आशीष कुमार तिवारी
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मैं लगभग पांच साल का रहा हूँगा जब मेरे चाचा कि शादी हुई थी। चाची जी के आने पर हम सभी भाई-बहन बहुत खुश थे। हम लोगों का पूरा दिन उनके आस-पास ही गुजरता था। वो भी हम सब को बड़े दुलार से अपने पास बैठाये रखती थी। यहां तक कि हम लोगों की अक्षर-पहचान शिक्षा भी उन्हीं के द्वारा सिखाई गयी। हालांकि चाची केवल कक्षा आठवीं तक ही पढ़ी थी पर बेसिक शिक्षा उनकी मजबूत थी। हम लोगों को गिनती,पहाड़ा और अंग्रेजी वर्णमाला का ज्ञान उन्हीं के द्वारा मिला। बचपन में बड़ा प्यार मिला था उनका,जो आज भी कभी-कभी याद आ जाता है जब वो हम लोगों से दूर दिल्ली में रह रही हैं।
हमारी चाची खूबसूरत थी और काफी पतली, पर मिज़ाज़ उनके काफी कड़े थे। शायद उनकी यह प्रवृति ही थी। आज से लगभग बीस साल पहले चाची की शादी हुई थी। चाची बताती थी कि शादी से पहले अपने घर उन्होंने दूरदर्शन पर जितनी फ़िल्में आती थीं,लगभग सब देखी थी और उनकी बात सच भी लगती थी क्योंकि जब टीवी पर कोई फ़िल्म आने लगती तो चाची महाभारत के संजय की तरह सारी घटना फ़िल्म के आगे बढने के पहले ही बताने लगती और जब तक फ़िल्म खत्म न हो जाती तब तक वो फ़िल्म के साथ -साथ चलती रहती-" देखो अब ये होगा.....देखो अब वो मारेगा..... देखो अब वो बचाएगा।" इस तरह से सारी फ़िल्म गुजरती। जिसमें हम कुछ न ठीक से देख पाते थे न ही कुछ सुन पाते थे। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि हमारे घर पहली बार टीवी आई थी वो भी चाची के साथ। इसलिए शायद वो हमें टीवी देखना सीखा भी रही थी।
आज सोचता हूँ तो बड़ा आश्चर्य होता है कि जिन दिनों की फ़िल्में देखकर चाची बड़ी हुई थी वो दौर शायद नाइनटीज़ की फिल्मों का था जिनमे रुमानियत, भावुकता, परिवार और प्रेम पर ही सारी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। पर उनके अंदर की जागरूकता और विद्रोह की प्रवृत्ति को देखकर तो लगता है कि वो अपने दौर की महिलाओं से बहुत आगे की कसौटी थीं। चाची हमारी जुवान की भी बहुत कड़ी थी। शुरुआत में तो मेरी माँ और दादी से अदब से ही बात करती थी पर धीरे -धीरे समय के साथ अदब पीछे हटने लगा। बात चाहे कितनी भी सीधी क्यूँ ना हो, उस पर सही या गलत बीस लाइन जैसे उन्हें बोलना ही था और हर लाइन में किसी फ़िल्म की, किसी घटना या संवाद का रिफरेन्स जरूर आ जाता था जिसे वो अपनी बात की सार्थकता और पुष्टि के लिए जरूरी समझती थी।
कुछ भी था पर चाची तो चाची थी। चाचा हमारे शुरुआत से ही घर के दाने के आदी हो गए। बाहर शहर में जाकर नौकरी करना उन्हें अच्छा न लगता था क्योंकि उन्हें लगता था कि वो बस अधिकारी से कम के लिये बने ही नहीं हैं। इस भ्रम के टूटने पर कई बार उन्हें शहरों में नौकरी के लिए जाना ही पड़ा पर हर बार किसी न किसी का सिर फोड़कर ही वापस आते थे। समय के साथ-साथ खर्च बढते गए और अभावग्रस्तता के चलते वो धीरे-धीरे कुंठित होते गए।
