाली स्त्री की दृष्टि में सामंती शोषण की प्रतिमूर्ति खड़ी करती है। अट्टालिकाओं का निर्माण श्रमिक वर्ग अपने श्रम से सींचकर करता है, परंतु उस पर उसका अधिकार रंचमात्र भी नहीं होता। इसलिए ‘अट्टालिका’ शब्द कभी भी श्रमिक के घर का पर्याय हो ही नहीं सकती। नंददुलारे वाजपेयी इस कविता में प्रयुक्त ‘अट्टालिका’ शब्द का निहित आशय इलाहाबाद में स्थित ‘आनंद भवन’ से जोड़कर इसका निहितार्थ राजनीतिक व्यंग्य के रूप में देखते हैं, जो जीवन सिंह का भी आशय है। आगे इसी कविता में प्रयुक्त ‘सजा सहज सितार’ शब्दपद जीवन सिंह को निराला के संगीत पक्ष की ओर विचार का तार जोड़ने का अवसर देता है, जो उपयुक्त ही है। कविता की यह पंक्ति उन्हें निराला की ‘बादल राग’ और ‘संध्या सुंदरी’ कविता का भी स्मरण कराती है। इन सभी कविताओं में संगीत का राग तत्व मौजूद है। वे लिखते हैं, “निराला स्वयं संगीत में इतने डूबे हुए थे कि जहां भी सहजता से कोई अवसर आता वहाँ वे संगीत के लिए स्थान निकाल लेते थे। बादल के साथ राग की कल्पना बादल-राग के रूप में निराला ही कर सकते थे। गर्जना और घनघोरता के साथ मृदुता का साहचर्य वे ही बिठा सकते थे” (जीवन सिंह, कविता की अर्थवत्ता, पृ. 20)  

   निराला का काव्य संघर्षशील और द्वन्द्वगत यथार्थ के मध्य सहजता और साहचर्य स्थापित करने का सूत्र बना। उनकी लंबी कविताओं में ‘तुलसीदास’, ‘राम की शक्तिपूजा’ इसी कोटि की श्रेष्ठ रचनाएं है। जीवन सिंह ने इन चर्चित लंबी कविताओं के क्रम में निराला की एक और लंबी कविता ‘वनबेला’ का नाम जोड़ा है, जो पाठकों के मध्य बहुत कम चर्चित है। उनके अनुसार यह लंबी भी जीवन की द्वन्द्वात्मकता को दृष्टिगत रखते हुए रची गई है। किसी भी कवि या रचनाकार का काव्य उसके देशगत परिस्थितियों और समाज संरचना की अनिवार्य छाप धारण किए रहता है। निराला का काव्यविकास भी अपने देश के भीतर काल-परिवर्तन के बावजूद जीवन-सौन्दर्य की महत्ता को छोड़ता नहीं, उसे मुखर रूप से अपनाता है। जीवन सिंह निराला की इन कविताओं का पुनर्पाठ करते हुए यह रेखांकित करते हैं कि “यह संयोग ही है कि तीनों क्लैसिक रचनाएं भारतीय इतिहास के विराट क्रम की तीन महत्वपूर्ण कड़ियाँ भी हैं। इनमें राम की कड़ी सबसे प्राचीन है, तुलसीदास की मध्यकालीन और वनबेला की आधुनिक । जीवन के संघर्ष और सौन्दर्य का क्रम और उसकी द्वन्द्वात्मकता तीनों कविताओं में है। तीनों का देश एक है, काल के संदर्भ भिन्न-भिन्न हैं”। (पृ. 29) ‘वनबेला’ कविता की विवेचना जीवन सिंह आधुनिक परिवेश और मूल्यों के आधार पर करते है। इस कविता का वस्तुतत्व अपने क्रमिक विकास के साथ नेहरुकालीन राजनीतिक अवमूल्यनों को केंद्र में रखता है। जीवन सिंह की राजनीतिक समझ और जानकारी इस लंबी कविता के अर्थ उद्घाटन में उपयोगी सिद्ध हुई है। नेहरू के राजनीतिक चरित्र की वर्तमान में अलग-अलग दृष्टिकोणों से काफी आलोचनाएं मौजूद हैं, तो उनके समर्थकों में उनके प्रगतिशील और आधुनिक विचारों के प्रति लगाव भी है लेकिन निराला की ‘वनबेला’ और ‘महगू महंगा रहा’ कविता में नेहरू के पाखंडपूर्ण व्यक्तित्व को व्यंग्य के माध्यम से प्रकट किया गया है। निराला समय के ‘गहन  अंधकार’ और ‘अमानिशा’ से बखूबी परिचित हैं। इसलिए उनमें इस भीषण अंधकार से उद्वेग और निराशा भी उत्पन्न होती है – “अन्याय जिधर है, उधर शक्ति”, तो दूसरी ओर प्रबल आशा का संचार भी है, जो बड़े शक्ति केंद्रों के दूसरे छोरों पर अपनी लघुता को अपनी ताकत बनाते हैं। निराला को इन लघुताओं पर भरोसा है। महगू सत्तासीन सामंती वर्गचरित्र से इतर निराला का मुख्य जनचरित्र है, जिसमें स्वाधीनता का गहनबोध है। वह भारत की गरीब और शोषित जनता के सजग नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है और उसे अपने वर्ग की ईमानदारी पर अभिमान है। यही भारतीयता की मुख्य जाति है। कविता के इस अर्थ का उद्घाटन यह पुस्तक प्रस्तुत करती है। इस दृष्टि इस पुस्तक में जीवन सिंह द्वारा निराला की इन कविताओं का चुनाव और उनकी भारतीय राजनीति से संबंधित विश्लेषण साहित्य अध्येताओं और निराला के पाठकों को उनकी कविताओं की गंभीर समझ से परिचित कराने में समर्थ है।   

