घर में कई दिनों से टूटे हुए शौचालय को लेकर झगड़े-बहस चल रहे थे। किसी सदस्य का कहना था कि अबकी बार जो शौचालय बनेगा वो वेस्टर्न कमोड वाला हो,तो किसी का कहना था कि ,‘नहीं-नहीं हमारे भारतीय सभ्यता वाला कमोड ही होना चाहिए क्योंकि इस पर आसानी से पेट साफ़ होता है।’
तमाम तर्क-वितर्कों के चलते पाठक जी का माथा चकरा गया था। एक दिन बाजार में घूमते हुए अचानक एक किताब की दूकान पर नजर गयी जहां एक पत्रिका लटक रही थी जिसका नाम था “शौचालय शास्त्र”। घर के उलझनों के चलते उन्होंने दुःखी मन से उस पत्रिका को खरीद लिया कि फुर्सत में इसे। पढ़ेंगे हो सकता है कोई दृष्टि मिल ही जाए इसमें जो इस कलह को खत्म करे। पाठक जी घर आये और उस पत्रिका को मेज पर अनमने भाव से फेंक दिया। घर पहुंचने पर फिर वही भनभनाहट सुनने को मिली…(अरे अब तो इस बाथरूम में जाना ऐसा लगता है जैसे नरक जाने के दिन आ गए हों).....पानी पीने का मन था पर इस नरक की बात सुनकर अब प्यास भी सूख गई। पाठक जी अपना चश्मा लेकर दिसम्बर की धूप में छत पर जा बैठे और साथ में वो पत्रिका भी उठा ले गए। जैसे ही पत्रिका खोलकर पढ़ना शुरू किये ,छत की दाहिनी ओर की छत से शर्मा जी ठहाके लगाते हुए बोले, “ओ पाठक जी!आजकल यही शास्त्र पढ़कर मोक्ष की तैयारी कर रहे क्या...हा..हा..हा।”
पाठक जी ने शर्म से पत्रिका झुका के नीचे कर लिया और अनचाही मुस्कुराहट से बात टाल दी।
पाठक जी ने उस दोपहर में शौचालय शास्त्र की उस पत्रिका को पूरी तरह पढ़ डाला और उस शास्त्र के प्रवर्तक का पता भी नोट कर चुके थे - “...अग्रवाल हार्डवेयर & शौचालय शास्त्र विशेषज्ञ,भगवान टॉकीज चौराहा,आगरा”। वे शाम को भगवान टॉकीज चौराहे पर पहुंचकर हर एक दुकान के बोर्ड को ध्यान से देख रहे थे। अचानक अग्रवाल की दुकान पर नज़र पड़ी जो बस स्टैंड के बगल में थी। सड़क पार करके वे दुकान के सामने पहुंचे।
“नमस्कार!...”, दुकान के मालिक ने कहा।
पाठक जी बोले, “हमें एक शौचालय बनवाना है तो आप….” (अधूरी पंक्ति को पाठक जी दुकान के मालिक से पूरा सुनना चाहते थे)
“अच्छा-अच्छा! तो आपको शौचालय की सामग्री चाहिए या परामर्श भी।”
“जी दरसल शौचालय के बनावट को लेकर घर में काफी मतभेद है इसलिए कुछ परामर्श भी मिल जाता तो अच्छा था” (पाठक जी कुछ सकुचाते हुए बोले)
“अच्छा-अच्छा! रुकिए!........ओ पुनीत! बाबूजी की एक एडवाइस रसीद काट दो और अंदर कन्सलटेंट के पास ले जाओ”
पाठक जी हड़बड़ाते हुए बोले, “अरे भाई साब रसीद काहे की…”
“अरे बाबूजी चिंता न करिये आपके ये बाथरूम विशेषज्ञ है जो जापान की टेक्निकल कम्पनी से हैं और महान शौचालय शास्त्री हैं...ये आपको जापान की सबसे बेहतरीन सलाह देंगे।”
घर में तरह-तरह के कमोडो की ख्वाहिश वाले लोग न होते तो पाठक जी देशी शौचालय बनवा के छुट्टी लेते पर नए ट्रेंड के बच्चे भी हो गए हैं घर में इसलिए सोचना पड़ रहा।
“क्या सोच रहे हैं बाबूजी! मात्र सात सौ फीस है और जापानी टेक्निक आगरा में ही पा जा रहे आप….क्या ये ज्यादा नहीं…”
“ठीक है। काटो पर्ची।”
दुकान के अंदर आते ही पाठक जी ने देखा कि दुकान के गेट के पास अग्रवाल ने हार्डवेयर का सामान रखा है और सात हाथ अंदर जाने पर एक विशेषज्ञ का चेम्बर बना है। उन्हें याद आया कि यादव मेडिकल स्टोर में भी इसी तरह मेडिकल के अंदर यादव का एक विशेषज्ञ डॉक्टर भी ऐसे ही बैठता है जिसकी फीस भी अलग से लगती है। पाठक जी अपने घर के शौचालय को मन ही मन कोस रहे थे कि क्यूँ टूट गया तू, नहीं तो ये दिन न देखने पड़ते।
