Monday, 28 August 2023

पर्यावरण दिवस पर नन्हें पौधे का दर्द सुनो...


नन्हा हूँ.....एक पौधा हूँ....जरा सुन लो..
आशीष कुमार तिवारी


कल तक मैं ना जानें कहाँ था.....रात में अचानक बहुत तेज़ बारिश हुई। भींगती हुई मिट्टी की जिस्म में बारिश की नमीं पहुंची और उसमे दबा एक बीज आवरण तोड़कर कर अपनी ग्रन्थियों को विकसित करने लगा। जबसे वो आवरण टूटा है तब से मैं खुद को महसूस कर रहा हूँ। अचानक मेरे हाथ पंखों की तरह फैलने लगे। मुझे मज़ा आ रहा था ये जादुई विकास देखकर। भोर तक मैं खुद को पूरी तरह महसूस करने लगा। भोर की ठण्डी-ठण्डी हवा सरक-सरक के मेरे नन्हें हाथों को सहलाने लगी....मैं हंसने लगा.....गुदगुदी होने लगी....तभी एक रौशनी की किरण मेरे ऊपर पड़ी। उस रोशनी से मुझे ऊर्जा मिल रही थी। सब कुछ नया था मेरे लिए। दूर-दूर तक मेरे जैसे कई उस रोशनी में डूबे दिख रहे थे। मैं नई दुनिया में आँखें खोल चुका था।
मैं खुद को अभी महसूस ही कर रहा था कि तबसे एक नन्हा बच्चा डगमग-डगमग चाल भरता हुआ कोमल पैरों से मेरी ओर आता दिखा। उसने मुझे देखा और खिलखिलाकर हंस पड़ा। उसकी हंसी से मैं भी फूटकर हंसने लगा पर मुझे नहीं मालुम कि इसे हंसना कहते हैं। लेकिन इसमें बहुत मज़ा था। हंसने के साथ मैंने महसूस किया कि इससे मैंने अपने सारे अंगों को जैसे जान लिया हो। मुझे अपनी जड़ भी महसूस हुई जो मिट्टी में धँसी थी। बच्चा नजदीक आकर मेरे पास बैठ गया और चिड़िया की सी आवाज़ में चहककर हंसने लगा और उसने मुझे छूने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। मैं बहुत डर गया...मैं जोर से चिल्लाया....बहुत रोया पर वो नहीं मान रहा था। उसने मेरी पत्तियों को जब छुआ तो मैंने खुद को बहुत सिकोड़ लिया पर उसके नरम-नरम हाथों की छुअन मुझे बहुत अच्छी लगी। ये मेरे जीवन में किसी इंसानी स्पर्श का पहला अनुभव था। बच्चा तो मैं भी था। फिर मैंने अपने आप को उसकी छुअन के लिए फैला लिया। उसने मुझे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। बस मुझे छुए जा रहा था और खिलखिलाता जा रहा था। मैंने इंसान पहली बार देखा था और उसकी छुअन पहली बार महसूस किया। मुझे इस धरती से,इंसानों से प्रेम हो गया था। 

पर आज पहली बार मैंने अपनी कच्ची उम्र में ही कुछ ऐसे इंसानों को देखा जिनके हाथ हमारी प्रजातियों की छालों से भी ज्यादा कठोर और खुरदुरे थे, जिनके हाथों में इस्पात का हथियार था। वो दादा को काट रहे थे। दादा के शरीर से खून बह रहा था,दादा चिल्ला रहा था पर वे काटते जा रहे थे। मुझे लगा वो इंसान उस बच्चे से बहुत अलग थे जिनमें हँसी नहीं थी,जिनमे स्पर्श नहीं था। वो दादा के रक्त को इसलिए नहीं समझ पा रहे थे क्योंकि उनका खून इंसानों जैसा लाल नहीं था बल्कि सफेद था। मैं डर गया था इन इंसानों से....कहीं दूर भाग जाना चाहता था पर मुझे ये भी पहली दफा महसूस हुआ कि हम अपनी जड़ें नहीं छोड़ सकते पर इंसान छोड़ चुका है.........अब मेरी भी बारी आएगी....उस बच्चे को याद कर रहा हूँ जिसने मुझे छुआ था। काश वो आ जाता और मुझे हंसा के सारे दुख भुला देता.......इस पर्यावरण दिवस पर मेरे लिए कुछ उपाय कर देता हंसने का, गुदगुदाने का........

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