‘अकाल और उसके बाद’ बाबा नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता है। जीवन सिंह इस कविता को जीवन क्रियाओं से निर्मित कविता मानते हैं। वे लिखते हैं कि यह कविता केवल अकालजन्य स्थितियों का ही बयान न होकर आम किसान और गरीब जीवन की सामान्य परिस्थितियों का चित्र है। इसे यदि अकाल की कविता न भी माना जाए तब भी यह अपना पूर्ण अर्थ भारतीय सामान्य किसान जीवन की बदहाली को पूर्णतया प्रकट करती है। जीवन जी ने नागार्जुन की इस कविता में प्रयुक्त क्रियाओं को कवि के जीवन व्यापार की लोक समझ से अर्जित बताया है। वे बाबा नागार्जुन की इस कविता की रचना शिल्प को किसी तार्किक दृष्टि से न देखकर उसे जीवन संबद्धता से जोड़कर देखते हैं। चूल्हे के रोने और चक्की के उदास होने को, चूल्हे के उदास होने और चक्की के रोने में नहीं बदला जा सकता। इसके पीछे वे लोक मान्यताओं और जीवनक्रम की सत्यता की दृष्टि को स्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि बाबा नागार्जुन अट्टालिकाओं में बैठकर जीवन व्यापार  पर टिप्पणियाँ देने वालों से अलग इन जीवन क्रियाओं के गहरे साधक रहे हैं।

इसी क्रम में केदारनाथ सिंह की ‘सृष्टि पर पहरा’ कविता-संग्रह की चर्चित कविता ‘भोजपुरी’ और विजेंद्र कुमार की कविता- संग्रह ‘कठफूला बाँस’ के संबंध में जीवन सिंह के विश्लेषणों को एक साथ देखें तो केदारनाथ सिंह की कविता ‘भोजपुरी’ के माध्यम से उन्होंने समाज में बढ़ रही भाषिक संकीर्णताओं को खत्म करने का बेहतर विकल्प तलाशा है, जिसमें केदार जी ने बोली और भाषा के अंतःसंबंधों को स्पष्ट किया है। जीवन जी की दृष्टि केदार और विजेंद्र की उन कविताओं की ओर जाकर रुकी, जिनमें बोली और भाषा, स्थानीयता और वैश्वीकता, गाँव और शहर के बीच के संबंधों और संघर्षों का एक विकल्प प्रस्तुत है। ‘भोजपुरी’ कविता में जहां बलिया और भोजपुरी का पुरबिहापन उभरकर सामने आता है, वहीं विजेंद्र की कविताओं का ब्रज क्षेत्र अपने जनपदीय विशेषताओं के साथ-साथ जनपदीय इतिहास की प्रमुखता के साथ आता है। ये कविताएं संकीर्णता के उलट उदार चेतना की व्यापकता का प्रसार करने में सक्षम हैं। इन कविताओं में ऐंद्रिक क्रियाएं सक्रिय मिलती हैं। विजेंद्र अपने स्थानीय बोध को देखे हुए दृश्यों में व्यक्त करते हैं। जिनमें एक विशिष्ट अर्थ उभरता है और कविता स्थानीय रंग के साथ प्रकट होती है।

कविता में स्थानीयता या जनपदीयता के तत्व देखकर जीवन सिंह आह्लादित जान पड़ते हैं। यह आह्लाद स्थानीय तत्वों के आगमन मात्र से अतिभावुकता पैदा नहीं करती, बल्कि स्थानीयता के तत्वों का वैश्विक प्रसार उन्हें आकर्षित करता है। उनकी आलोचना परिधि इन कविताओं के साथ वैश्विक उदारता के बिन्दु तक पहुँचती है। पुस्तक में सम्मिलित नई पीढ़ी के कवियों के संग्रहों की समीक्षाओं का बीज तत्व इन्हीं स्थानीयताओं की तलाश तक पहुँचती है। इन स्थानीयताओं के आलोक में लगभग सभी कवियों की कविताओं के केंद्र में मेहनतकश वर्ग और उसके कर्म के प्रति ईमानदारी जीवन सौन्दर्य का निर्माण करती है। इसलिए ये संग्रह और इनकी कविताएं जीवन और प्रेम की कविताएं है। जीवन सौन्दर्य की कविताएं रीति कविताओं के फ्रेम को तोड़ती हैं। इनमें मध्यमवर्गीय उलझन, तनाव, जटिलताएं न होकर, अभाव में जीवन जी रहे निम्नवर्गीय किसान और ग्रामीण जीवन के सहज सौन्दर्य का भाव प्रस्फुटित होता है। जीवन सिंह सुरेश सेन ‘निशांत’ की कविताओं को ‘प्यार में जीवित कविता’ की संज्ञा देते हैं और उनकी कविताओं में पहाड़ी जीवन के संकेतों की भरमार बताते हैं – “... उनकी कविताओं के अधिकतम रूपक धरती, पहाड़, नदी, पेड़, बीज और पहाड़ी औरत के उन संघर्षों और सामंजस्यों से बने हैं, जहां व्यक्ति एक पहाड़ी रूपक में बदल जाता है और पहाड़ स्वयं एक व्यक्ति का जीवन जीने लगता है”। (पृ.166) इन कविताओं से पहाड़ी जीवन के तत्वों को निकाल देने पर ये संवेदनशून्य हो जाएंगी। पहाड़ी जीवन पर आधारित कविताओं का ऐसा ही रूप महेशचंद्र पुनेठा की कविताओं में भी मिलता है। केदारनाथ सिंह के विषय में जिस पुरबिहापन को जीवन सिंह जनपदीय विशेषता के रूप में विश्लेषित करते हैं, वह केशव तिवारी की कविताओं में दूसरे विशिष्ट तरीके से आता है। इनकी कविताओं में अवध क्षेत्र की संस्कृति बहती मिलती है। चाहे वह दरवाजे पर घूम-घूमकर गीत गाने वाले जोगियों पर लिखी कविता हो, या दीपावली पर ‘खेत जगाने’ की प्रचलित प्रथा। केशव तिवारी जितने इन प्रथाओं से परिचित है, उससे कम जीवन सिंह नहीं हैं। वे इन प्रथाओं के बारे में विस्तार से पाठकों को परिचित कराते है। अवध क्षेत्र में प्रचलित ये प्रथाएं एक लोक संस्कार के रूप में प्रचलित हैं। ये प्रथाएं जीवन में उत्सव बढ़ाती है। उत्सवधर्मिता भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व है, जो केवल अवध क्षेत्र की ही विशेषता नहीं, बल्कि ऐसे तमाम जनपदीय संस्कारों की उपज है। आगे बलभद्र, एकांत श्रीवास्तव और ऋतुराज की कविताएं इसी क्रम में विवेचित हैं। अविनाश मिश्र की कविताओं में परिपक्व दृष्टि की तलाश एक छोटे लेख में किया गया है।