चाची चाहती थी कि वो कहीं बाहर जाएँ और कमाएं क्योंकि उनका कहना था कि,-
" ब्याह के लाये हो तो खर्च उठाने की हिम्मत भी करो.....बच्चे बड़े हो रहे हैं उनके लिए खर्च कौन पूरा करेगा।"
पर चाचा थे कि सब अनसुना कर देते थे और चाची के जिद करने पर उनसे मारपीट भी करते थे। चाची के शरीर में बस प्राण सुरक्षित रखने भर को ही जान थी पर वो अपने अधिकार का हवाला देकर उनसे तब तक लड़ती थी जब तक चाचा थक नहीं जाते थे। चाचा ने चाची की बातों को अनसुना करने का एकमात्र रास्ता चुना कि जब ज्यादा बोले तो जीभर के पीट दो। जब चाचा मारपीट करते तो मेरी माँ,दादी और हम सब भी रोते-रोते चाचा से विनती करते कि बस करिये नही तो मर जायेगी। तब कहीं जाकर वो छोड़ते। बचपन में कुछ ऐसे बर्बर तरीके देखे हैं हम लोगों ने जिससे चाचा उनके साथ मारपीट करते थे जिसको याद करते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हम पूरे परिवार के लोग घण्टों चाची के होश में आने का इन्तज़ार करते पर उनके लिये कोई कुछ कर न सकता।
हमने चाची का जो जागरूक रुप देखा था, वो समय के साथ और प्रखर होने लगा और चाचा पूरी कोशिश के साथ लगे थे उसे खत्म करने में। पर पता नहीं कैसी चिंगारी लेकर वो पैदा हुई थी कि शांत होने का नाम ही नही लेती थी। अभावग्रस्तता के चलते चाची को बड़ी तकलीफ होती थी अपने जीवन को लेकर क्योंकि एक नए समय की महिला जो आधुनिकता की आहट को गंगा के किनारे के कछारी गाँवों से सुन रही थी,उसने कुछ सपने सजा रखे थे,अपना जीवन-स्तर अपने स्वाभिमान के साथ बनाये रखने के बारे में कुछ योजना बना रखी थी ,वो सब ध्वस्त होते जा रहे थे और वो अपनी उस विद्रोही प्रवृत्ति की वजह से उसे नष्ट होता न देख पा रही थी।
चाची ने धीरे -धीरे खुद को समायोजित करना भी शुरू कर दिया था पर बच्चों की जरूरतें उन्हें फिर उकसाती कि वो फिर चाचा से ज़िद करें नौकरी करने के लिए। जब चाची दूसरों के बच्चों को ढंग के कपड़े पहनते देखती तो अपने बच्चों को देखकर रो पड़ती। पापा जब हम भाई बहनों के लिए त्यौहारों पर कपड़े लाते तो चाचा के तीनों बच्चों को भी वैसे ही नए कपड़े लाते पर चाची को ये पसन्द न था कि किसी का दिया हुआ उनके बच्चे पहनें। इसलिये उन्होंने दादी से कहवा के पापा को मना करवा दिया कि कपड़े न लाया करें। इससे पापा बहुत दुखी भी हुए। जब हम नए कपड़े पहनते तो एक बार मन में संकोच जरूर आता कि वो बच्चे क्या सोचेंगे। इसीलिए मैं तो खासकर कभी जल्दी नए कपड़े पहनने में बड़ा दुखी होता था।
चाचा कि हिंसात्मक प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। बात -बात पर मारपीट करने लगे और चाची भी ये अन्याय सहन करने को तैयार न थी । उन्हें लगता था कि जब वो उनके जीवन के किसी काम के नहीं तो फिर उन्हें मारने का क्या हक.....। अब तक मैं इंटर में पहुंच चुका था। आये दिन इतनी मारपीट देखकर मन तो करता था कि चाचा को आज मैं भी पीटूं पर शरीर अभी बचपने जैसी ही थी। कई बार तो चाची बेहद परेशान होकर कहती कि बेटा जाओ आज पुलिस को बुला लाओ। पर चाचा की क्रुरता देखकर हम लोगो की कुछ करने की हिम्मत ही न पड़ती। चाची भी ये कहने के बाद फिर मौन हो जाती। उनकी तकलीफ का दिन आज भी याद है।
