कविता
आलोचना व पुस्तक समीक्षा से संबंधित वरिष्ठ समीक्षक जीवन सिंह की नई किताब इस वर्ष
प्रकाशित हुई है ‘कविता की अर्थवत्ता’ नाम से। इस शिकायत के साथ कि पुस्तक समीक्षा
को दोयम दर्जे की आलोचना मानकर संपादकगण पत्रिकाओं में उन्हें सबसे अंतिम हिस्सों
में डाल देते हैं। जबकि अपने देशकाल से संबद्ध रचना की समीक्षा भी देशकाल की
परिस्थितियों के प्रभाव से स्वच्छंद नहीं रहती। उस पर समीक्षक की भाषा और
विचारशीलता, जो देशकाल की परिस्थितियों से निर्मित होती है, का स्पष्ट प्रभाव पड़ता
है। साहित्य क्षेत्र में किसी नई रचना का आगमन साहित्य की समृद्धि की सूचक है। इस
सूचना को परिपक्व समालोचना की दृष्टि और हर्ष के साथ पत्रिकाओं के प्रारम्भिक
हिस्से में रखना न्यायोचित होता। ज्ञात हो कि इस पुस्तक के प्रारम्भिक हिस्से में
हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवियों की अतिप्रसिद्ध कविताओं के पुनर्पाठ के बाद का
पूरा हिस्सा पुस्तक समीक्षा पर आधारित है, परंतु जीवन सिंह इन पुस्तक समीक्षाओं को
आज की घोषित बेस्टसेलर किताबों के ‘बुक रिव्यू’ की परंपरा से अलग अच्छी और गंभीर
विश्लेषणपरक पुस्तक समीक्षा मानते हैं, जिससे साहित्य में समीक्षा के नए मानदंड
सृजित होते हैं। इस पुस्तक में भी कवियों की कविताओं के मूल्यांकन और उनकी
अर्थमीमांसाओं का अध्ययन करने पर विशेष नए मूल्यों की ओर ध्यान आकर्षित होता है।
पूरी
पुस्तक दो खंडों में विभाजित है – प्रथम खंड, शब्दार्थ और दूसरा
खंड, अर्थवत्ता नाम से। भारतीय काव्यशास्त्र में शब्दार्थ की महत्ता
को दृष्टि में रखते हुए उन्होंने प्रथम खंड में हिंदी के कुछ प्रतिष्ठित कवियों की
प्रसिद्ध कविताओं का पुनर्पाठ करते हुए उनके वास्तविक रचना-उत्पत्ति के कारणों के
केंद्र की तलाश की है। इन कवियों में निराला की कविता ‘तोड़ती पत्थर’,
‘वनबेला’ और ‘महगू महंगा रहा’, नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके
बाद’, केदारनाथ सिंह की कविता ‘भोजपुरी’ और विजेंद्र की कविता
‘कठफूला बाँस’ शामिल है। दूसरे खंड में उन्होंने अपने अध्ययन-क्रम में समय-समय पर
प्रकाशित भिन्न आयुवर्ग के कवियों के काव्यसंग्रहों की पुस्तक समीक्षाओं को शामिल
किया है। इन कवियों में नंद चतुर्वेदी, विजेंद्र, ऋतुराज, ज्ञानेन्द्रपति, अनिल
गंगल, एकांत श्रीवास्तव, निर्मला पुतुल, केशव तिवारी, बलभद्र, महेशचंद्र पुनेठा,
सुरेश सेन ‘निशांत’ और अविनाश मिश्र के एक-एक काव्यसंग्रहों की पुस्तक समीक्षा
शामिल है। इस खंड के अंतर्गत ही रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, धूमिल,
विष्णुचंद्र शर्मा और केदारनाथ सिंह की कविताओं पर लंबा आलेख भी है।
साहित्य
में ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ की महत्ता का प्रतिपादन काव्यशास्त्र के महान आचार्यों ने
शताब्दियों पहले ही कर दिया था, परंतु आधुनिक हिंदी साहित्य के मूल्यांकन के दौरान
प्रायः पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को विशेष महत्त्व दिया गया। यह महज वैश्विक