निर्मला पुतुल की कविताओं को जीवन सिंह दोहरी चुनौतियों से टकराते हुए देखते हैं। एक आदिवासी जीवन, दूसरे स्त्री- जीवन की चुनौतियाँ। प्रकृति का साहचर्य आदिवासी जीवन का प्राण है। वे निर्मला की कविताओं को वैश्वीकरण की वैश्विक चुनौतियों को उजागर करते देखते है। आदिवासियों की आजीविका का साधन जल, जंगल और जमीन केवल आजीविका का साधनमात्र न होकर उनके प्रेम, उत्सव और जीवन व्यापार का अंग है। नंद चतुर्वेदी और ज्ञानेंद्रपति अपनी कविताओं के माध्यम से गहन अंधकार से परिपूर्ण इन शताब्दियों में आशा का संचार करते हैं। मुख्य रूप से नंद बाबू की कविताएं इस कठिन दौर में बलवती आशा का पुंज बनकर आती है। उनकी अधिकांश कविताओं की शुरुआत समय की क्रूरताओं और उसके परिणामों से होती हुई आगी बढ़ती हैं, परंतु इस कविताओं का अंत प्रबल आशाओं का कोई न कोई सूक्त बना जाती हैं। इस पूरी पुस्तक में जीवन सिंह ने निराला, नागार्जुन, केदारनाथ सिंह आदि हिंदी के बड़े कवियों की कविताओं के माध्यम से जिस मेहनतकश वर्ग के जीवन सौंदर्य को स्थापित करने का प्रयास किया है, कमोबेश चयित सभी संग्रहों का स्वर अपनी विशिष्टताओं के साथ उसी वर्ग के साथ रही है। अन्याय अत्याचार के प्रति सच्ची हिंदी कविता का पक्ष सदैव स्पष्ट रहा है। जीवन सिंह की इस आलोचना पुस्तक को सैद्धांतिक आलोचना के मानकों से देखने के बजाय लोक चेतना संपन्न व्यावहारिक आलोचना का सशक्त उदाहरण माने जाने में कोई हिचक नहीं। निश्चित रूप से यह आलोचना पुस्तक हिंदी कविता के पाठक वर्ग को राजनीतिक और भारतीयता के रूपों से समृद्ध करेगी। जितनी आलोचना है, उतनी ही रचनात्मकता भी है यहाँ।

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कविता की अर्थवत्ता : जीवन सिंह, प्रकाशककौटिल्य बुक्स, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण : 2021, कुल पृ.सं. 194

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आशीष कुमार तिवारी, शोध छात्र, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, 202001, मो. 7905429287

Monday, 28 August 2023

जीवन के प्रति अनुराग मात्र संघर्ष से ही सम्भव है

जीवन संघर्ष में पलता है। संघर्ष से जीवन में सौंदर्य का समावेश होता है,एक अनुराग पैदा होता है। संघर्ष में पला जीवन एक रसीली अनुभूति में डूबा होता है। जिसके स्मरण मात्र से एक दीर्घ स्वांस के साथ एक ऊर्जा भर जाती है। जिसका ताप मुख को ढाँप लेता है और नेत्र किसी अनन्त ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं। जीवन के प्रति अनुराग यहीं से उत्पन्न होता है। हम सभी को संघर्ष से प्रेम करना चाहिए,तब जीवन अपने आप सुगम हो जाएगा।
                               -आशीष कुमार तिवारी

मैं प्यार करता हूँ, पर मेरा प्रेम क्रूर है

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ऐसा अक्सर हो जाया करता था कि किसी-किसी बात को लेकर हम दोनों में बहुत देर तक झगड़ा हो जाता था। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि एक-दो दिन तक रूखी-सूखी नाराजगी से हमारी बात होती थी जिसका फार्मेट झगड़े वाला ही होता था। पर ये झगड़ा हमेशा ही एकपक्षीय होता था। जिसमें मैं आक्रामक होता था और वो रक्षात्मक। वो अपने आप को मारती हुई,घुटती हुई मेरी तमाम तरह की बातें सहती फिर भी विद्रोह का स्वर न निकलता। पर मैं चाहता था कि वो भी मुझ पर आरोप लगाये,मेरी गलतियों को उजागर करे,मुझपे चिल्लाये...पर वो ऐसा कुछ भी न करती। पर हाँ कभी-कभी मेरे आक्षेपों का प्रतिउत्तर देने के लिए उसकी आत्मा तड़प उठती और वो शुरुआत के पहले अक्षर पर ही सारा जोर डाल कर साँसे भरती और फिर सारे शब्दों को जैसे पी जाती। मैं आगे इंतज़ार  रहता कि आज मुझे अपने सभी अत्याचारों का प्रतिउत्तर मिलेगा परन्तु उसने मेरे इन उम्मीदों को कभी खरा न साबित होने दिया।मेरा उसके शब्दों को सुनने का इंतज़ार तब खत्म होता जब उसकी सारी प्रतिक्रिया,सारे शब्द उसकी आँसुओं की क्रमबद्धता के साथ बहने लगते। उन्हें देखकर ऐसा लगता मानों सारे वाक्य- विन्यास आँसुओं की क्रमबद्धता में सब कुछ कह देना चाहते हों। मेरे सारे आरोप,सारे झगड़े की जड़ वहीं समाप्त हो जाती। 

