●कविता
गेहूं की पकी बाली और
सूरज की सुबह की लाली
अपनी मौजूदगी मात्र भर से
जीवन को खुशहाल कर देती है
सूरज की रौशनी
गेंहूँ को ऊर्जा देती है
और गेहूं सारे भूखे इंसानों को
एक तरह से हम सूरज को ही खाते हैं
शायद किसान हनुमान हों
जो उड़ने की असमर्थता के चलते
अपने परिश्रम से
सूरज का रूपांतरण करता है
और शायद
अकेले न निगल पाने की वजह से
पूरे मानव-समुदाय को बाँट कर
निगलता है
ऐसा लगता है किसान ही हनुमान है
जिसमें ताकत है सूरज को निगल जाने की
युग की भयावहता ने
शायद हनुमान को कई खण्डों में
किसानों के रूप में बाँट दिया है
पर किसानों ने भी तो सूरज के ताप को
खण्डों में बांटकर सबको खिलाया है...
आशीष कुमार तिवारी

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