साहित्यिक प्रचलन के प्रभाववश ही था। वास्तव में किसी भाषा के साहित्य रूपों में
प्रयुक्त शब्द उस भाषिक समाज के किन्हीं विशेष बोध का सूचक होता है। यह विशिष्ट
बोध किसी जीवनदृष्टि का परिचायक हो सकता है। जीवन सिंह निराला की कविता ‘तोड़ती
पत्थर’, ‘वनबेला’ और ‘महगू महंगा रहा’ में प्रयुक्त शब्द संरचना में निहित जीवन
दृष्टियों को प्रकट करने का प्रयास करते हैं। ‘तोड़ती पत्थर’ कविता को वे ‘गुंफित
कविता’ की संज्ञा देते हैं। जीवन सिंह इस कविता के पुनर्पाठ की मांग को पाठकों से
गंभीरता से कहते हैं। अपने विश्लेषण में वे लिखते हैं कि निराला की इस कविता में ‘इलाहाबाद
के पथ पर’ पद की प्रयुक्ति को साधारण बात नहीं है, बल्कि अपने स्थान-विशेष के
प्रति कवि की सजगतापूर्ण चेतनदृष्टि का बोध है। किसी स्थान-विशेष में कर्मसौंदर्य
में तल्लीन पेशेवर जातियों की दशा और उस स्थान के अर्थवैभव के बीच की खाई समाज के
सत्ता-संरचना का प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध कराता है। इसी तरह ‘तरुमालिका
अट्टालिका’ जैसे शब्द की प्रयुक्ति सड़क पर भरी दुपहरी पत्थर तोड़ने वाली स्त्री
की दृष्टि में सामंती शोषण की प्रतिमूर्ति खड़ी करती है। अट्टालिकाओं का निर्माण
श्रमिक वर्ग अपने श्रम से सींचकर करता है, परंतु उस पर उसका अधिकार रंचमात्र भी
नहीं होता। इसलिए ‘अट्टालिका’ शब्द कभी भी श्रमिक के घर का पर्याय हो ही नहीं
सकती। नंददुलारे वाजपेयी इस कविता में प्रयुक्त ‘अट्टालिका’ शब्द का निहित आशय
इलाहाबाद में स्थित ‘आनंद भवन’ से जोड़कर इसका निहितार्थ राजनीतिक व्यंग्य के रूप
में देखते हैं, जो जीवन सिंह का भी आशय है। आगे इसी कविता में प्रयुक्त ‘सजा
सहज सितार’ शब्दपद जीवन सिंह को निराला के संगीत पक्ष की ओर विचार का तार
जोड़ने का अवसर देता है, जो उपयुक्त ही है। कविता की यह पंक्ति उन्हें निराला की
‘बादल राग’ और ‘संध्या सुंदरी’ कविता का भी स्मरण कराती है। इन सभी कविताओं में
संगीत का राग तत्व मौजूद है। वे लिखते हैं, “निराला स्वयं संगीत में इतने डूबे हुए
थे कि जहां भी सहजता से कोई अवसर आता वहाँ वे संगीत के लिए स्थान निकाल लेते थे।
बादल के साथ राग की कल्पना बादल-राग के रूप में निराला ही कर सकते थे। गर्जना और
घनघोरता के साथ मृदुता का साहचर्य वे ही बिठा सकते थे” (जीवन सिंह, कविता की
अर्थवत्ता, पृ. 20)
निराला
का काव्य संघर्षशील और द्वन्द्वगत यथार्थ के मध्य सहजता और साहचर्य स्थापित करने
का सूत्र बना। उनकी लंबी कविताओं में ‘तुलसीदास’, ‘राम की शक्तिपूजा’ इसी कोटि की
श्रेष्ठ रचनाएं है। जीवन सिंह ने इन चर्चित लंबी कविताओं के क्रम में निराला की एक
और लंबी कविता ‘वनबेला’ का नाम जोड़ा है, जो पाठकों के मध्य बहुत कम चर्चित
है। उनके अनुसार यह लंबी भी जीवन की द्वन्द्वात्मकता को दृष्टिगत रखते हुए रची गई
है। किसी भी कवि या रचनाकार का काव्य उसके देशगत परिस्थितियों और समाज संरचना की
अनिवार्य छाप धारण किए रहता है। निराला का काव्यविकास भी अपने देश के भीतर
काल-परिवर्तन के बावजूद जीवन-सौन्दर्य की महत्ता को छोड़ता नहीं, उसे मुखर रूप से
