Wednesday, 30 August 2023

ऊँचाइयों वाले बौनेपन से दूर : परितोष चक्रवर्ती का काव्य

 कवि परिचय-

हिंदी साहित्य समुदाय में परितोष चक्रवर्ती का नाम नया नहीं है, यह भी नहीं कि वे अपनी पहचान स्थापित करने के लिए संघर्षरत हैं, बल्कि वे तो अपनी कविताओं के बल पर अपनी पहचान स्थापित कर चुके हैं। इनका जन्म 7 अप्रैल, 1951 को सक्ति, मध्यप्रदेश में हुआ। इनके प्रथम काव्यसंग्रह ‘अक्षरों की नाव’ का प्रकाशन 1996 में हुआ। पेशे से मूलतः पत्रकार होने के नाते पत्रकारिता में तल्लीनता के चलते इनका दूसरा संग्रह ‘ऊंचाइयों वाला बौनापन’ ग्यारह वर्षों के बाद सन् 2007 में प्रकाशन में आया। परितोष मूलतः कहानीकार के रूप में जानें जाते हैं लेकिन कविता में भी उनकी कलम उतनी ही सधी हुई है। पत्रकार होने के नाते उनके मानस में तमाम घटनाओं और कथाओं की स्मृति संचित रही है, जिसके प्रभाव में उनकी कविताएं भी कथात्मक हो गई हैं। उनकी कविताओं में भी एक प्रखर पत्रकार का तेवर दिखाई पड़ता है। इनके साहित्यिक योगदान की चर्चा में काव्यसंग्रहों के अलावा एक उपन्यास ‘अभिशप्त दाम्पत्य’, एक नाटक ‘मुखौटे’, एक कहानीसंग्रह ‘घर बुनते हुए’ प्रकाशित हुआ। इसके अलावा बांग्ला उपन्यासकार मतिनंदी के तीन उपन्यासों- ‘स्टॉपर’, ‘स्ट्राइकर’ और ‘कोनी’ का अनुवाद किया। परितोष सितंबर 2003 में राष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका ‘लोकायत’ के संस्थापक संपादक रहे हैं, परंतु उन्हें साहित्यिक बिरादरी के कुछ नामचीनों के षड्यंत्र का शिकार होना पड़ा और पत्रिका का मालिकाना हक उनसे छिन गया। वर्तमान में लोकायत के संपादक कहानीकार बलराम हैं। इसी घटना के बाद परितोष ने दिल्ली छोड़ दिया और रायपुर में ‘जनसत्ता’ अखबार के संपादक के रूप में कार्यभार संभाला। वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निवास कर रहे हैं।

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साहित्य में जब गूढ़ शब्दों का प्रयोग बढ़ जाए, तब मनःस्थितियों को व्यक्त कर पाना और पाठकों द्वारा उसे आसानी से समझ पाना दुष्कर हो जाता है। भाषा की गुरुता भावों को दबा देती है। मन व्यथित का व्यथित ही रह जाता है, पर भावों को पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं मिल पाती। वर्तमान दौर की छद्म संस्कृति ने भावों की प्रबलता को उत्तेजना में तब्दील कर दिया है। यही उत्तेजना कविमन में उफनकर उससे सवाल करती है- “भीतर की उत्तेजना ने/उफनकर पूछा/ क्यों लिखते हो तुम”1 ‘ उत्तेजना’ से पैदा हुए सवाल, “क्यों लिखते हो तुम” से कवि उत्तेजित नहीं है, बल्कि वह संयत भाव से अपने भीतर उपजे असंतोष को कविता में अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम है। कवि अपनी आत्मीयता की रक्षा, उत्तेजना से कर सकता है। इस संदर्भ में नामवर सिंह, सुरेन्द्र चौधरी का एक कथन उद्धृत करते हैं, “आज के उत्तेजित वातावरण में कवि की आत्मीयता की रक्षा सबसे जटिल प्रश्न बन गई है। असफल कवि इस आत्मीयता को उत्तेजना की कीमत पर बेच रहा है और नाम युग-संवेदना का दे रहा है। अपना असंतोष उसके लिए रचनात्मक माध्यम उतना नहीं है जितना प्रचारात्मक माध्यम है। वह अपने नैतिक भोंथरेपन को उपचारों से ढाँकने में  अपना अपव्यय कर रहा है।” कवि परितोष अपनी कविताओं में इस ‘नैतिक भोंथरेपन’ को खुद पर लादते नहीं दिखते, बल्कि वे इसे उतार फेंकना चाहते हैं-


“क्या उत्तर देता ?