आज एक ऐसा ही दिन था जब मैंने अब तक का सबसे कठोर कदम उठाया। हम दोनों विश्वविद्यालय के ग्राउंड के किनारे लगे वृक्षो की छाया में थोड़ा ठंडापन महसूस करते हुए बैठे पर मेरे चेहरे की कठोरता को उसने शायद भांप लिया। वो समझ गयी थी कि मन में फिर किसी उष्णता को दबाना होगा अन्यथा सब जल कर नष्ट हो जाएगा। 
उसने पूछा-कैसे हो ?
मैंने बिना चेहरे का भाव बदले उस प्रश्न को अनसुना कर दिया।
"आज बहुत गर्मी है ना"
"मुझे नहीं पता" मैंने कहा।"
"खाना खाकर आये हो" उसने पूछा।
"कसम खाके आया हूँ"
"क्या"
"कि आज तुमसे सारे रिश्ते तोड़ दूंगा"

हालांकि मेरा ऐसा इरादा कभी न रहा लेकिन उसे अपने लिए तड़पता हुआ देखने की मुझे पता नहीं क्यों आदत सी हो गयी थी। मुझे अच्छा लगता जब वो मेरे लिए रोती,मेरे लिए घण्टों बैठकर मुझे निहारती। पता नहीं कैसा क्रूर हो चला था मेरा प्रेम। प्रेम ही कहेंगे क्योंकि उससे दूर जाने की मैं कभी सोच ही नही सकता था पर वो थी कि मेरी क्रूरता में भी अपने लिये प्यार ढूंढ लेती थी। 

मेरे इस तरह के निरर्थक वार्तालाप की जैसे उसे आदत सी पड़ गयी थी। उसने हँस के कहा-"कसम खाके आये हो कि मेरा साथ कभी नहीं छोड़ोगे....है ना।"
"नहीं आज के बाद कभी नहीं मिलूंगा ये कसम"

आज जैसे वो सब जानती थी कि बहुत सारी बातें कहूँगा मैं इसलिए उसने कोई लम्बी सांस भी न ली। मेरी बात सुनकर खामोश सी होकर मन्द-मन्द चलती हवाओं को महसूस करने की कोशिश वो करने लगी। वो मुझे दिखाना चाहती थी कि उसे सब खबर है मैं क्या कहना चाहता हूँ। हवाओं को महसूस करते हुए उसके आँखों से पानी की धार बहने लगी। मेरी नजर उसके चेहरे पर पहुंची तो मैं बड़ा निराश हुआ कि मैं आज कुछ भड़ास निकाल ही न पाया और ये अभी से शुरू हो गयी। मुझे ये उम्मीद न थी। पर आज वो धार बन्द होने का नाम न ले रही थी। दरसल आज मैं भी समझ गया था। उसके धैर्य का बाँध आज उसके बस में न था। आज उसने अपनी सहनशक्ति की सीमा मुझे बता दी। एक जोर कि रुँधी गले की आवाज़ निकली उसके मुंह से और वो अपना सर मेरे पैर पर रखकर रो पड़ी। मुझे लगता है वो रोने की आवाज़ आज मेरे परीक्षा लेने की सीमा थी। मैं इससे ज्यादा कुछ तकलीफ न दे सकता था। पता नहीं क्यों वो मुझे इतना प्यार कर रही थी। मेरी क्रूरता के बावजूद। उसकी पीड़ा देखकर मुझसे भी रहा न गया और मैं भी उसके रोने में शामिल हो गया। मुझे रोता देख कर उसने अपने को पता नहीं कैसे चुप करा लिया और मुझे चुप कराने लगी।

मैं हैरान हूँ उसके और अपने प्रेम के अंतर पर। मेरा क्रूर प्रेम उसकी संवेदना में धँसता जा रहा और उस धँसन से निकलने वाला खून मुझे राहत देता है। हाँ मेरा प्रेम निर्दयी है।
                            ....आशीष कुमार तिवारी

बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कोऊ नाहीं


काल्पनिक

चुनाव जीतने के लिए नेताजी जी ने बहुत संघर्ष किये,पार्टी कार्यालय के चक्कर पे चक्कर लगाते पाँव में बिवाई फूट चली थी पर कोई जुगत काम न आती थी। कोई रास्ता न सूझता दिखने पर उनकी आत्मा ने थक हार कर आह भरी-"हे राम!"।राम के उदार चरित्र और सहृदयता के विषय में तुलसीदास जी ने लिखा है-

ऐसे को उदार जग माहीं
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर,राम सरिस कोऊ नाहीं।

इस पंक्ति का ध्यान आते ही उन्होंने तय कर लिया कि वही पार्टी चुनाव में उनकी नैया पार लगाएगी जो राम की उदारता पर चल रही हो। बस फिर क्या था उन्होंने पुरानी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। पता लगाने पर मालुम चला कि "रामाधार पार्टी" पूरी की पूरी राम भरोसे ही चल रही है और देश में आजकल राम पर विश्वास प्रबल होता जा रहा है। इसलिये इस बार पार्टी के नियम कानून पक्के तरीके से निभा दिए तो जरूर जीतेंगे। 'बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर' को वे पार्टी का गाइडलाइन मानकर बड़ी सतर्कता से पालन करना शुरू कर दिए थे। उनकी आस्था राम पर प्रबल हो गयी क्योंकि इस बार चुनाव जनता नहीं बल्कि राम की उदारता जितायेगी। जनता  का क्या, जनता तो धोखेबाज होती है। उसने तो नेताजी के कैरियर से खिलवाड़ कर दिया था। प्रभु श्री राम के धैर्य,पराक्रम और तेजस्विता जैसे सारे गुण इन दीनों को देखकर द्रवित हो जाते थे और प्रभु को द्रवित करने के उद्देश्य से पार्टी के सभी कार्यकर्ता और नेता दीनता और सेवा-भावना से रहित होने का हरसम्भव प्रयास करते। प्रभु श्रीराम ने देखा कि इन दीनों का एकमात्र एजेंडा उनका नाम ही है-