अपनाता है। जीवन सिंह निराला की इन कविताओं का पुनर्पाठ करते हुए यह रेखांकित करते
हैं कि “यह संयोग ही है कि तीनों क्लैसिक रचनाएं भारतीय इतिहास के विराट क्रम की
तीन महत्वपूर्ण कड़ियाँ भी हैं। इनमें राम की कड़ी सबसे प्राचीन है, तुलसीदास की
मध्यकालीन और वनबेला की आधुनिक । जीवन के संघर्ष और सौन्दर्य का क्रम और उसकी
द्वन्द्वात्मकता तीनों कविताओं में है। तीनों का देश एक है, काल के संदर्भ
भिन्न-भिन्न हैं”। (पृ. 29) ‘वनबेला’ कविता की विवेचना जीवन सिंह आधुनिक परिवेश और
मूल्यों के आधार पर करते है। इस कविता का वस्तुतत्व अपने क्रमिक विकास के साथ
नेहरुकालीन राजनीतिक अवमूल्यनों को केंद्र में रखता है। जीवन सिंह की राजनीतिक समझ
और जानकारी इस लंबी कविता के अर्थ उद्घाटन में उपयोगी सिद्ध हुई है। नेहरू के
राजनीतिक चरित्र की वर्तमान में अलग-अलग दृष्टिकोणों से काफी आलोचनाएं मौजूद हैं,
तो उनके समर्थकों में उनके प्रगतिशील और आधुनिक विचारों के प्रति लगाव भी है लेकिन
निराला की ‘वनबेला’ और ‘महगू महंगा रहा’ कविता में नेहरू के पाखंडपूर्ण
व्यक्तित्व को व्यंग्य के माध्यम से प्रकट किया गया है। निराला समय के ‘गहन अंधकार’ और ‘अमानिशा’ से बखूबी परिचित हैं।
इसलिए उनमें इस भीषण अंधकार से उद्वेग और निराशा भी उत्पन्न होती है – “अन्याय
जिधर है, उधर शक्ति”, तो दूसरी ओर प्रबल आशा का संचार भी है, जो बड़े शक्ति
केंद्रों के दूसरे छोरों पर अपनी लघुता को अपनी ताकत बनाते हैं। निराला को इन
लघुताओं पर भरोसा है। महगू सत्तासीन सामंती वर्गचरित्र से इतर निराला का मुख्य
जनचरित्र है, जिसमें स्वाधीनता का गहनबोध है। वह भारत की गरीब और शोषित जनता के
सजग नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है और उसे अपने वर्ग की ईमानदारी पर अभिमान है।
यही भारतीयता की मुख्य जाति है। कविता के इस अर्थ का उद्घाटन यह पुस्तक प्रस्तुत
करती है। इस दृष्टि इस पुस्तक में जीवन सिंह द्वारा निराला की इन कविताओं का चुनाव
और उनकी भारतीय राजनीति से संबंधित विश्लेषण साहित्य अध्येताओं और निराला के
पाठकों को उनकी कविताओं की गंभीर समझ से परिचित कराने में समर्थ है।
‘अकाल
और उसके बाद’ बाबा नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता है। जीवन सिंह इस कविता को जीवन
क्रियाओं से निर्मित कविता मानते हैं। वे लिखते हैं कि यह कविता केवल अकालजन्य
स्थितियों का ही बयान न होकर आम किसान और गरीब जीवन की सामान्य परिस्थितियों का
चित्र है। इसे यदि अकाल की कविता न भी माना जाए तब भी यह अपना पूर्ण अर्थ भारतीय
सामान्य किसान जीवन की बदहाली को पूर्णतया प्रकट करती है। जीवन जी ने नागार्जुन की
इस कविता में प्रयुक्त क्रियाओं को कवि के जीवन व्यापार की लोक समझ से अर्जित
बताया है। वे बाबा नागार्जुन की इस कविता की रचना शिल्प को किसी तार्किक दृष्टि से
न देखकर उसे जीवन संबद्धता से जोड़कर देखते हैं। चूल्हे के रोने और चक्की के उदास
होने को, चूल्हे के उदास होने और चक्की के रोने में नहीं बदला जा सकता। इसके पीछे
वे लोक मान्यताओं और जीवनक्रम की सत्यता की दृष्टि को स्वीकार करते हैं। वे मानते
