● कविता
बचपन से ही जब भी
गांधी शब्द की ध्वनि
कानों में पड़ती
तब
एक अधनंगा फकीर
आँखों के सामने प्रकट हो जाता था
आज भी वही बिम्ब बनता है
उस शब्द के उच्चारण से
जिसकी लाठी देश की पीड़ा को
दूर करने के लिए गतिशील रही
उसकी निष्ठा को कुछ कथित नेता
बनिया की तराजू साबित कर रहे
अक्सर लाठियाँ या तो हिंसा के लिए
या लाचारी की दशा में सहारा होती हैं
पर वो लाठी आजादी की दिशा में
देश की जनता का रथ बनी थी
उसका उसूल हिंसा न था
गांधी की भीतरी प्रेरणा के
सत्याग्रह बल को ,
उसके मूल्यों को
बनिया के लाभखोर मूल्यों से तौलना
कथित नेताओं के मरे हुए मूल्यों को
व्यक्त कर रहा
त्रासदी है
एक निःस्वार्थ महानायक को
अपमानित करना।
-आशीष

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