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ऐसा अक्सर हो जाया करता था कि किसी-किसी बात को लेकर हम दोनों में बहुत देर तक झगड़ा हो जाता था। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि एक-दो दिन तक रूखी-सूखी नाराजगी से हमारी बात होती थी जिसका फार्मेट झगड़े वाला ही होता था। पर ये झगड़ा हमेशा ही एकपक्षीय होता था। जिसमें मैं आक्रामक होता था और वो रक्षात्मक। वो अपने आप को मारती हुई,घुटती हुई मेरी तमाम तरह की बातें सहती फिर भी विद्रोह का स्वर न निकलता। पर मैं चाहता था कि वो भी मुझ पर आरोप लगाये,मेरी गलतियों को उजागर करे,मुझपे चिल्लाये...पर वो ऐसा कुछ भी न करती। पर हाँ कभी-कभी मेरे आक्षेपों का प्रतिउत्तर देने के लिए उसकी आत्मा तड़प उठती और वो शुरुआत के पहले अक्षर पर ही सारा जोर डाल कर साँसे भरती और फिर सारे शब्दों को जैसे पी जाती। मैं आगे इंतज़ार रहता कि आज मुझे अपने सभी अत्याचारों का प्रतिउत्तर मिलेगा परन्तु उसने मेरे इन उम्मीदों को कभी खरा न साबित होने दिया।मेरा उसके शब्दों को सुनने का इंतज़ार तब खत्म होता जब उसकी सारी प्रतिक्रिया,सारे शब्द उसकी आँसुओं की क्रमबद्धता के साथ बहने लगते। उन्हें देखकर ऐसा लगता मानों सारे वाक्य- विन्यास आँसुओं की क्रमबद्धता में सब कुछ कह देना चाहते हों। मेरे सारे आरोप,सारे झगड़े की जड़ वहीं समाप्त हो जाती।
आज एक ऐसा ही दिन था जब मैंने अब तक का सबसे कठोर कदम उठाया। हम दोनों विश्वविद्यालय के ग्राउंड के किनारे लगे वृक्षो की छाया में थोड़ा ठंडापन महसूस करते हुए बैठे पर मेरे चेहरे की कठोरता को उसने शायद भांप लिया। वो समझ गयी थी कि मन में फिर किसी उष्णता को दबाना होगा अन्यथा सब जल कर नष्ट हो जाएगा।
उसने पूछा-कैसे हो ?
मैंने बिना चेहरे का भाव बदले उस प्रश्न को अनसुना कर दिया।
"आज बहुत गर्मी है ना"
"मुझे नहीं पता" मैंने कहा।"
"खाना खाकर आये हो" उसने पूछा।
"कसम खाके आया हूँ"
"क्या"
"कि आज तुमसे सारे रिश्ते तोड़ दूंगा"
हालांकि मेरा ऐसा इरादा कभी न रहा लेकिन उसे अपने लिए तड़पता हुआ देखने की मुझे पता नहीं क्यों आदत सी हो गयी थी। मुझे अच्छा लगता जब वो मेरे लिए रोती,मेरे लिए घण्टों बैठकर मुझे निहारती। पता नहीं कैसा क्रूर हो चला था मेरा प्रेम। प्रेम ही कहेंगे क्योंकि उससे दूर जाने की मैं कभी सोच ही नही सकता था पर वो थी कि मेरी क्रूरता में भी अपने लिये प्यार ढूंढ लेती थी।
मेरे इस तरह के निरर्थक वार्तालाप की जैसे उसे आदत सी पड़ गयी थी। उसने हँस के कहा-"कसम खाके आये हो कि मेरा साथ कभी नहीं छोड़ोगे....है ना।"
"नहीं आज के बाद कभी नहीं मिलूंगा ये कसम"
आज जैसे वो सब जानती थी कि बहुत सारी बातें कहूँगा मैं इसलिए उसने कोई लम्बी सांस भी न ली। मेरी बात सुनकर खामोश सी होकर मन्द-मन्द चलती हवाओं को महसूस करने की कोशिश वो करने लगी। वो मुझे दिखाना चाहती थी कि उसे सब खबर है मैं क्या कहना चाहता हूँ। हवाओं को महसूस करते हुए उसके आँखों से पानी की धार बहने लगी। मेरी नजर उसके चेहरे पर पहुंची तो मैं बड़ा निराश हुआ कि मैं आज कुछ भड़ास निकाल ही न पाया और ये अभी से शुरू हो गयी। मुझे ये उम्मीद न थी। पर आज वो धार बन्द होने का नाम न ले रही थी। दरसल आज मैं भी समझ गया था। उसके धैर्य का बाँध आज उसके बस में न था। आज उसने अपनी सहनशक्ति की सीमा मुझे बता दी। एक जोर कि रुँधी गले की आवाज़ निकली उसके मुंह से और वो अपना सर मेरे पैर पर रखकर रो पड़ी। मुझे लगता है वो रोने की आवाज़ आज मेरे परीक्षा लेने की सीमा थी। मैं इससे ज्यादा कुछ तकलीफ न दे सकता था। पता नहीं क्यों वो मुझे इतना प्यार कर रही थी। मेरी क्रूरता के बावजूद। उसकी पीड़ा देखकर मुझसे भी रहा न गया और मैं भी उसके रोने में शामिल हो गया। मुझे रोता देख कर उसने अपने को पता नहीं कैसे चुप करा लिया और मुझे चुप कराने लगी।
मैं हैरान हूँ उसके और अपने प्रेम के अंतर पर। मेरा क्रूर प्रेम उसकी संवेदना में धँसता जा रहा और उस धँसन से निकलने वाला खून मुझे राहत देता है। हाँ मेरा प्रेम निर्दयी है।
....आशीष कुमार तिवारी