इंटरव्यू देता होता

तो

भारी-भरकम ओवरकोट की

भाषा तराशता

सिद्धांत बघारता

या विसंगतियों को रोते हुए

टीवी की दीवानगी से

दांत खुरचकर

खुश हो लेता”3

 

तब कवि को भाषा के लबादे को उतारकर अपनी व्यथा कहनी पड़ती है। न्याय करना पड़ता है अपनी अंतरात्मा की पीड़ा के साथ मानव द्वारा किए जा रहे अन्याय व अत्याचार को नैतिक मूल्यों ने साधारण अपराध न मानकर चुप्पी साध ली। यह उन नैतिकताओं की सतही सहिष्णुता या सहिष्णु होने का ढोंग कहा जा सकता है, परंतु सारे नैतिक मूल्य तब पूर्णतःअसहिष्णु हो जाते हैं, जब दमित मानव मन की आवाज को अनसुना व उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। तब कविता अपने समस्त हथियारों से सुसज्जित होकर उस पीड़ा के कारणों को कोसना व धिक्कारना शुरू कर देती है और कवि ‘अक्षरों की नाव पर’ सवार होकर इन दुखों की नदी को पार करने की कोशिश करता है। लेकिन कवि को सुबह की प्रतीक्षा में रात भर जागी आँखों की तुलना में अपनी अक्षरों की नाव कम अहमियत वाली मालूम होती है।

 

“क्या उत्तर देता ?

एक अदद सूर्योदय के लिए

अनगिनत आँखें

रात भर जागी हैं

ऐसे में

घुप्प अंधेरे के समुद्र में

अक्षरों की नाव पर

यात्रारत  

भला क्या उत्तर देता?”4  

 

जितनी तेजी से आधुनिकता बढ़ रही है,संवेदनहीनता का ग्राफ उसी अनुपात में बढ़ता जा रहा है। वह कोमल प्रवृत्ति,जिसके होने से मानवीय मूल्य अस्तित्व में है, जकड़बंदी का शिकार होता जा रहा है। जब संपूर्ण मानवता अपने अस्तित्व और गरिमा की तलाश में है, तब एक कवि कैसे उन्हें मात्र अक्षरों के माध्यम से बर्गला सकता है। “भला वह क्या उत्तर देता” यह विवशता की स्थिति को व्यक्त करता है। लीलाधर जगूडी अपने आत्मवक्तव्य में कहते हैं, “मनुष्यता के मूलभूत गुण और मानवीय क्रूरताओं के समकालीन अत्याचारों के बीच कोई भी एक तटस्थ लेखक हो ही नहीं सकता। लेखक कैमरा नहीं है, लेखक एक संवेदनशील आँख है, जिसके पास विचारधारा से पहले आंसुओं की धारा है। मुझे लगता है, मैं कवि होकर खुद का शिकार कर रहा हूँ और खुद अपने मनुष्य होने का शिकार  हो रहा हूँ”5  । इस स्थिति में पहुंचा प्रत्येक संघर्षशील मन अपनी पूरी पीढ़ी के आगे निरुत्तर है। परितोष जी ने इस निरुत्तरता की विवश मनोदशा को अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति प्रदान की है, परंतु प्रश्न इतना जटिल है कि भाषा की पकड़ से बाहर प्रतीत होता है।

 

