Friday, 23 June 2017

माँ के जैसा सोच पाना बहुत कठिन है


● कविता

बच्चा रो रहा है
पैर पटक रहा है
आँखों से आँसू बह रहा है
पर माँ उसका हाथ अपने हाथ में लेकर
बच्चे का बस्ता अपने कन्धे पर लटकाये
निर्दयी होकर स्कूल ले जा रही है

बच्चे को देखकर दया तो बहुत आ रही
पर माँ की नज़र से सोच पाना बड़ा कठिन है
वो जानती है भविष्य के थपेड़ो को
जो इसी बच्चे को आगे बेरोजगार बना देगी
इसलिए उसे मजबूत बनाने के लिए
निष्ठुर बन गयी

बहुत दूर तक देख पा रहा हूँ कि
माँ उसे लेकर चली जा रही है
माँ रुक नहीं रही उस बच्चे के आँसुओं से
माँ उसे पहुंचा आना चाहती है
उस जगह तक
जहां से वो अपना भविष्य बनाने में समर्थ हो सके

माँ के जैसा सोच पाना बड़ा कठिन है....

     आशीष कुमार तिवारी

Thursday, 22 June 2017

मुझे पीड़ा है सरकारों के होने से

आशीष कुमार तिवारी

●कविता

घुटन होती है मुझे
जब सुनता हूँ किसी नेता को 
फलां पदाधिकारी नियुक्त किया जा रहा

दुःखी होता हूँ जब विश्व-शान्ति के लिए
हथियारों की खरीद-फरोख्त से 
सन्तुलन बनाने की कोशिश होती है
और देश के भीतर कोई परिवार
रोटी और मकान के लिए जंग लड़ता है

ये कोई प्रचलित मुहावरा नहीं
बल्कि चिरपरिचित भारत की दशा है

दर्द होता है तब जब नौजवानों की तादात
सड़कों पर निरुद्देश्य 
साँझ-सवेरे हिलती-डुलती दिखाई देती है
जिनमें लाचारी और टूटन के अलावा 
कुछ नहीं है

और इनके बरक्स देश के अधबुढ़ नेता
मरते दम तक रोजगार में बने रहते हैं

टूट जाता हूँ जब सुनता हूँ 
कोई नौजवान सरकारी विचारधारा से
असहमति के कारण गायब कर दिया जाता है
और उसकी माँ उसका सूनापन आँखों में लिए
सरकार से भीख मांगती है उसके पते की

पर सरकार है कि 
उम्मीदों का दिया बुझाने में माहिर है
पर सरकार है कि बस विदेशों से सौदा करती है
न जाने कौन सा सौदा करती है 
जिसका प्रतिफल किसी दूर के गाँव में रहने वाला 
सत्तर सालों में अपने घर से खोजता है
पर कुछ पाता नहीं

समय ऐसा है जिसमें
भैंसा भी इंसान के बैल बनने पर हंसता होगा
तब क्या आप को पीड़ा नहीं होती
मुझे तो पीड़ा होती है सरकारों से....
 




Wednesday, 14 June 2017

गांधी


                                 

● कविता

बचपन से ही जब भी
गांधी शब्द की ध्वनि
कानों में पड़ती
तब
एक अधनंगा फकीर
आँखों के सामने प्रकट हो जाता था

आज भी वही बिम्ब बनता है
उस शब्द के उच्चारण से

जिसकी लाठी देश की पीड़ा को
दूर करने के लिए गतिशील रही
उसकी निष्ठा को कुछ कथित नेता
बनिया की तराजू साबित कर रहे

अक्सर लाठियाँ या तो हिंसा के लिए
या लाचारी की दशा में सहारा होती हैं
पर वो लाठी आजादी की दिशा में
देश की जनता का रथ बनी थी
उसका उसूल हिंसा न था

गांधी की भीतरी प्रेरणा के
सत्याग्रह बल को ,
उसके मूल्यों को
बनिया के लाभखोर मूल्यों से तौलना
कथित नेताओं के मरे हुए मूल्यों को
व्यक्त कर रहा

त्रासदी है
एक निःस्वार्थ महानायक को
अपमानित करना।

-आशीष

Friday, 9 June 2017

इस तरह हमारा देश कृषि प्रधान है

● कविता

भारत एक कृषि प्रधान देश है
जहां किसान नंगा होने को मजबूर है
जहाँ किसान मूत्र पिता है
और
कृषि की प्रधानता को बनाये रखने
अपने रोजगार को बचाये रखने
के लिए आवाज उठाता है
तब उसे गोली मार दी जाती है

इस तरह भारत में
किसानों की लाशों से खेती होती है
चाहे हत्या से,चाहे आत्महत्या से

इस तरह भारत एक कृषि प्रधान देश है..