एक भरोसो,एक बल,एक आस विसवास।

वे सचमुच द्रवित हो उठे और एक अजब सी लहर लेकर आये जिसमें सभी दीन नेताओं की नैया पार लगी। बोलो जय श्री राम।
 राजनीति एक ऐसा फार्मूला है जो योग्य महापुरुषों के डी एन ए को अपनी मजबूती और कमजोरी को साधने का अच्छा जरिया है। प्रभु के उदार चरित्र का लाभ राजनीति में वैसे ही है जैसे-चिट भी मेरी, पट भी मेरा। ऐसे में भला नेताजी को कौन हरा सकता था।
   आशीष कुमार तिवारी

जिसने बनाये सबके घर उसका कोई घर नहीं - चिट्ठी




हम फारबिसगंज, सिमराही, भुतहा,फुलपरास, दरभंगा मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, गोपालगंज ,कुशीनगर, गोरखपुर लखनऊ, कानपुर, आगरा, मथुरा होते हुए बस में भरकर दिल्ली आए थे। बस साल में दुइ बार घर जाते हैं। एक बार होली में, एक बार छठ में। बाकी समय प्रेमनगर, मोतीनगर, नेहरूनगर,करोलबाग, पटेलनगर, कर्मपुरा, से होते हुए रजौली गार्डन, राजा गार्डन से लेकर मोहन गार्डन और इधर शास्त्री नगर शाहदरा मंडोली, चुंगी, आदि जगहों पर काम करते रहे हैं। अप्रैल से धूप चढ़ जाती है। जुलाई तक मौसम गर्म रहता है। अपना काम लेबर-मिस्त्री का है। काम 9 बजे दिन से शाम 6 बजे तक चलता है। 2007 में लेबर को 170 रुपये मिलते थे, मिस्त्री को कहीं 300 रूपये, तो कहीं 270 रुपये। लेबर चौक से बिककर काम पर जाने वाले थोड़ा ज्यादा कमा लेते थे। ओवर टाइम काम पर लगाने से ये लेबर मिस्त्री बहुत खुश होते थे। आठ बाई नौ वाले कमरे में चार से पांच लोग रात भर रहते थे। नगर निगम के शौचालय में लंबी लाइन लगी होती थी। मरद-जनाना एक ही साथ लंबी कतार में लगे रहते थे। पहले एक ही रुपये लेते थे, अब जमाना मंहगाई का है इसीलिए 5 लेते हैं । अगर नहाइयेगा तो 10 रुपये लेने लगे हैं।



दिल्ली बदल रही थी। शिला दीक्षित दिल्ली को चमका रही थी। कांग्रेस का हर तरफ बोलबाला था। गांधी परिवार की तूती बोलती थी। दिल्ली के कोने-कोने में पोस्टर बैनर दिखता था। पोस्टर में हंसते हुए नेताओं को देखकर हम मजदूरों को भी हंसी आती थी कि ये दिखाने के लिए हंस रहा है। पर ऐसा नहीं था उनका जीवन भी वैसा ही था जैसे बाहर, वैसे अंदर। दरभंगा, सहरसा, कटिहार, भागलपुर से चलने वाली गाड़ियों में भीड़ बहुत होती थी। हम लोग यह मान कर चलते थे कि जिस बोगी में ऊपर में लोहे का रॉड लगा होता है,उसी में बैठना है। खड़ी गाड़ी में फस्ट क्लास वाली बोगी को झाँककर कई बार देखते थे। देखने के बाद डर भी जाते थे कि बाबू साहब लोग गाली न बक दें। स्वतंत्रता सैनानी से आते वक्त ट्रेन में कुछ हो या न हो, चादर या मजबूत गमछा जरूर लाते थे। ये इसलिए कि पैर रखने तक की जगह नहीं होती है। कुछ लोग साथ में अखबार भी लाते थे। जब पीड़ा असहनीय हो जाती थी  तो फिर क्या...डाल देते थे बाथरूम में अखबार और लेट्रिन वाली सीट को ढक देते थे...अंदर से लॉक...फिर देते रहो गालियां। तब तक कानपुर आ जाते थे। फिर सफर मात्र छह घण्टे का।
दूसरा उपाय यह होता था कि पैर जब खड़े-खड़े जबाब दे देते थे तो उसके बाद रॉड दोनों सिरे में गमछी फंसाकर बांध देते थे और झुलनी बनाकर कुछ देर लेट जाते थे। बाकी सवारी ऐसे लोगों को काबिल सवारी समझती थी।

   हम अपने ऐसे कई लोगों को जानते हैं, जो खुद तो आते ही थे,अब उनके बेटे भी शहर में लेबर-मजदूरी करने आने लगे हैं। पिता अब सीमेंट की बोरी चार मंजिल पर नहीं चढ़ा पाते हैं इसलिए साहब लोग गाली देते रहते थे। वे अब कम क्षमता वाले काम खोजकर करने लगे है। जब जवानी थी तो बड़े दमदार लेबर माने जाते थे। राजधानी दिल्ली ने उसे बूढ़ा होते देखा है। उनके अनुभवों में त्रासदी का महाख्यान छुपा है। वे अपने जवान होते बेटे को मजदूर बनते देखकर बहुत निराश हो जाते हैं। पर कर भी क्या सकता है..? व्यवस्था की मार पीढ़ियों तक दस्तक दे रही थी....इसकी आहट हर एक मजदूर को मालूम हो जाती थी।