आज चाची को अपने बच्चों समेत दिल्ली में अपने भाई के यहां रहते साल भर से ऊपर हो गए हैं। जब चाचा का पागलपन बढ़ता ही जा रहा था, तब चाची समझ चुकी थी कि अब वो कभी-भी उनकी जान ले सकते हैं और असल बात ये है कि पन्द्रह वर्षों से अधिक की हिंसा से अपने आत्मबल को हारता देख उन्होंने घर त्यागने का निर्णय लिया। उनके उस स्वाभिमान की हत्या हो चुकी थी जिसे वो अपनी ताकत मानती थी। ये एक घर भीतर एक औरत की जंग थी जिसे अभावग्रस्तता और हिंसा ने मिलकर उसे जीवन को बचाने के लिए घर छोड़ने पर विवश कर दिया था। उन्होंने जो सपने देखे थे उनको वो जीना भी चाहती थी पर यहां उन सपनों के लिए कोई उम्मीद ,कोई जगह बचा न दिखाई देने पर,उन्हें यहां से जाना पड़ा। आज वो सम्मान से अपने बच्चों को दिल्ली में अच्छे स्कूल में पढ़ा भी रही हैं और खुद का स्वाभिमान बना भी रही हैं। हालांकि चाची काफी गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो गयी थी जिसकी वजह से किसी से उनकी बनती न थी पर चाची के जाने का दुःख मुझे आज भी है। उनकी सहायता में अपनी असमर्थता को आज भी ग्लानि भाव से देखता हूँ पर खुश भी हूँ कि उन्होंने खुद बचा लिया। विजयी हुई तुम चाची।
-आशीष कुमार तिवारी
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मैं लगभग पांच साल का रहा हूँगा जब मेरे चाचा कि शादी हुई थी। चाची जी के आने पर हम सभी भाई-बहन बहुत खुश थे। हम लोगों का पूरा दिन उनके आस-पास ही गुजरता था। वो भी हम सब को बड़े दुलार से अपने पास बैठाये रखती थी। यहां तक कि हम लोगों की अक्षर-पहचान शिक्षा भी उन्हीं के द्वारा सिखाई गयी। हालांकि चाची केवल कक्षा आठवीं तक ही पढ़ी थी पर बेसिक शिक्षा उनकी मजबूत थी। हम लोगों को गिनती,पहाड़ा और अंग्रेजी वर्णमाला का ज्ञान उन्हीं के द्वारा मिला। बचपन में बड़ा प्यार मिला था उनका,जो आज भी कभी-कभी याद आ जाता है जब वो हम लोगों से दूर दिल्ली में रह रही हैं।
हमारी चाची खूबसूरत थी और काफी पतली, पर मिज़ाज़ उनके काफी कड़े थे। शायद उनकी यह प्रवृति ही थी। आज से लगभग बीस साल पहले चाची की शादी हुई थी। चाची बताती थी कि शादी से पहले अपने घर उन्होंने दूरदर्शन पर जितनी फ़िल्में आती थीं,लगभग सब देखी थी और उनकी बात सच भी लगती थी क्योंकि जब टीवी पर कोई फ़िल्म आने लगती तो चाची महाभारत के संजय की तरह सारी घटना फ़िल्म के आगे बढने के पहले ही बताने लगती और जब तक फ़िल्म खत्म न हो जाती तब तक वो फ़िल्म के साथ -साथ चलती रहती-" देखो अब ये होगा.....देखो अब वो मारेगा..... देखो अब वो बचाएगा।" इस तरह से सारी फ़िल्म गुजरती। जिसमें हम कुछ न ठीक से देख पाते थे न ही कुछ सुन पाते थे। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि हमारे घर पहली बार टीवी आई थी वो भी चाची के साथ। इसलिए शायद वो हमें टीवी देखना सीखा भी रही थी।