हैं कि बाबा नागार्जुन अट्टालिकाओं में बैठकर जीवन व्यापार पर टिप्पणियाँ देने वालों से अलग इन जीवन
क्रियाओं के गहरे साधक रहे हैं।
इसी
क्रम में केदारनाथ सिंह की ‘सृष्टि पर पहरा’ कविता-संग्रह की चर्चित कविता
‘भोजपुरी’ और विजेंद्र कुमार की कविता- संग्रह ‘कठफूला बाँस’ के संबंध में जीवन
सिंह के विश्लेषणों को एक साथ देखें तो केदारनाथ सिंह की कविता ‘भोजपुरी’ के
माध्यम से उन्होंने समाज में बढ़ रही भाषिक संकीर्णताओं को खत्म करने का बेहतर
विकल्प तलाशा है, जिसमें केदार जी ने बोली और भाषा के अंतःसंबंधों को स्पष्ट किया
है। जीवन जी की दृष्टि केदार और विजेंद्र की उन कविताओं की ओर जाकर रुकी, जिनमें
बोली और भाषा, स्थानीयता और वैश्वीकता, गाँव और शहर के बीच के संबंधों और संघर्षों
का एक विकल्प प्रस्तुत है। ‘भोजपुरी’ कविता में जहां बलिया और भोजपुरी का पुरबिहापन
उभरकर सामने आता है, वहीं विजेंद्र की कविताओं का ब्रज क्षेत्र अपने जनपदीय
विशेषताओं के साथ-साथ जनपदीय इतिहास की प्रमुखता के साथ आता है। ये कविताएं
संकीर्णता के उलट उदार चेतना की व्यापकता का प्रसार करने में सक्षम हैं। इन
कविताओं में ऐंद्रिक क्रियाएं सक्रिय मिलती हैं। विजेंद्र अपने स्थानीय बोध को
देखे हुए दृश्यों में व्यक्त करते हैं। जिनमें एक विशिष्ट अर्थ उभरता है और कविता
स्थानीय रंग के साथ प्रकट होती है।
कविता
में स्थानीयता या जनपदीयता के तत्व देखकर जीवन सिंह आह्लादित जान पड़ते हैं। यह
आह्लाद स्थानीय तत्वों के आगमन मात्र से अतिभावुकता पैदा नहीं करती, बल्कि स्थानीयता
के तत्वों का वैश्विक प्रसार उन्हें आकर्षित करता है। उनकी आलोचना परिधि इन
कविताओं के साथ वैश्विक उदारता के बिन्दु तक पहुँचती है। पुस्तक में सम्मिलित नई
पीढ़ी के कवियों के संग्रहों की समीक्षाओं का बीज तत्व इन्हीं स्थानीयताओं की तलाश
तक पहुँचती है। इन स्थानीयताओं के आलोक में लगभग सभी कवियों की कविताओं के केंद्र
में मेहनतकश वर्ग और उसके कर्म के प्रति ईमानदारी जीवन सौन्दर्य का निर्माण करती
है। इसलिए ये संग्रह और इनकी कविताएं जीवन और प्रेम की कविताएं है। जीवन सौन्दर्य
की कविताएं रीति कविताओं के फ्रेम को तोड़ती हैं। इनमें मध्यमवर्गीय उलझन, तनाव,
जटिलताएं न होकर, अभाव में जीवन जी रहे निम्नवर्गीय किसान और ग्रामीण जीवन के सहज
सौन्दर्य का भाव प्रस्फुटित होता है। जीवन सिंह सुरेश सेन ‘निशांत’ की कविताओं को
‘प्यार में जीवित कविता’ की संज्ञा देते हैं और उनकी कविताओं में पहाड़ी जीवन के
संकेतों की भरमार बताते हैं – “... उनकी कविताओं के अधिकतम रूपक धरती, पहाड़, नदी,
पेड़, बीज और पहाड़ी औरत के उन संघर्षों और सामंजस्यों से बने हैं, जहां व्यक्ति एक पहाड़ी
रूपक में बदल जाता है और पहाड़ स्वयं एक व्यक्ति का जीवन जीने लगता है”। (पृ.166)
इन कविताओं से पहाड़ी जीवन के तत्वों को निकाल देने पर ये संवेदनशून्य हो जाएंगी।
पहाड़ी जीवन पर आधारित कविताओं का ऐसा ही रूप महेशचंद्र पुनेठा की कविताओं में भी
मिलता है। केदारनाथ सिंह के विषय में जिस पुरबिहापन को जीवन सिंह जनपदीय विशेषता