पहले गांव में जमींदारों की नौकरी करते थे। दिन रात काम करने के बाद भी वे पांच पेट को भरने में असमर्थ हो जाते थे। शहर ने उसे चमरवा, दुसाधवा, हलखोरबा जाति सूचक गालियों से मुक्ति दिलाई। वह यहां महज़ मजदूर था....दिल को थोड़ी तसल्ली होती थी।दिल्ली,कलकत्ता हैदराबाद ने पहली बार इनको जाति सूचक गालियों से मुक्त किया पर एक प्रदेश सूचक गाली आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ती। साले बिहारी निठल्ले, तेरी ब....तेरी म... कामचोर इत्यादि गालियाँ सुनते हुए धीरे-धीरे कान को आदत पड़ जाती है। मैला आँचल का 'कालीचरण' और गोदान का 'गोबर' भले ही गांव जाकर दूसरे मंगला, रामबिलसा और दुखना के लिए मॉडन लगता हो पर उनकी भी टिप-टॉप शहरी बाबुओं द्वारा दी गई गालियों से गीली होकर दिखती रहती हैं।
 पता नहीं, सुनने में आया है कि दिल्ली बदल रही है...इन साहब लोगों की जुबान कितनी बदली है, यह आज भी मजदूरों को ही पता होगा।
यही गाली देने वाले साहब लोगों को जब पैसे की हवस सताती है तो विदेश चले जाते हैं और जब मौत दिखाई पड़ती है तो देश की ओर दौड़ते है


मंदिर मस्जिद करने वालों ने दिल्ली जलाया। दिल्ली जलने के साथ-साथ कई लोगों के अरमान भी जल गए। अब दिल जलाने वाली बीमारी ने इन मजदूरों को शहर से ही जुदा कर दिया। पुलिस तो हमेशा से मजदूरों पर ज़ुल्म घाटी रही हैं। उनकी गाली सुनने की आदत हर बिहारी मजदूरों को हो जाती है। कोरोना का कहर ने न सिर्फ उन्हें बेघर कर दिया है बल्कि उन्हें भूखे सोने पर भी मजबूर कर दिया है...कभी दशरथ मांझी इन्हीं व्यवस्थाओं से लड़ते हुए  पैदल चलकर दिल्ली आये थे, अब उन्हीं के वंशज दिल्ली से गया कि पहाड़ियों और गांवों में वापस लौट रहे हैं। व्यवस्था तब भी मजदूरों का गला घोंट रहा था। दिल्ली को संवारने वाले मजदूरों को दिल्ली ने बेघर कर दिया है।

"इस शहर में मजदूर जैसा दर-बदर कोई नहीं
जिसने बनाये सबके घर उसका कोई घर नहीं"

इनकी जीवन-यात्रा कितनी भयावह है, न व्यवस्था को पता है न ही अट्टालिकाओं में अट्टहास करने हुए रामायण का एपिसोड देखने वालों को।

रामलखन कुमार, शोधार्थी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय


पर्यावरण दिवस पर नन्हें पौधे का दर्द सुनो...


नन्हा हूँ.....एक पौधा हूँ....जरा सुन लो..
आशीष कुमार तिवारी


कल तक मैं ना जानें कहाँ था.....रात में अचानक बहुत तेज़ बारिश हुई। भींगती हुई मिट्टी की जिस्म में बारिश की नमीं पहुंची और उसमे दबा एक बीज आवरण तोड़कर कर अपनी ग्रन्थियों को विकसित करने लगा। जबसे वो आवरण टूटा है तब से मैं खुद को महसूस कर रहा हूँ। अचानक मेरे हाथ पंखों की तरह फैलने लगे। मुझे मज़ा आ रहा था ये जादुई विकास देखकर। भोर तक मैं खुद को पूरी तरह महसूस करने लगा। भोर की ठण्डी-ठण्डी हवा सरक-सरक के मेरे नन्हें हाथों को सहलाने लगी....मैं हंसने लगा.....गुदगुदी होने लगी....तभी एक रौशनी की किरण मेरे ऊपर पड़ी। उस रोशनी से मुझे ऊर्जा मिल रही थी। सब कुछ नया था मेरे लिए। दूर-दूर तक मेरे जैसे कई उस रोशनी में डूबे दिख रहे थे। मैं नई दुनिया में आँखें खोल चुका था।
मैं खुद को अभी महसूस ही कर रहा था कि तबसे एक नन्हा बच्चा डगमग-डगमग चाल भरता हुआ कोमल पैरों से मेरी ओर आता दिखा। उसने मुझे देखा और खिलखिलाकर हंस पड़ा। उसकी हंसी से मैं भी फूटकर हंसने लगा पर मुझे नहीं मालुम कि इसे हंसना कहते हैं। लेकिन इसमें बहुत मज़ा था। हंसने के साथ मैंने महसूस किया कि इससे मैंने अपने सारे अंगों को जैसे जान लिया हो। मुझे अपनी जड़ भी महसूस हुई जो मिट्टी में धँसी थी। बच्चा नजदीक आकर मेरे पास बैठ गया और चिड़िया की सी आवाज़ में चहककर हंसने लगा और उसने मुझे छूने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। मैं बहुत डर गया...मैं जोर से चिल्लाया....बहुत रोया पर वो नहीं मान रहा था। उसने मेरी पत्तियों को जब छुआ तो मैंने खुद को बहुत सिकोड़ लिया पर उसके नरम-नरम हाथों की छुअन मुझे बहुत अच्छी लगी। ये मेरे जीवन में किसी इंसानी स्पर्श का पहला अनुभव था। बच्चा तो मैं भी था। फिर मैंने अपने आप को उसकी छुअन के लिए फैला लिया। उसने मुझे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। बस मुझे छुए जा रहा था और खिलखिलाता जा रहा था। मैंने इंसान पहली बार देखा था और उसकी छुअन पहली बार महसूस किया। मुझे इस धरती से,इंसानों से प्रेम हो गया था। 

