Wednesday, 26 April 2017

स्कूल का पहला दिन

आशीष कुमार तिवारी
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चुलबुले और शरारती बचपन की कहानियाँ ही कुछ और होती हैं। साक्षी और मयंक एक-दूसरे से एक साल बड़े और छोटे हैं पर दोनों की लम्बाई और वजन एक जैसे। साक्षी अपने बड़े होने की जिम्मेदारी और समझदारी से लैस है। उसकी बातें और तर्क उसे अपनी उम्र से कहीं ज्यादा समझदार दिखाते थे वहीं मयंक उससे एक साल छोटा और शरारतों से पूरा का पूरा लबालब।
गलतियाँ करने के बाद खुद को बचाने की कला वो अपने मासूम चेहरे से ही दिखाते हैं। कभी जब दीदी डांट देती हैं तो दोनों ऐसा चेहरा बना के खड़े होते हैं कि जैसे इन जैसा निर्दोष ज़माने में न मिलेगा।साक्षी को स्कूल जाने का बड़ा शौक था। बस में बैठकर बच्चों को स्कूल जाता देखकर उसका भी मन करने लगा पढ़ने का। दोनों दीदी को मम्मी नहीं बल्कि  "मम्मम" कहते थे।

दोनों की शरारतें सुबह की रोशनी से शुरू होती है रात में नींद आने के पहले तक बड़बड़ाहट के रूप में चलती रहती। इस साल उन दोनों की उम्र स्कूल जाने लायक हो चुकी थी। तय किया गया कि इस सत्र में इन दोनों को स्कूल भेजा जाय। उनके लिए बैग मंगाए गए,ड्रेस,जूते, टिफिन और बॉटल इन सारी चीज़ों का इंतज़ाम किया गया।

आज दोनों के स्कूल का पहला दिन था। घर के बाहर स्कूल बस खड़ी थी। दोनों ड्रेस पहनकर,बैग लेकर तैयार थे। बस वाले ने आवाज़ लगाई," आ जाओ बच्चों! "
इतना सुनते ही दोनों दौड़कर दीदी के पास गए और उनकी कमर पकड़ के खड़े हो गए। दीदी ने दोनों का सर जब ऊपर किया तो दोनों के आँखों में आंसू थे। साक्षी तो चुप थी पर मयंक से चुप होना बर्दाश्त न हुआ। वो बोला," मम्मम आज नहीं कल से जाते हैं स्कूल..... दिदिया रो रही है मम्मम.......मम्मम रोक लो.." इतना कहकर वो और रोने लगा और उसे रोता देख साक्षी के भी सब्र का बाँध टूट गया और वो बोली," मम्मम बाबा अभी छोटा है....स्कूल में रोयेगा.... मम्मम बाबा को आज रहने दो....मत भेजो। " दोनों के आँसुओं ने ऐसा इमोशनल कर दिया कि एक बार दीदी ने भी सोचा कि आज रहने दूँ, कल से जाएंगे बेचारे बच्चे। पर बस वाले ने कहा, "अरे भाभी जी इतना मोह में नहीं पड़ते स्कुल के मामले में.......भेजिए बच्चों को।" तब दीदी ने उन्हें समझाबुझा के जाने के लिए राजी किया। दोनों गए तो पर जाते-जाते दोनों ने अपनी नज़रों से दीदी पर निर्दयी होने का ठप्पा लगाने की भरपूर कोशिश की। बस में बैठकर उन दोनों ने खिड़की से पूरे घर को देखकर ऐसे रोना शुरू किया जैसे कि उन्हें जेल भेजा जा रहा हो। दीदी का मन उस दिन तब तक उन दोनों की मासूम आँखों को याद करता रहा जब तक कि दोनों स्कूल में थे।