परितोष जी का यह प्रथम काव्यसंग्रह ‘अक्षरों की नाव’ विषयवैविध्य की दृष्टि से, खोटे हुए जीवनमूल्य, टूटते संबंध, सांप्रदायिकता की त्रासदी, आत्मविरुद्धता और मानवाधिकारों की श्रेणी में या सक्ने वाले सभी बिंदु समाहित हैं। परमानंद श्रीवास्तव ने उनकी कविताओं के संबंध में कहा, “मध्यमवर्गीय परिवार और संबंधों में प्रवेश करते हुए परितोष एक ऐसी गाथात्मक कविता लिखते जान पड़ते हैं, जिसमें स्मृतियाँ एक संसार बनाती हैं और अतीत को वर्तमान में, वर्तमान को भविष्य में गड्डमड्ड करती हैं। नाम, चेहरे, परछाइयाँ, आँगन, चरित्र एकदूसरे में विन्यस्त हो जाते हैं”

     

हमारे देश और समाज में सांप्रदायिकता की जो आग आज़ादी के ही दिनों से लगी थी, उसकी लपटों ने आज तक न जाने कितने ही घरों को खाक में मिला दिया। हिंसा के इस नंगे नाच में जिसकी वीभत्स हत्या हुई, वह थी- मानवता। परितोष ने मानवता की इस हत्या को अपनी कविता ‘भेड़िये : हमनस्लों के बीच’ में चित्रित किया है। पहली बार जब भेड़िये बस्ती में आए तो सारी बस्ती सतर्क थी, बकरियाँ भय के मारे चारों ओर टुकुर-टुकुर ताक रही थीं,गाएं अपने बछड़ों की हिफ़ाजत में रात भर अपलक ताकतीं रहीं, बच्चे भय के मारे बिना लोरियाँ सुने ही माँ की छाती से दुबककर सो गए। इस शांत, परंतु चौकस बस्ती को सूंघकर भेड़िये लौट गए। जब भेड़िये पुनः लौटकर आए, तो उन्होंने देखा कि इंसानों ने ही इंसानों के घर जलाकर राख कर दिया है, हर शरीर पर धारदार हथियारों के गहरे घाव हैं, तब-

 

“फिर या गए भेड़िये

  जंगल से बाहर

  .......

जब आ गए भेड़िये

कोई सहमा  नहीं,

भागा भी नहीं कोई

भेड़ियों ने देखा

आदमी की समूची देहसत्ता पर

उनके दांतों से ज्यादा

धारदार हथियारों के दाग,

कड़वाई आँखों में

खतरनाक नाखून की किरचें

पहले से ही शिकार कर गए थे यहाँ

............                                                    

जैसे आए थे भेड़िये

वैसे ही लौट गए

खिन्न..उदास..और अनमने...”7

 

इस कविता को पढ़ते हुए ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई’ फिल्म का एक संवाद स्मरण आता है जिसमें पुरुषों के वहशीपन शिकार होने से बचने के लिए फिल्म की नायिका गंगा सड़कों पर भागती हुई जाकर श्मशान घाट में छिप जाती है, जहां लाशें जलाई जा रही होती हैं। डोम के पूछने पर कि क्या तुम यहाँ की लाशों से डर रही हो, तब वह मानवीय सभ्यता पाशविकता की छाया तले आकर अपना क्षरण होता देख रही है। जब मानव की पशुता के आगे पशु की पशुता भी स्तब्ध है तो मानवीय सभ्यता का और अधिक मूल्यांकन करने में भी मन में असंतोष पैदा होता है। जब जीवन ही मृत्यु बन जाए तो मृत्यु का कारोबार आसान हो जाता है।

 

यहाँ प्रश्न यह पैदा होता है कि जब पशु अपनी पशु अपनी पशुता नहीं छोड़ पाता, तो हम इंसान अपनी इंसानियत कैसे छोड़ रहे हैं? क्या हम इंसानों की संतानें नहीं हैं, जो अपने मूल्यों की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं? और यदि हम ही हैं तो कहाँ गई हमारी इंसानियत?   