      आशीष कुमार तिवारी

Monday, 5 June 2017

बेना

                                        




                                                
  बेना
●कविता

गर्मी का मौसम
पहले भी आता रहा है
चिपचिपी गर्मी तब भी थी
पर बचपने में जब हम
दोपहर में दाल-भात खाने
बैठते थे तब गर्मी से व्याकुल होकर
अधूरा खाना छोड़कर भाग जाते
तब माँ पकड़ के लाती
और
दादी के सामने बैठाकर
थाली फिर से पकड़ा कर चली जाती
उस वक्त दादी के हाथ में ' बेना' होता था
जो दादी के हाथों की धुरी पर घूमता रहता
दादी के हाथ और बेना की संगत
मुझे गर्मी से राहत देती थी
वो दादी का पालथी मार के बैठना
और
हाथ में पूरी पृथ्वी की तरह बेने को घुमाना
अपनी जरूरत को तब प्रकट करता है
जबकि आज बिजली घण्टों नहीं आती
सभ्यता की नमीं कमजोर पड़ने पर
कुछ पुरातनताएं उसे स्थायित्व देती हैं
तब मुझे बेना याद आता है

                    आशीष कुमार तिवारी

Saturday, 3 June 2017

किसान ही भगवान है

           

●कविता

गेहूं की पकी बाली और
सूरज की सुबह की लाली
अपनी मौजूदगी मात्र भर से
जीवन को खुशहाल कर देती है

सूरज की रौशनी
गेंहूँ को ऊर्जा देती है
और गेहूं सारे भूखे इंसानों को
एक तरह से हम सूरज को ही खाते हैं
शायद किसान हनुमान हों
जो उड़ने की असमर्थता के चलते
अपने परिश्रम से
सूरज का रूपांतरण करता है
और शायद
अकेले न निगल पाने की वजह से
पूरे मानव-समुदाय को बाँट कर
निगलता है
ऐसा लगता है किसान ही हनुमान है
जिसमें ताकत है सूरज को निगल जाने की
युग की भयावहता ने
शायद हनुमान को कई खण्डों में
किसानों के रूप में बाँट दिया है
पर किसानों ने भी तो सूरज के ताप को
खण्डों में बांटकर सबको खिलाया है...

              आशीष कुमार तिवारी

बूंदों की बिखरन

                                     

●कविता

मैंने पहले भी गांव में
चमकते चांद को देखा है
पेड़ों की पत्तियों
और टहनियों के पीछे से
झांकते हुए

पर आज चमकती रात को देखकर
चाँद को देखने की बेचैनी
कुछ ज्यादा ही थी

चांद को देखने की मेरी लालसा को
कुछ ही पलों में निराशा का ग्रहण लग गया
मुझे आज वो चांद नहीं दिखा
जो नीम की छोटी-छोटी पत्तियों के पीछे से
बूंद-बूंद झलकता था

शहर की बिल्डिंग के
समतल किनारों से कटकर
वह चांद कटा फटा लग रहा था
जिस ओर से झांकता था मैं
उस ओर से कोई न कोई दीवार
उसे काट ही देती थी

आज बिल्डिंगों से मुझे तकलीफ है
जिसने पेड़ों के पीछे से
झांकने वाले चांद को तो छीना ही है
नीम के पेड़ की छाया भी छीन ली

बूंदों की बिखरन
आकृतियों की कतरन से
कहीं ज्यादा सुकून देती है
मुझे आज महसूस हो रहा है.......

                  आशीष कुमार तिवारी

हिंदी साहित्य शॉर्ट नोट्स UGCNET MPPSC UPHESC UGCNET EMRS KVS TGT PGT UK LT, DSSSB, Chandigarh TGT Hindi

💐DSSSB TGT PGT, UK LT, MPPSC UPHESC💐 UGCNET EMRS सभी परीक्षाओं के लिए बेहतरीन नोट्स। साथियों आप सभी के सुविधानुसार हिंदी साहित्य के स्पेशल...