सच कभी उंगलियां थामने की
कोशिश करता है,
जैसे कोई नवजात शिशु
समस्त जातियों,पूर्वाग्रहों से
मुक्त होकर
थामता है किसी अनुभवी हाथ को
जिसमें जीवन के तमाम पहलुओं की
खुरदुराहट उभर आई हो।
सच वास्तव में खोजता है
किसी ऐसे अनुभवी का हाथ
जिसका पाला झूठ से बार-बार पड़ा हो
जिससे वो जान सके
उसका हर ठिकाना।
जब वो जीवन की ताल में
ताल मिलाता है
तो सबसे पहले
इंसानों के हाथ की
रेखाओं की तलाशी लेता है
जिसमें छुपे होते हैं
झूठ के तमाम मैले निशान
जिससे कि वो जान सके कि
उसका असली ठिकाना कहाँ है......
-आशीष कुमार तिवारी

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