स्कूल पहुंचने तक तो दोनों बस में साथ-साथ बैठे थे पर जब स्कुल पहुँचकर दोनों को अलग-अलग कक्षाओं में ले जाया जाने लगा तो उनके दुःख का ठिकाना न रहा। मयंक जो घर में सोकर उठता और साक्षी को आस-पास न पाता तो उसका सबसे पहला सवाल दीदी से यही होता," मम्मम! दिदिया कहाँ गई "
वही आज जब साक्षी को दूसरी क्लास में ले जाता हुआ देखकर वो मुंह में ऊँगली डालकर फूट-फूटकर रोने लगा। किसी तरह उन्हें उनकी क्लासों में ले जाया गया पर पूरे दिन दोनों का मन एक-दूसरे के बिन न लगा।

साक्षी ये जानती थी कि वो मयंक से बड़ी है। उसे मयंक की चिंता सता रही थी। उसे डर लग रहा था कि, "कहीं टीचर या कोई लड़का उसे मार न रहा हो " इस चिंता से उसने कई बार बाहर निकलने की हिम्मत जुटाई पर स्कुल का पहला दिन होने के नाते उसे लगा कि कोई देख लेगा तो हो सकता है मारे भी। पर मयंक की याद उसे बार बार आ रही थी। इस बार वो उठकर चल दी। दो-तीन कक्षाओं के भीतर उसने झाँककर देखा तब जाके एक क्लास में उसे मयंक नज़र आया। साक्षी ने देखा कि वो बच्चों के बीच बैठा था पर उसकी नज़र दरवाज़े की ओर ही लगी थी। उसे ऐसा लग रहा होगा कि साक्षी उसे देखने जरूर आएगी। साक्षी दरवाजे से छुपकर उसे देख रही थी और मयंक भी पलटकर उसे लगातार देख रहा था। ऐसा पहली बार हुआ जब दोनों ने बड़े देर बाद एक-दूसरे को देखा हो और बड़े जोर से खिलखिलाकर एक-दूसरे को डराने की कोशिश न की हो। दरवाजे के पीछे से लगातार मयंक को देखते हुए साक्षी के आँख से मौन आँसू डबडबा कर बह गए। वो वापस अपने क्लास में आकर बैठ गयी और रोने लगी।

कुछ ही देर बाद लंच की छुट्टी हुई। दोनों दौड़कर बाहर ग्राउंड में आये और बच्चों की भीड़ में एक-दूसरे को खोजते हुए मिले। थोडी आजादी मिलने पर वे सब दुःख भूल गए। साक्षी से दीदी ने कहा था कि लंच में खुद भी खा लेना और मयंक को भी खिला देना। साक्षी टिफिन तो लेकर बाहर आई पर इतने देर तक दूर रहने के बाद मिलने पर दोनों को खाने की कोई सुध न रही। साक्षी हाथ में टिफिन लेकर मयंक के साथ खेलती रही और कुछ देर में लंच का टाइम खत्म हो गया। सभी वापस अपने-अपने कमरे में चले गए।

इस तरह तो दोनों ने अपने स्कुल के पहले दिन को बिताया। घर वापस आने पर दोनों दौड़कर दीदी के पास पहुंचे और शिकायत भरे भारी गले से रो पड़े। दीदी ने दोनों को गले लगाया। कुछ देर तक तो दोनों चुपचाप गले लगे रहे फिर साक्षी ने पूरे दिन का सारा वृत्तांत सुनाया। साक्षी ने मयंक से कहा," कि देखो मयंक मैं तुम्हारा कितना ख्याल रखती हूँ......तुम वाहर दरवाजे पर मुझे खोज रहे थे तो मैं आ गयी थी तुम्हे देखने कि कोई लड़का तुम्हें मार तो नही रहा है।" तब मयंक ने बड़े शरारती अंदाज में कहा,"मत आई होती....हम बुलाये थे क्या..."
साक्षी ने खा,"ठीक है....अब दरवाजे के बाहर देखते रहोगे फिर भी नहीं आउंगी और बच्चे तुम्हें मारेंगे तो देखती हूँ कौन बचाने आता है।"
"मत आना...", कह कर मयंक दीदी की गोद में जाके बैठ गया और साक्षी रोने लगी।
ये पहला दिन था उनके स्कूल का।
मासूम और भावुक दिन।

                -आशीष कुमार तिवारी 

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