Monday, 5 June 2017

बेना

                                        




                                                
  बेना
●कविता

गर्मी का मौसम
पहले भी आता रहा है
चिपचिपी गर्मी तब भी थी
पर बचपने में जब हम
दोपहर में दाल-भात खाने
बैठते थे तब गर्मी से व्याकुल होकर
अधूरा खाना छोड़कर भाग जाते
तब माँ पकड़ के लाती
और
दादी के सामने बैठाकर
थाली फिर से पकड़ा कर चली जाती
उस वक्त दादी के हाथ में ' बेना' होता था
जो दादी के हाथों की धुरी पर घूमता रहता
दादी के हाथ और बेना की संगत
मुझे गर्मी से राहत देती थी
वो दादी का पालथी मार के बैठना
और
हाथ में पूरी पृथ्वी की तरह बेने को घुमाना
अपनी जरूरत को तब प्रकट करता है
जबकि आज बिजली घण्टों नहीं आती
सभ्यता की नमीं कमजोर पड़ने पर
कुछ पुरातनताएं उसे स्थायित्व देती हैं
तब मुझे बेना याद आता है

                    आशीष कुमार तिवारी

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