Saturday, 3 June 2017

बूंदों की बिखरन

                                     

●कविता

मैंने पहले भी गांव में
चमकते चांद को देखा है
पेड़ों की पत्तियों
और टहनियों के पीछे से
झांकते हुए

पर आज चमकती रात को देखकर
चाँद को देखने की बेचैनी
कुछ ज्यादा ही थी

चांद को देखने की मेरी लालसा को
कुछ ही पलों में निराशा का ग्रहण लग गया
मुझे आज वो चांद नहीं दिखा
जो नीम की छोटी-छोटी पत्तियों के पीछे से
बूंद-बूंद झलकता था

शहर की बिल्डिंग के
समतल किनारों से कटकर
वह चांद कटा फटा लग रहा था
जिस ओर से झांकता था मैं
उस ओर से कोई न कोई दीवार
उसे काट ही देती थी

आज बिल्डिंगों से मुझे तकलीफ है
जिसने पेड़ों के पीछे से
झांकने वाले चांद को तो छीना ही है
नीम के पेड़ की छाया भी छीन ली

बूंदों की बिखरन
आकृतियों की कतरन से
कहीं ज्यादा सुकून देती है
मुझे आज महसूस हो रहा है.......

                  आशीष कुमार तिवारी

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