Monday, 15 January 2018

मजदूर का किला
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देश भर में खबर फैल गई कि
किला बनकर तैयार हो चुका है
किले को बनाने में जुटे लाखों हाथ
अपनी धूल झाड़कर
किले के मुख्य द्वार पर कतारबद्ध होकर
तालियां बजा रहे हैं
लाखों हाथों की तालियों की गूंज
आकाश में टकराती हुई
विश्व के कोने-कोने में बसे
इंसानों को न्यौता दे रही हैं
किले की मुँहदेखाई के लिए

लोग घरों से निकलकर
दौड़ पड़े हैं किले की ओर
धीरे-धीरे करोड़ों पाँवों की धमक
एक लय में बदल चुकी है
लयात्मकता में एक भयंकर आवृति से
धरती में भूकम्प जैसी हलचल होने लगी

राजा और सारे मंत्री,सिपहसालार सब
शराब के नशे में झूमकर आनन्द ले रहे थे
अचानक राजा की टोपी सिर से भसक गई
शराब गिलास से छलक कर गिर गई
सभी डगमगाने लगे...
जो लोग धरती पर पाँव टिकाकर
तालियां बजा रहे और
जो लोग पाँव के बल चलकर
किले की ओर आ रहे
वे तैयार हैं
अपने होश में हैं
पर जो महल में बैठे हैं
उनके लिए भयानक भूकम्प प्रतीत हो रहा

दर्शकों का हुजूम देखकर
मजदूरों ने आइये-आइये की मुद्रा में
हाथों से इशारा करते हुए
दौड़ते हुए भीतर की ओर जाने लगे
मानो बेसब्र हैं सारी कला दिखाने को

राजा ने महल की खिड़की से करोड़ों
मनुष्यों को आते देखा तो घबरा गया
राजा हकलाने लगा
रुँआसा हो गया
मानों आज अंत आ गया हो
उसने भागने के लिए प्रबन्ध करने को कहा
हाथ कांपने लगे उसके
तभी उसने देखा कि सारी भीड़
नए बने किले की ओर मुड़ गई
उसे ताज्जुब हुआ
उसने सोचा,इतने से कम मनुष्यों को लेकर
मैं तो राज्य नष्ट कर देता हूँ
नगर उजाड़ देता हूँ
धन-दौलत लूट लेता हूँ
पर ये तो भरे महल को छोड़ कर
ईंट पत्थरों के खाली किले की ओर मुड़ गए
मेरे साथ के मनुष्यों में
और इन मनुष्यों में कितना भेद है
लम्बी सांस लेते हुए वह सोच रहा कि
आज तो इन मनुष्यों ने बख्श दिया
ये किले में जाएँ तो जाएँ
इनसे छेड़खानी कोई न करे बस
क्या पता क्या हो जाय

उधर दर्शक एक-एक कलाकृति को
छूकर,आँखें फैलाकर
देख और महसूस कर रहे
एक दर्शक ने पूछा कि
कैसे इन पत्थरों में फूल उकेरा आपने
तभी एक मजदूर ने
अपनी कला को दिखाने के लिए
ख़ुशी से हड़बड़ाकर
हथौड़े और छेनी से एक पत्थर
पर धार बनाना शुरू किया
जल्दबाजी के वजह से हथौड़े का वार
उसकी ऊँगली पर पड़ गया
वो लहूलुहान हो गया
दर्शक ने तुरन्त मजदूर की उंगली से
निकलते खून को
मुँह लगाकर बन्द करना चाहा
और बोला तुम फिकर न करो
मैं आने वाले हर एक को
तुम्हारे रक्त की इस ललाहट
को इन पत्थरों पर दिखाऊंगा