के रूप में विश्लेषित करते हैं, वह केशव तिवारी की कविताओं में दूसरे विशिष्ट
तरीके से आता है। इनकी कविताओं में अवध क्षेत्र की संस्कृति बहती मिलती है। चाहे
वह दरवाजे पर घूम-घूमकर गीत गाने वाले जोगियों पर लिखी कविता हो, या दीपावली पर
‘खेत जगाने’ की प्रचलित प्रथा। केशव तिवारी जितने इन प्रथाओं से परिचित है, उससे
कम जीवन सिंह नहीं हैं। वे इन प्रथाओं के बारे में विस्तार से पाठकों को परिचित
कराते है। अवध क्षेत्र में प्रचलित ये प्रथाएं एक लोक संस्कार के रूप में प्रचलित
हैं। ये प्रथाएं जीवन में उत्सव बढ़ाती है। उत्सवधर्मिता भारतीय संस्कृति का
प्राणतत्व है, जो केवल अवध क्षेत्र की ही विशेषता नहीं, बल्कि ऐसे तमाम जनपदीय
संस्कारों की उपज है। आगे बलभद्र, एकांत श्रीवास्तव और ऋतुराज की कविताएं इसी क्रम
में विवेचित हैं। अविनाश मिश्र की कविताओं में परिपक्व दृष्टि की तलाश एक छोटे लेख
में किया गया है।
निर्मला
पुतुल की कविताओं को जीवन सिंह दोहरी चुनौतियों से टकराते हुए देखते हैं। एक
आदिवासी जीवन, दूसरे स्त्री- जीवन की चुनौतियाँ। प्रकृति का साहचर्य आदिवासी जीवन
का प्राण है। वे निर्मला की कविताओं को वैश्वीकरण की वैश्विक चुनौतियों को उजागर
करते देखते है। आदिवासियों की आजीविका का साधन जल, जंगल और जमीन केवल आजीविका का
साधनमात्र न होकर उनके प्रेम, उत्सव और जीवन व्यापार का अंग है। नंद चतुर्वेदी और
ज्ञानेंद्रपति अपनी कविताओं के माध्यम से गहन अंधकार से परिपूर्ण इन शताब्दियों
में आशा का संचार करते हैं। मुख्य रूप से नंद बाबू की कविताएं इस कठिन दौर में
बलवती आशा का पुंज बनकर आती है। उनकी अधिकांश कविताओं की शुरुआत समय की क्रूरताओं
और उसके परिणामों से होती हुई आगी बढ़ती हैं, परंतु इस कविताओं का अंत प्रबल आशाओं
का कोई न कोई सूक्त बना जाती हैं। इस पूरी पुस्तक में जीवन सिंह ने निराला,
नागार्जुन, केदारनाथ सिंह आदि हिंदी के बड़े कवियों की कविताओं के माध्यम से जिस
मेहनतकश वर्ग के जीवन सौंदर्य को स्थापित करने का प्रयास किया है, कमोबेश चयित सभी
संग्रहों का स्वर अपनी विशिष्टताओं के साथ उसी वर्ग के साथ रही है। अन्याय
अत्याचार के प्रति सच्ची हिंदी कविता का पक्ष सदैव स्पष्ट रहा है। जीवन सिंह की इस
आलोचना पुस्तक को सैद्धांतिक आलोचना के मानकों से देखने के बजाय लोक चेतना संपन्न
व्यावहारिक आलोचना का सशक्त उदाहरण माने जाने में कोई हिचक नहीं। निश्चित रूप से
यह आलोचना पुस्तक हिंदी कविता के पाठक वर्ग को राजनीतिक और भारतीयता के रूपों से
समृद्ध करेगी। जितनी आलोचना है, उतनी ही रचनात्मकता भी है यहाँ।
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कविता की अर्थवत्ता :
जीवन सिंह, प्रकाशक – कौटिल्य बुक्स, दरियागंज,
नई दिल्ली, प्रथम संस्करण : 2021, कुल पृ.सं. 194
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आशीष
कुमार तिवारी, शोध छात्र, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, 202001, मो.
7905429287
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