आज सोचता हूँ तो बड़ा आश्चर्य होता है कि जिन दिनों की फ़िल्में देखकर चाची बड़ी हुई थी वो दौर शायद नाइनटीज़ की फिल्मों का था जिनमे रुमानियत, भावुकता, परिवार और प्रेम पर ही सारी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। पर उनके अंदर की जागरूकता और विद्रोह की प्रवृत्ति को देखकर तो लगता है कि वो अपने दौर की महिलाओं से बहुत आगे की कसौटी थीं। चाची हमारी जुवान की भी बहुत कड़ी थी। शुरुआत में तो मेरी माँ और दादी से अदब से ही बात करती थी पर धीरे -धीरे समय के साथ अदब पीछे हटने लगा। बात चाहे कितनी भी सीधी क्यूँ ना हो, उस पर सही या गलत बीस लाइन जैसे उन्हें बोलना ही था और हर लाइन में किसी फ़िल्म की, किसी घटना या संवाद का रिफरेन्स जरूर आ जाता था जिसे वो अपनी बात की सार्थकता और पुष्टि के लिए जरूरी समझती थी।
कुछ भी था पर चाची तो चाची थी। चाचा हमारे शुरुआत से ही घर के दाने के आदी हो गए। बाहर शहर में जाकर नौकरी करना उन्हें अच्छा न लगता था क्योंकि उन्हें लगता था कि वो बस अधिकारी से कम के लिये बने ही नहीं हैं। इस भ्रम के टूटने पर कई बार उन्हें शहरों में नौकरी के लिए जाना ही पड़ा पर हर बार किसी न किसी का सिर फोड़कर ही वापस आते थे। समय के साथ-साथ खर्च बढते गए और अभावग्रस्तता के चलते वो धीरे-धीरे कुंठित होते गए।
चाची चाहती थी कि वो कहीं बाहर जाएँ और कमाएं क्योंकि उनका कहना था कि,-
" ब्याह के लाये हो तो खर्च उठाने की हिम्मत भी करो.....बच्चे बड़े हो रहे हैं उनके लिए खर्च कौन पूरा करेगा।"
पर चाचा थे कि सब अनसुना कर देते थे और चाची के जिद करने पर उनसे मारपीट भी करते थे। चाची के शरीर में बस प्राण सुरक्षित रखने भर को ही जान थी पर वो अपने अधिकार का हवाला देकर उनसे तब तक लड़ती थी जब तक चाचा थक नहीं जाते थे। चाचा ने चाची की बातों को अनसुना करने का एकमात्र रास्ता चुना कि जब ज्यादा बोले तो जीभर के पीट दो। जब चाचा मारपीट करते तो मेरी माँ,दादी और हम सब भी रोते-रोते चाचा से विनती करते कि बस करिये नही तो मर जायेगी। तब कहीं जाकर वो छोड़ते। बचपन में कुछ ऐसे बर्बर तरीके देखे हैं हम लोगों ने जिससे चाचा उनके साथ मारपीट करते थे जिसको याद करते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हम पूरे परिवार के लोग घण्टों चाची के होश में आने का इन्तज़ार करते पर उनके लिये कोई कुछ कर न सकता।
हमने चाची का जो जागरूक रुप देखा था, वो समय के साथ और प्रखर होने लगा और चाचा पूरी कोशिश के साथ लगे थे उसे खत्म करने में। पर पता नहीं कैसी चिंगारी लेकर वो पैदा हुई थी कि शांत होने का नाम ही नही लेती थी। अभावग्रस्तता के चलते चाची को बड़ी तकलीफ होती थी अपने जीवन को लेकर क्योंकि एक नए समय की महिला जो आधुनिकता की आहट को गंगा के किनारे के कछारी गाँवों से सुन रही थी,उसने कुछ सपने सजा रखे थे,अपना जीवन-स्तर अपने स्वाभिमान के साथ बनाये रखने के बारे में कुछ योजना बना रखी थी ,वो सब ध्वस्त होते जा रहे थे और वो अपनी उस विद्रोही प्रवृत्ति की वजह से उसे नष्ट होता न देख पा रही थी।