मजदूर भावुक हो गया
उसके आंसू छलक पड़े
भरी आँखों से उसने दर्शक से कहा
आप मेरे हथौड़े के गलत वार को देखकर
सोच रहे होंगे कि
मैंने इसमें कोई मेहनत नहीं की होगी
पर मेरा यकीन कीजिये
मैंने जी-जान से इसमें अपनी कला उतारी है
दर्शक हाथ उठाकर
उसे यह समझाना चाह रहा कि
वह सब जान रहा
पर मजदूर भावुक मन से
अपने मेहनत की सफाई दे रहा
वो बहते खून की परवाह किये बिना
दर्शक का हाथ पकड़ कर उसे दौड़ाकर
दूसरी दीवार तक ले गया
उसने इशारा करते हुए कहा
"वो देखिये
इन दीवारों पर जो पत्तियों की छितरन
दिखाई पड़ रही है
वो मेरी माँ के आँचल के किनारों
की नकल है
जो मैंने बचपन में
माँ के आँचल में
अपने भीगे चेहरे को पोछते हुए
देखा था.....

Friday, 23 June 2017

माँ के जैसा सोच पाना बहुत कठिन है


● कविता

बच्चा रो रहा है
पैर पटक रहा है
आँखों से आँसू बह रहा है
पर माँ उसका हाथ अपने हाथ में लेकर
बच्चे का बस्ता अपने कन्धे पर लटकाये
निर्दयी होकर स्कूल ले जा रही है

बच्चे को देखकर दया तो बहुत आ रही
पर माँ की नज़र से सोच पाना बड़ा कठिन है
वो जानती है भविष्य के थपेड़ो को
जो इसी बच्चे को आगे बेरोजगार बना देगी
इसलिए उसे मजबूत बनाने के लिए
निष्ठुर बन गयी

बहुत दूर तक देख पा रहा हूँ कि
माँ उसे लेकर चली जा रही है
माँ रुक नहीं रही उस बच्चे के आँसुओं से
माँ उसे पहुंचा आना चाहती है
उस जगह तक
जहां से वो अपना भविष्य बनाने में समर्थ हो सके

माँ के जैसा सोच पाना बड़ा कठिन है....

     आशीष कुमार तिवारी

Thursday, 22 June 2017

मुझे पीड़ा है सरकारों के होने से

आशीष कुमार तिवारी

●कविता

घुटन होती है मुझे
जब सुनता हूँ किसी नेता को 
फलां पदाधिकारी नियुक्त किया जा रहा

दुःखी होता हूँ जब विश्व-शान्ति के लिए
हथियारों की खरीद-फरोख्त से 
सन्तुलन बनाने की कोशिश होती है
और देश के भीतर कोई परिवार
रोटी और मकान के लिए जंग लड़ता है

ये कोई प्रचलित मुहावरा नहीं
बल्कि चिरपरिचित भारत की दशा है

दर्द होता है तब जब नौजवानों की तादात
सड़कों पर निरुद्देश्य 
साँझ-सवेरे हिलती-डुलती दिखाई देती है
जिनमें लाचारी और टूटन के अलावा 
कुछ नहीं है

और इनके बरक्स देश के अधबुढ़ नेता
मरते दम तक रोजगार में बने रहते हैं

टूट जाता हूँ जब सुनता हूँ 
कोई नौजवान सरकारी विचारधारा से
असहमति के कारण गायब कर दिया जाता है
और उसकी माँ उसका सूनापन आँखों में लिए
सरकार से भीख मांगती है उसके पते की

पर सरकार है कि 
उम्मीदों का दिया बुझाने में माहिर है
पर सरकार है कि बस विदेशों से सौदा करती है
न जाने कौन सा सौदा करती है 
जिसका प्रतिफल किसी दूर के गाँव में रहने वाला 
सत्तर सालों में अपने घर से खोजता है
पर कुछ पाता नहीं

समय ऐसा है जिसमें
भैंसा भी इंसान के बैल बनने पर हंसता होगा
तब क्या आप को पीड़ा नहीं होती
मुझे तो पीड़ा होती है सरकारों से....
 