पर आज पहली बार मैंने अपनी कच्ची उम्र में ही कुछ ऐसे इंसानों को देखा जिनके हाथ हमारी प्रजातियों की छालों से भी ज्यादा कठोर और खुरदुरे थे, जिनके हाथों में इस्पात का हथियार था। वो दादा को काट रहे थे। दादा के शरीर से खून बह रहा था,दादा चिल्ला रहा था पर वे काटते जा रहे थे। मुझे लगा वो इंसान उस बच्चे से बहुत अलग थे जिनमें हँसी नहीं थी,जिनमे स्पर्श नहीं था। वो दादा के रक्त को इसलिए नहीं समझ पा रहे थे क्योंकि उनका खून इंसानों जैसा लाल नहीं था बल्कि सफेद था। मैं डर गया था इन इंसानों से....कहीं दूर भाग जाना चाहता था पर मुझे ये भी पहली दफा महसूस हुआ कि हम अपनी जड़ें नहीं छोड़ सकते पर इंसान छोड़ चुका है.........अब मेरी भी बारी आएगी....उस बच्चे को याद कर रहा हूँ जिसने मुझे छुआ था। काश वो आ जाता और मुझे हंसा के सारे दुख भुला देता.......इस पर्यावरण दिवस पर मेरे लिए कुछ उपाय कर देता हंसने का, गुदगुदाने का........

चाची तुम जीत गयी अपना अस्तित्व बचाने में....

आशीष कुमार तिवारी
                              ...........................
मैं लगभग पांच साल का रहा हूँगा जब मेरे चाचा कि शादी हुई थी। चाची जी के आने पर हम सभी भाई-बहन बहुत खुश थे। हम लोगों का पूरा दिन उनके आस-पास ही गुजरता था। वो भी हम सब को बड़े दुलार से अपने पास बैठाये रखती थी। यहां तक कि हम लोगों की अक्षर-पहचान शिक्षा भी उन्हीं के द्वारा सिखाई गयी। हालांकि चाची केवल कक्षा आठवीं तक ही पढ़ी थी पर बेसिक शिक्षा उनकी मजबूत थी। हम लोगों को गिनती,पहाड़ा और अंग्रेजी वर्णमाला का ज्ञान उन्हीं के द्वारा मिला। बचपन में बड़ा प्यार मिला था उनका,जो आज भी कभी-कभी याद आ जाता है जब वो हम लोगों से दूर दिल्ली में रह रही हैं।

हमारी चाची खूबसूरत थी और काफी पतली, पर मिज़ाज़ उनके काफी कड़े थे। शायद उनकी यह प्रवृति ही थी। आज से लगभग बीस साल पहले चाची की शादी हुई थी। चाची बताती थी कि शादी से पहले अपने घर उन्होंने दूरदर्शन पर जितनी फ़िल्में आती थीं,लगभग सब देखी थी और उनकी बात सच भी लगती थी क्योंकि जब टीवी पर कोई फ़िल्म आने लगती तो चाची महाभारत के संजय की तरह सारी घटना फ़िल्म के आगे बढने के पहले ही बताने लगती और जब तक फ़िल्म खत्म न हो जाती तब तक वो फ़िल्म के साथ -साथ चलती रहती-" देखो अब ये होगा.....देखो अब वो मारेगा..... देखो अब वो बचाएगा।" इस तरह से सारी फ़िल्म गुजरती। जिसमें हम कुछ न ठीक से देख पाते थे न ही कुछ सुन पाते थे। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि हमारे घर पहली बार टीवी आई थी वो भी चाची के साथ। इसलिए शायद वो हमें टीवी देखना सीखा भी रही थी।

आज सोचता हूँ तो बड़ा आश्चर्य होता है कि जिन दिनों की फ़िल्में देखकर चाची बड़ी हुई थी वो दौर शायद नाइनटीज़ की फिल्मों का था जिनमे रुमानियत, भावुकता, परिवार  और प्रेम पर ही सारी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। पर उनके अंदर की जागरूकता और विद्रोह की प्रवृत्ति को देखकर तो लगता है कि वो अपने दौर की महिलाओं से बहुत आगे की कसौटी थीं। चाची हमारी जुवान की भी बहुत कड़ी थी। शुरुआत में तो मेरी माँ और दादी से अदब से ही बात करती थी पर धीरे -धीरे समय के साथ अदब पीछे हटने लगा। बात चाहे कितनी भी सीधी क्यूँ ना हो, उस पर सही या गलत बीस लाइन जैसे उन्हें बोलना ही था और हर लाइन में किसी फ़िल्म की, किसी घटना या संवाद का रिफरेन्स जरूर आ जाता था जिसे वो अपनी बात की सार्थकता और पुष्टि के लिए जरूरी समझती थी।

कुछ भी था पर चाची तो चाची थी। चाचा हमारे शुरुआत से ही घर के दाने के आदी हो गए। बाहर शहर में जाकर नौकरी करना उन्हें अच्छा न लगता था क्योंकि उन्हें लगता था कि वो बस अधिकारी से कम के लिये बने ही नहीं हैं। इस भ्रम के टूटने पर कई बार उन्हें शहरों में नौकरी के लिए जाना ही पड़ा पर हर बार किसी न किसी का सिर फोड़कर ही वापस आते थे। समय के साथ-साथ खर्च बढते गए और अभावग्रस्तता के चलते वो धीरे-धीरे कुंठित होते गए।

