आशीष कुमार तिवारी
जब सुनता हूँ किसी नेता को
फलां पदाधिकारी नियुक्त किया जा रहा
दुःखी होता हूँ जब विश्व-शान्ति के लिए
हथियारों की खरीद-फरोख्त से
सन्तुलन बनाने की कोशिश होती है
और देश के भीतर कोई परिवार
रोटी और मकान के लिए जंग लड़ता है
ये कोई प्रचलित मुहावरा नहीं
बल्कि चिरपरिचित भारत की दशा है
दर्द होता है तब जब नौजवानों की तादात
सड़कों पर निरुद्देश्य
साँझ-सवेरे हिलती-डुलती दिखाई देती है
जिनमें लाचारी और टूटन के अलावा
कुछ नहीं है
और इनके बरक्स देश के अधबुढ़ नेता
मरते दम तक रोजगार में बने रहते हैं
टूट जाता हूँ जब सुनता हूँ
कोई नौजवान सरकारी विचारधारा से
असहमति के कारण गायब कर दिया जाता है
और उसकी माँ उसका सूनापन आँखों में लिए
सरकार से भीख मांगती है उसके पते की
पर सरकार है कि
उम्मीदों का दिया बुझाने में माहिर है
पर सरकार है कि बस विदेशों से सौदा करती है
न जाने कौन सा सौदा करती है
जिसका प्रतिफल किसी दूर के गाँव में रहने वाला
सत्तर सालों में अपने घर से खोजता है
पर कुछ पाता नहीं
समय ऐसा है जिसमें
भैंसा भी इंसान के बैल बनने पर हंसता होगा
तब क्या आप को पीड़ा नहीं होती
समय ऐसा है जिसमें
भैंसा भी इंसान के बैल बनने पर हंसता होगा
तब क्या आप को पीड़ा नहीं होती
मुझे तो पीड़ा होती है सरकारों से....

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