 

“भेड़िये अगर भेड़िये हैं

तो आदमी, आदमी क्यों नहीं रह सकता!”8  

 

मानव की इस दश को देखकर परितोष जी का कवि, कविता से माफी माँगता है और उसे अक्षरों की नाव पर बैठाकर बहलाना-फुसलाना नहीं चाहता। कवि विद्वतापूर्ण भाषा के प्रयोग के माध्यम से कविता को बोझिल नहीं करना चाहता। जिस तरह से मानव होने की पहली शर्त है- संवेदनशीलता, उसी तरह कविता भी संवेदनशीलता की प्रबल मांग करती है। शाश्वत मूल्यों से विहीन होकर कविता जहां क्रंदन कर रही है, वहीं कवि वर्ग को अपने मंचीय प्रतिष्ठा से ही फुर्सत नहीं है। कविता की आंतरिक अशांति को शांति-समितियों के माध्यम से शांत करने की कवियों द्वारा बचकानी कोशिश की जा रही है-

 

“कविता

हमें माफ करना

तुम्हारा क्रंदन

अनसुना कर हमें जाना था

शांति-समितियों की प्रतिष्ठा-बैठक में.....”9  

 

कवियों व लेखकों की इस प्रकार की निष्क्रियता पर व्यंग्य करते हुए कवि अष्टभुजा शुक्ल अपने काव्यसंग्रह ‘पद-कुपद में लिखते हैं-

“कविजन खोज रहे अमराई।

जनता मरे मिटे या जूझै इनने ख्याति कमाई।”10  

 

संबंध हमेशा ही मानव-जीवन में एक छत्रछाया का आभास कराते हैं। जब छोटा बच्चा बाहर की दुनिया के अचंभे दृश्य देखता है तो डर के मारे वह माँ को पुकारते हुए उसके आँचल तले जाकर छिप जाता है। उस वक्त वह स्वयं को सुरक्षित पाता है और यह सत्य भी है कि माँ सारे दुखों और भ्रांतियों को निर्मूल कर देने की पूरी कोशिश करती है। बाहरी हिंसात्मक शक्तियों से लड़ने में कवि ने संबंधों के घेरे में जाकर एक ढाल बनाया है जिसने हिंसा, छल, भय इत्यादि से लड़ने की ताकत दी। यह सत्य है कि संवेदना में बहुत सुकून मिलता है जिसके आश्रय में आने पर सारे दुख-दर्द से राहत मिलती है। परितोष जब इन हिंसा-पशुओं से लड़ने के लिए ढाल उठाने जाते हैं तो सबसे पहले माँ की याद आती है जो हर मुसीबत  के वक्त उनका उत्साह बनाए रखती थी, पर आज वो नहीं मिली-

 

“मेरी समझ में यह नहीं आया

कि तेज आंधी में

जड़ सहित उखड़े पेड़ को देखकर

माँ!

तुम्हारी याद क्यों आती है”11

 

जब-जब भाइयों के खेत के गन्ने उनकी लाठियाँ बन गई, तब-तब कवि परितोष को माँ की याद आती है जो उन गन्नों की गांठों के बीच रस बनकर हमेशा दौड़ना चाहती थी। जिससे वो गन्ने रसयुक्त ही बनें रहें। रसीले गन्ने सूखकर लाठियाँ न बन जाएँ। इसलिए माँ हमेशा रस बनकर उन दोनों के बीच संचरित होना चाहती थी। अपनी ‘गन्ना’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं-

 

“जाने कब लट्ठ बन गए

दोनों भाइयों के गन्ने

और कई-कई गांठों के बीच

रस बनकर रहने को

तरस गई थी माँ”12  

 

तीव्र गति से बदलते मूल्यों के दौर में कवि वर्तमान समस्याओं का हल संबंधों के सम्मुख खड़ा होकर ढूँढता है। स्त्री को उपभोग की वस्तु समझकर जिस तरह से उसके प्रति हिंसा व बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं, उसका हल उन्हें माँ के सम्मुख जाने पर मिलता है। ‘माँ की तरह देखना’ कविता में वे इंसान के भीतर के रह रहे बलात्कारी कीड़े की परख करते हैं, जिसका बड़ा होते जाना समाज के लिए कैंसर के समान खतरनाक रोग बन जाता है-

 

“बस तभी वह

आँखों से उतर

पीठ पर उतर जाता है

जब माँ सामने पड़ जाती है

स्नेह-थपकियाँ माँ की

हमारी पीठ पर

कीड़ों को भी सहला जाती है

 

उतना ही देर तक

प्रवृत्तियों की साँसे रोक लेता है वह

माँ के जाते ही फिर छा जाता है

 