पाठक जी अपनी सात सौ की परामर्श रसीद लेकर चेम्बर में घुसे तो देखे कि एक नौजवान लड़का टाई-बेल्ट पहने कुर्सी पर बैठा है। उन्हें देखते ही वो मुस्कुराकर बोला,”आइये-आइये! वेलकम!” उसने उन्हें बिठाया और बोला कहिये क्या समस्या है। पाठक जी ने कहा देखिये हमारे घर में सब अलग-अलग कमोड वाला शौचालय चाहते हैं पर हमारे यहां एक ही शौचालय की जगह है।
शौचालय विशेषज्ञ ने मुस्कुराते हुए कहा, “बाबूजी सबसे पहले हम आपकी जांच करेंगे जिससे पता चले कि आपको किस प्रकार का कमोड फिट पड़ेगा।”
डॉक्टर ने पुनीत को आवाज दी, “ओ पुनीत! जरा टेप लेकर बाबूजी के गर्दन से लेकर कमर तक और फिर तलुए से लेकर घुटने तक की लम्बाई नापो।”
पुनीत इंची टेप लेकर आया और पाठक जी को बिस्तर पर उल्टा लेटने को कहा। पाठक जी हैरान थे कि ये क्या हो रहा है पर फीस दे चुके थे इसलिए चुपचाप उल्टा लेट गए।
पुनीत ने पाठक जी की नाप लेकर उसकी रीडिंग डॉक्टर को दिखाई। उसने पाठक जी को बुलाया और कुर्सी पर बैठने को कहा और बोला, “देखो बाबूजी! मामला ये है कि आप जिस नस्ल के हैं उस तरह के वेस्टर्न कमोड बड़े मुश्किल से आपको मार्केट में मिलेंगे इसलिए इसे ऑर्डर देकर आपको जापान से इस तरह का फिट कमोड मंगाना पड़ेगा।”
पाठक जी झल्ला गए, “ये क्या बेहूदा मज़ाक है….हम इतने सालों से शहर में रह रहे हैं आपको क्या लगता है हम रेल की पटरियों पर अब तक शौच जाते थे….हमारा देशी शौचालय ही ठीक है...हम वही बनवायेंगे...हमें आपकी सलाह की जरूरत नहीं है।
शौचालय विशेषज्ञ उन्हें शांत कराके बोला, “देखिये बाबूजी! मानाकि आप अब तक शौचालय प्रयोग करते आ रहे हैं पर उस शौचालय के प्रयोग में हानि है जिससे आपके भीतर का मल पूरी तरह से नहीं साफ हो पाता। जिससे शरीर असमय बीमार और जर्जर हो जाता है। चिड़चिड़ापन और ब्लडप्रेशर जैसी बीमारियां इसीलिए आजकल तेज़ी से लोगों को अपना शिकार बना रही हैं क्योंकि लोगों को पता ही नही चल पा रहा कि इसकी असली वजह क्या है…..इसलिए बाबूजी आप पहले अपने गुस्से को शांत करें और बेहतर स्वास्थ्य को नज़रअंदाज ना करें।
पाठक जी बड़े फेर में पड़ गए कि ये किस समस्या में पड़ गए। उन्हें अपनी नस्ल को लेकर भी चिंता हो गई कि उनके नस्ल के लोगों के लिए कमोड भारत में मिल ही नहीं सकता। मान लो आज वे जापान से ऑर्डर करके मंगवा कर शौचालय बनवा दें पर फिर भविष्य में कभी उनके बच्चों को शौचालय बनवाना हो तो इतनी महंगाई में वो कैसे जापान से आर्डर करके मंगवाएंगे। आज उनकी चिंता और अधिक बढ़ गई। एक मन कहता था कि पाठक जी आप बाजारवाद के जाल में फंस रहे हैं लेकिन फिर सोचते कि ये जापान से सीख कर आया विशेषज्ञ है झूठ थोड़े न बोलेगा। हो सकता है कमोड विज्ञान का गहन अध्ययन किया हो।
पाठक जी ने मन को मनाया कि ये सब बाजार का माया-जाल है फिर उन्हें कुछ सूझा कि उस डॉक्टर ने नाप-जोख भी किया और तो और बाजार में हर किताब की दुकानों पर अब तो इसकी “शौचालय शास्त्र” किताब बिक भी रही है। पाठक जी मन के उलटफेर में फंसते जा रहे थे। फिर मन को ढांढस देते हुए बाहर आये और अग्रवाल को जापान से कमोड आर्डर करने का एडवांस दे दिए।
“कुछ भी हो जापान की टेक्नालाजी से बना कमोड स्वास्थ्यवर्धक भी होगा और घर वालों को पसन्द भी आएगा” मन से सोचते हुए और कुछ-कुछ खुश होते हुए पाठक जी घर की ओर चल दिए।
आशीष कुमार तिवारी