चाची चाहती थी कि वो कहीं बाहर जाएँ और कमाएं क्योंकि उनका कहना था कि,-
" ब्याह के लाये हो तो खर्च उठाने की हिम्मत भी करो.....बच्चे बड़े हो रहे हैं उनके लिए खर्च कौन पूरा करेगा।"
पर चाचा थे कि सब अनसुना कर देते थे और चाची के जिद करने पर उनसे मारपीट भी करते थे। चाची के शरीर में बस प्राण सुरक्षित रखने भर को ही जान थी पर वो अपने अधिकार का हवाला देकर उनसे तब तक लड़ती थी जब तक चाचा थक नहीं जाते थे। चाचा ने चाची की बातों को अनसुना करने का एकमात्र रास्ता चुना कि जब ज्यादा बोले तो जीभर के पीट दो। जब चाचा मारपीट करते तो मेरी माँ,दादी और हम सब भी रोते-रोते चाचा से विनती करते कि बस करिये नही तो मर जायेगी। तब कहीं जाकर वो छोड़ते। बचपन में कुछ ऐसे बर्बर तरीके देखे हैं हम लोगों ने जिससे चाचा उनके साथ मारपीट करते थे जिसको याद करते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हम पूरे परिवार के लोग घण्टों चाची के होश में आने का इन्तज़ार करते पर उनके लिये कोई कुछ कर न सकता।

हमने चाची का जो जागरूक रुप देखा था, वो समय के साथ और प्रखर होने लगा और चाचा पूरी कोशिश के साथ लगे थे उसे खत्म करने में। पर पता नहीं कैसी चिंगारी लेकर वो पैदा हुई थी कि शांत होने का नाम ही नही लेती थी। अभावग्रस्तता के चलते चाची को बड़ी तकलीफ होती थी अपने जीवन को लेकर क्योंकि एक नए समय की महिला जो आधुनिकता की आहट को गंगा के किनारे के कछारी गाँवों से सुन रही थी,उसने कुछ सपने सजा रखे थे,अपना जीवन-स्तर अपने स्वाभिमान के साथ बनाये रखने के बारे में कुछ योजना बना रखी थी ,वो सब ध्वस्त होते जा रहे थे और वो अपनी उस विद्रोही प्रवृत्ति की वजह से उसे नष्ट होता न देख पा रही थी।


चाची ने धीरे -धीरे खुद को समायोजित करना भी शुरू कर दिया था पर बच्चों की जरूरतें उन्हें फिर उकसाती कि वो फिर चाचा से ज़िद करें नौकरी करने के लिए। जब चाची दूसरों के बच्चों को ढंग के कपड़े पहनते देखती तो अपने बच्चों को देखकर रो पड़ती। पापा जब हम भाई बहनों के लिए त्यौहारों पर कपड़े लाते तो चाचा के तीनों बच्चों को भी वैसे ही नए कपड़े लाते पर चाची को ये पसन्द न था कि किसी का दिया हुआ उनके बच्चे पहनें। इसलिये उन्होंने दादी से कहवा के पापा को मना करवा दिया कि कपड़े न लाया करें। इससे पापा बहुत दुखी भी हुए। जब हम नए कपड़े पहनते तो एक बार मन में संकोच जरूर आता कि वो बच्चे क्या सोचेंगे। इसीलिए मैं तो खासकर कभी जल्दी नए कपड़े पहनने में बड़ा दुखी होता था।

चाचा कि हिंसात्मक प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। बात -बात पर मारपीट करने लगे और चाची भी ये अन्याय सहन करने को तैयार न थी । उन्हें लगता था कि जब वो उनके जीवन के किसी काम के नहीं तो फिर उन्हें मारने का क्या हक.....। अब तक मैं इंटर में पहुंच चुका था। आये दिन इतनी मारपीट देखकर मन तो करता था कि चाचा को आज मैं भी पीटूं पर शरीर अभी बचपने जैसी ही थी। कई बार तो चाची बेहद परेशान होकर कहती कि बेटा जाओ आज पुलिस को बुला लाओ। पर चाचा की क्रुरता देखकर हम लोगो की कुछ करने की हिम्मत ही न पड़ती। चाची भी ये कहने के बाद फिर मौन हो जाती। उनकी तकलीफ का दिन आज भी याद है।


आज चाची को अपने बच्चों समेत दिल्ली में अपने भाई के यहां रहते साल भर से ऊपर हो गए हैं। जब चाचा का पागलपन बढ़ता ही जा रहा था, तब चाची समझ चुकी थी कि अब वो कभी-भी उनकी जान ले सकते हैं और असल बात ये है कि पन्द्रह वर्षों से अधिक की हिंसा से अपने आत्मबल को हारता देख उन्होंने घर त्यागने का निर्णय लिया। उनके उस स्वाभिमान की हत्या हो चुकी थी जिसे वो अपनी ताकत मानती थी। ये एक घर भीतर एक औरत की जंग थी जिसे अभावग्रस्तता और हिंसा ने मिलकर उसे जीवन को बचाने के लिए घर छोड़ने पर विवश कर दिया था। उन्होंने जो सपने देखे थे उनको वो जीना भी चाहती थी पर यहां उन सपनों के लिए कोई उम्मीद ,कोई जगह बचा न दिखाई देने पर,उन्हें यहां से जाना पड़ा। आज वो सम्मान से अपने बच्चों को दिल्ली में अच्छे स्कूल में पढ़ा भी रही हैं और खुद का स्वाभिमान बना भी रही हैं। हालांकि चाची काफी गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो गयी थी जिसकी वजह से किसी से उनकी बनती न थी पर चाची के जाने का दुःख मुझे आज भी है। उनकी सहायता में अपनी असमर्थता को आज भी ग्लानि भाव से देखता हूँ पर खुश भी हूँ कि उन्होंने खुद बचा लिया। विजयी हुई तुम चाची।

                        -आशीष कुमार तिवारी

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