सभ्यता को

डँसता रहेगा यह कीड़ा लगातार

जब तक हमें

माँ की तरह देखना

नहीं आ जाएगा”13  

 

कवि परितोष अक्षरों की नाव पर सवार होकर कविता के साथ न्याय चाहते हैं। उन हजार-हजार आँखों को शब्दों की जुगाली में उलझाना नहीं चाहते, जो अपने अस्मिता के सूरज को उगता हुआ देखने के लिए रात भर जागते रहे हैं। वे कविता में मूल्यों की मांग करते हुए दिखाई देते हैं। इस संग्रह में बहुत सारे मानवीय पक्ष मौजूद हैं,जिन पर व्यापक चिंतन किए जाने की जरूरत है। मूल्यों में इस प्रकार का स्खलन मानवता के बौनेपन का एहसास कराता है। इन मूल्यों की स्थापना के लिए कवि पाठक का ध्यान मासूमियत भरे बचपन की ओर ले जाता है, जहां संवेदनाएं अपने विशुद्ध रूप में संचित है। कवि अपनी कविताओं में बार-बार बचपन का जिक्र करते हैं। इस जिक्र के पीछे कवि का बचपन के प्रति कोई मोह नहीं, बल्कि बचपन की ओर हमारे इंसानियत के मूल तत्वों का कोष की ओर इशारा करना है, जिसकी ओर समाज को आकृष्ट करना है। अपनी कविता ‘चलो छूकर आएं’ और ‘शिशु की तरह’ में वे बार-बार शिशुपन व बालपन को खुलकर जीने की सलाह देते हैं-

 

“गेंद किसकी

इसकी परवाह बड़ों को है

शिशु बनकर जीने में

खेलना प्रमुख होगा

गेंद की मिल्कियत गौण..

 

विसंगतियाँ डरती हैं तो सिर्फ उन्हीं से

इसलिए

चलो शिशु के साथ हो लें...”14  

 

‘चलो शिशु के साथ हो लें’ यह पंक्ति शिशुपन से प्रेम को व्यक्त करती है, दूसरी ओर, कविता के आशय में शिशु के साथ होने का अर्थ संवेदनशीलता से है। सभी दिखने की होड़ में हमने अपने भीतर की संवेदना को निर्जीव कर दिया। सभ्यता के भारीपन ने इंसान के जीवन से मौजमस्ती और फक्कड़पन को खत्म करके उसे अय्याश बना दिया है। इंसान अब जानवरों से भी खतरनाक प्रवृत्ति धारण करने लगा है। एक कविता में जंगल का राजा शेर इस बात को भलीभाँति समझ चुका है-

 

“जंगल के राजा को पता है

बदल जाते हैं यहाँ के समीकरण

जब ‘दुनाली’ लिए फनफनाकर आता है

‘जानवरखोर’ आदम”15   

 

अब जानवर की आदमखोरी, इंसान के जानवरखोरी के आगे बौनी पड़ गई है। तब कविता प्रासंगिक हो उठती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, “ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे, त्यों-त्यों एक ओर कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कविकर्म कठिन होता जाएगा”16 । वृत्तियों पर सभ्यता का आवरण चढ़ना नैसर्गिकता के लिए चुनौती है, तो दूसरी ओर ऐसे में कविता की आवश्यकता का बढ़ते जाना और कविकर्म का कठिन होते जाना विसंगति है। चुनौती और विसंगति से संघर्ष के दौरान कवि तब असमंजस में पड़ता है, जब पिता की असमय मृत्यु के बाद बड़े भाई पर दायित्व का भार आ पड़ता है और कवि को लेखनकर्म में संलग्न देखकर बड़े भाई उन पर क्रोधित नहीं होते, बल्कि चिंतित होते हैं। वे कवि को समझाते हैं कि मनुष्य की विसंगतियों को लिखकर अकेले कितना बुन पाओगे। बड़े भाई कवि को भूख की तृप्ति को सबसे पहला धर्म बताते हैं। बड़े भाई की मृत्यु के बाद ‘अतीत की शवयात्रा’ में वे उन्हें याद करते है-

 