Wednesday, 14 June 2017

गांधी


                                 

● कविता

बचपन से ही जब भी
गांधी शब्द की ध्वनि
कानों में पड़ती
तब
एक अधनंगा फकीर
आँखों के सामने प्रकट हो जाता था

आज भी वही बिम्ब बनता है
उस शब्द के उच्चारण से

जिसकी लाठी देश की पीड़ा को
दूर करने के लिए गतिशील रही
उसकी निष्ठा को कुछ कथित नेता
बनिया की तराजू साबित कर रहे

अक्सर लाठियाँ या तो हिंसा के लिए
या लाचारी की दशा में सहारा होती हैं
पर वो लाठी आजादी की दिशा में
देश की जनता का रथ बनी थी
उसका उसूल हिंसा न था

गांधी की भीतरी प्रेरणा के
सत्याग्रह बल को ,
उसके मूल्यों को
बनिया के लाभखोर मूल्यों से तौलना
कथित नेताओं के मरे हुए मूल्यों को
व्यक्त कर रहा

त्रासदी है
एक निःस्वार्थ महानायक को
अपमानित करना।

-आशीष

Friday, 9 June 2017

इस तरह हमारा देश कृषि प्रधान है

● कविता

भारत एक कृषि प्रधान देश है
जहां किसान नंगा होने को मजबूर है
जहाँ किसान मूत्र पिता है
और
कृषि की प्रधानता को बनाये रखने
अपने रोजगार को बचाये रखने
के लिए आवाज उठाता है
तब उसे गोली मार दी जाती है

इस तरह भारत में
किसानों की लाशों से खेती होती है
चाहे हत्या से,चाहे आत्महत्या से

इस तरह भारत एक कृषि प्रधान देश है..

      आशीष कुमार तिवारी

Monday, 5 June 2017

बेना

                                        




                                                
  बेना
●कविता

गर्मी का मौसम
पहले भी आता रहा है
चिपचिपी गर्मी तब भी थी
पर बचपने में जब हम
दोपहर में दाल-भात खाने
बैठते थे तब गर्मी से व्याकुल होकर
अधूरा खाना छोड़कर भाग जाते
तब माँ पकड़ के लाती
और
दादी के सामने बैठाकर
थाली फिर से पकड़ा कर चली जाती
उस वक्त दादी के हाथ में ' बेना' होता था
जो दादी के हाथों की धुरी पर घूमता रहता
दादी के हाथ और बेना की संगत
मुझे गर्मी से राहत देती थी
वो दादी का पालथी मार के बैठना
और
हाथ में पूरी पृथ्वी की तरह बेने को घुमाना
अपनी जरूरत को तब प्रकट करता है
जबकि आज बिजली घण्टों नहीं आती
सभ्यता की नमीं कमजोर पड़ने पर
कुछ पुरातनताएं उसे स्थायित्व देती हैं
तब मुझे बेना याद आता है

                    आशीष कुमार तिवारी

Saturday, 3 June 2017

किसान ही भगवान है

           

●कविता

गेहूं की पकी बाली और
सूरज की सुबह की लाली
अपनी मौजूदगी मात्र भर से
जीवन को खुशहाल कर देती है

सूरज की रौशनी
गेंहूँ को ऊर्जा देती है
और गेहूं सारे भूखे इंसानों को
एक तरह से हम सूरज को ही खाते हैं
शायद किसान हनुमान हों
जो उड़ने की असमर्थता के चलते
अपने परिश्रम से
सूरज का रूपांतरण करता है
और शायद
अकेले न निगल पाने की वजह से
पूरे मानव-समुदाय को बाँट कर
निगलता है
ऐसा लगता है किसान ही हनुमान है
जिसमें ताकत है सूरज को निगल जाने की
युग की भयावहता ने
शायद हनुमान को कई खण्डों में
किसानों के रूप में बाँट दिया है
पर किसानों ने भी तो सूरज के ताप को
खण्डों में बांटकर सबको खिलाया है...

              आशीष कुमार तिवारी

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