चाची ने धीरे -धीरे खुद को समायोजित करना भी शुरू कर दिया था पर बच्चों की जरूरतें उन्हें फिर उकसाती कि वो फिर चाचा से ज़िद करें नौकरी करने के लिए। जब चाची दूसरों के बच्चों को ढंग के कपड़े पहनते देखती तो अपने बच्चों को देखकर रो पड़ती। पापा जब हम भाई बहनों के लिए त्यौहारों पर कपड़े लाते तो चाचा के तीनों बच्चों को भी वैसे ही नए कपड़े लाते पर चाची को ये पसन्द न था कि किसी का दिया हुआ उनके बच्चे पहनें। इसलिये उन्होंने दादी से कहवा के पापा को मना करवा दिया कि कपड़े न लाया करें। इससे पापा बहुत दुखी भी हुए। जब हम नए कपड़े पहनते तो एक बार मन में संकोच जरूर आता कि वो बच्चे क्या सोचेंगे। इसीलिए मैं तो खासकर कभी जल्दी नए कपड़े पहनने में बड़ा दुखी होता था।
चाचा कि हिंसात्मक प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। बात -बात पर मारपीट करने लगे और चाची भी ये अन्याय सहन करने को तैयार न थी । उन्हें लगता था कि जब वो उनके जीवन के किसी काम के नहीं तो फिर उन्हें मारने का क्या हक.....। अब तक मैं इंटर में पहुंच चुका था। आये दिन इतनी मारपीट देखकर मन तो करता था कि चाचा को आज मैं भी पीटूं पर शरीर अभी बचपने जैसी ही थी। कई बार तो चाची बेहद परेशान होकर कहती कि बेटा जाओ आज पुलिस को बुला लाओ। पर चाचा की क्रुरता देखकर हम लोगो की कुछ करने की हिम्मत ही न पड़ती। चाची भी ये कहने के बाद फिर मौन हो जाती। उनकी तकलीफ का दिन आज भी याद है।
आज चाची को अपने बच्चों समेत दिल्ली में अपने भाई के यहां रहते साल भर से ऊपर हो गए हैं। जब चाचा का पागलपन बढ़ता ही जा रहा था, तब चाची समझ चुकी थी कि अब वो कभी-भी उनकी जान ले सकते हैं और असल बात ये है कि पन्द्रह वर्षों से अधिक की हिंसा से अपने आत्मबल को हारता देख उन्होंने घर त्यागने का निर्णय लिया। उनके उस स्वाभिमान की हत्या हो चुकी थी जिसे वो अपनी ताकत मानती थी। ये एक घर भीतर एक औरत की जंग थी जिसे अभावग्रस्तता और हिंसा ने मिलकर उसे जीवन को बचाने के लिए घर छोड़ने पर विवश कर दिया था। उन्होंने जो सपने देखे थे उनको वो जीना भी चाहती थी पर यहां उन सपनों के लिए कोई उम्मीद ,कोई जगह बचा न दिखाई देने पर,उन्हें यहां से जाना पड़ा। आज वो सम्मान से अपने बच्चों को दिल्ली में अच्छे स्कूल में पढ़ा भी रही हैं और खुद का स्वाभिमान बना भी रही हैं। हालांकि चाची काफी गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो गयी थी जिसकी वजह से किसी से उनकी बनती न थी पर चाची के जाने का दुःख मुझे आज भी है। उनकी सहायता में अपनी असमर्थता को आज भी ग्लानि भाव से देखता हूँ पर खुश भी हूँ कि उन्होंने खुद बचा लिया। विजयी हुई तुम चाची।
-आशीष कुमार तिवारी


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