चुनाव जीतने के लिए नेताजी जी ने बहुत संघर्ष किये,पार्टी कार्यालय के चक्कर पे चक्कर लगाते पाँव में बिवाई फूट चली थी पर कोई जुगत काम न आती थी। कोई रास्ता न सूझता दिखने पर उनकी आत्मा ने थक हार कर आह भरी-"हे राम!"।राम के उदार चरित्र और सहृदयता के विषय में तुलसीदास जी ने लिखा है-
ऐसे को उदार जग माहीं
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर,राम सरिस कोऊ नाहीं।
इस पंक्ति का ध्यान आते ही उन्होंने तय कर लिया कि वही पार्टी चुनाव में उनकी नैया पार लगाएगी जो राम की उदारता पर चल रही हो। बस फिर क्या था उन्होंने पुरानी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। पता लगाने पर मालुम चला कि "रामाधार पार्टी" पूरी की पूरी राम भरोसे ही चल रही है और देश में आजकल राम पर विश्वास प्रबल होता जा रहा है। इसलिये इस बार पार्टी के नियम कानून पक्के तरीके से निभा दिए तो जरूर जीतेंगे। 'बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर' को वे पार्टी का गाइडलाइन मानकर बड़ी सतर्कता से पालन करना शुरू कर दिए थे। उनकी आस्था राम पर प्रबल हो गयी क्योंकि इस बार चुनाव जनता नहीं बल्कि राम की उदारता जितायेगी। जनता का क्या, जनता तो धोखेबाज होती है। उसने तो नेताजी के कैरियर से खिलवाड़ कर दिया था। प्रभु श्री राम के धैर्य,पराक्रम और तेजस्विता जैसे सारे गुण इन दीनों को देखकर द्रवित हो जाते थे और प्रभु को द्रवित करने के उद्देश्य से पार्टी के सभी कार्यकर्ता और नेता दीनता और सेवा-भावना से रहित होने का हरसम्भव प्रयास करते। प्रभु श्रीराम ने देखा कि इन दीनों का एकमात्र एजेंडा उनका नाम ही है-
एक भरोसो,एक बल,एक आस विसवास।
वे सचमुच द्रवित हो उठे और एक अजब सी लहर लेकर आये जिसमें सभी दीन नेताओं की नैया पार लगी। बोलो जय श्री राम।
राजनीति एक ऐसा फार्मूला है जो योग्य महापुरुषों के डी एन ए को अपनी मजबूती और कमजोरी को साधने का अच्छा जरिया है। प्रभु के उदार चरित्र का लाभ राजनीति में वैसे ही है जैसे-चिट भी मेरी, पट भी मेरा। ऐसे में भला नेताजी को कौन हरा सकता था।
आशीष कुमार तिवारी

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