“तुमने कितनी बार कहा है-

हमारी पहली जरूरत रोटी है

और रोटी फुसफुसे आक्रोश की रेत पर नहीं,

श्रम-सिंचित धरती पर

उगा करती है”17  

 

बड़े भाई की मृत्यु के बाद ‘तर्पण’ के दौरान कवि को लगा जैसे बड़े भाई उन्हें चेताकर कह रहे हों कि यदि लिखना तुम्हें यदि सच में आश्वस्त करता हो, तो लिखते रहो। बस याद रखना-

 

“मनुष्य अपनी ही दुनिया में

टापुओं में अकेला न हो जाय

शब्द-सामर्थ्य स्पर्श का पर्याय बनें

स्पंदन कभी

दरवाजे पर से

लौट न जाए बिना दस्तक

एक अदने याचक की तरह..”18  

इन मिटती संवेदनाओं को ज़िंदा रखने और इंसान को इंसानियत के मूल्यों से लबरेज बनाए रखने के लिए कवि परितोष ‘कांटा’ कविता में कांटे का आह्वान करते हैं-

 

“ऐ कांटे, सुन

मुझे चुभ

मरी हुई संवेदनाओं को जगा

......

कई लोग सूखकर कांटा बन गए

पर्याप्त भोजन के बिना

भला बता फिर

कांटे को कांटा क्यों चुभता है?

इन विसंगतियों का हल ढूंढ

आबादी को डँसने वाले को पहचान

ऐ कांटे, सुन”19  

 

तमाम वनस्पतियों, फूलों और वृक्षों में उगे काँटे अपनी चुभन के माध्यम से इंसान की चेतना को झकझोरते हैं और स्मरण कराते हैं उन तमाम वृक्षों की पीड़ा, जिन्हें इंसान अपने लोभवश काटने में संकोच नहीं करता। कांटे को अपने तथा उन तमाम वृक्षों को कटने से बचाने के लिए चुभना पड़ेगा मानव की चेतना में, ताकि वह समझ सके पेड़ों के अस्तित्व की आवश्यकता को। अपनी कविता ‘ऊंचाइयों वाला बौनापन’ में वे जंगलों, पेड़ों और नदियों व पहाड़ों के अस्तित्व की आवश्यकता और उनकी महानता के आगे इंसान की महानता को बौना बताते हैं। एक बूढ़ा वृक्ष, जिसकी जड़ों को छूकर गाँव की बहु ने अपने वजूद पर आरोपित ‘बांझ’ की संज्ञा को मिटाने की विनती की थी और वह बूढ़ा वृक्ष उसे संतान का आशीर्वाद देकर भावुक हो गया था, वर्षों पहले इन्हीं वृक्षों की रक्षा में डटे बंशी गोंड की गर्दन ठेकेदार की टँगिया ने काट दिया था। उसके सूखे खून के धब्बों की कीमत वर्षों से पलाश का वृक्ष अपने रत्नाभ लाल फूलों से अदा कर रहा है, उसका काटा जाना अत्यंत पीड़ादायक है। अगर न होते जंगल तो महाश्वेता देवी को कहाँ से मिलते बिरसा मुंडा, वीरनारायण और प्रवीरचंद जैसे नायक, कैसे रच पाते रेणु ‘परती परिकथा’ का विन्यास। एक पेड़ का काटा जाना केवल पेड़ का कट जाना भर नहीं होता, बल्कि हमारे साँसों की रसद पहुंचाने वाली धमनियों का कट जाना होता है। पर्यावरण के प्रति उनकी सघन सजगता व प्रेम उनकी कविताओं में कवि की भाषा में-

 

“हम कब समझेंगे कि

पेड़ और पहाड़ हमें दिलासा देते हैं

नदियां साथ-साथ चलकर जीना सिखाती हैं

गनीमत है कि

हमारी दुष्ट

प्रवृत्तियों कि परवाह नहीं है

उदार प्रकृति को

जो इतना सहकर भी

हमें दुलारती रही है आज तक

कहीं बदतमीजी की

वह एचडी न पार कर लें हम

कि नाराज प्रकृति

पैबंद लगी ओज़ोन की चादर ही उतार फेंके..”20  

 

निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि परितोष चक्रवर्ती के जैसे तमाम कवियों को साहित्यिक गुटबाजी के कारण भुला दिया जाता है, जिससे उनकी रचनाओं का जिक्र आलोचकों व समीक्षकों के बीच शून्य है। लेकिन उनकी काव्यात्मक महत्ता व गुणवत्ता किसी भी ख्यातिप्राप्त, चर्चित बड़े कवि से कम नहीं है। संबंधों व अपने परिवेश की हर आहट को सजग होकर सुनने और उसे अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले कवि के रूप में परितोष चक्रवर्ती सदैव का कद कभी बौना न हो पाएगा। बदलते युग के मूल्यों से बढ़ती अपसंस्कृति का हल वे अपने निकट संबंधों के पास रहकर हासिल करते हैं। उनके कवित्व की ऊंचाई मूल्यविहीन समय और परिस्थियों के बौनेपन से काफी अधिक है।

 

 

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संदर्भ-ग्रंथ-

 

1.       परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृ. सं. 70

2.       नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, चौथा संस्करण : 1990, पृ. सं. 204-05 

3.       परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृ. सं. 70

4.       वही, पृ. सं., 71

5.       लीलाधर जगूडी, कवि-कथन : अपनी भाषा पर संदेह करो, समकालीन भारतीय साहित्य, अंक : जनवरी-फरवरी 2017, पृ. सं. 26

6.       परितोष चक्रवर्ती, भूमिका, ऊंचाइयों वाला बौनापन (कविता-संग्रह), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. सं. 7

7.       परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृ. सं. 26-27

8.       परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृ. सं. 32

9.       परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृ. सं. 20

10.  अष्टभुजा शुक्ल, पद-कुपद (कविता-संग्रह), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. सं. 14

11.  परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृ. सं. 13

12.  वही, पृ. सं. 68

13.  परितोष चक्रवर्ती, ऊंचाइयों वाला बौनापन (कविता-संग्रह), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. सं. 63-64

14.  वही, पृ. सं. 49 

15.  वही, पृ. सं. 21

16.  आचार्य रामचंद्र शुक्ल, चिंतामणि (निबंध-संग्रह), लोकभारती प्रकाशन, संस्करण : 12, 2014, पृ. सं. 84

17.  परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996, पृ. सं. 53-54 

18.  परितोष चक्रवर्ती,ऊंचाइयों वाला बौनापन (कविता-संग्रह), सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. सं. 78

19.  वही, पृ. सं. 34-35

20.  वही, पृ. सं. 24-25

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 आशीष कुमार तिवारी, शोधार्थी, हिंदी विभाग, अलीगढ़  मुस्लिम यूनिवर्सिटी

ईमेल : ashish9696994252@gmail.com


 

 

 

 

 

‘कविता की अर्थवत्ता’ की तलाश : आलोचक जीवन सिंह की दृष्टि में


कविता आलोचना व पुस्तक समीक्षा से संबंधित वरिष्ठ समीक्षक जीवन सिंह की नई किताब इस वर्ष प्रकाशित हुई है ‘कविता की अर्थवत्ता’ नाम से। इस शिकायत के साथ कि पुस्तक समीक्षा को दोयम दर्जे की आलोचना मानकर संपादकगण पत्रिकाओं में उन्हें सबसे अंतिम हिस्सों में डाल देते हैं। जबकि अपने देशकाल से संबद्ध रचना की समीक्षा भी देशकाल की परिस्थितियों के प्रभाव से स्वच्छंद नहीं रहती। उस पर समीक्षक की भाषा और विचारशीलता, जो देशकाल की परिस्थितियों से निर्मित होती है, का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। साहित्य क्षेत्र में किसी नई रचना का आगमन साहित्य की समृद्धि की सूचक है। इस सूचना को परिपक्व समालोचना की दृष्टि और हर्ष के साथ पत्रिकाओं के प्रारम्भिक हिस्से में रखना न्यायोचित होता। ज्ञात हो कि इस पुस्तक के प्रारम्भिक हिस्से में हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कवियों की अतिप्रसिद्ध कविताओं के पुनर्पाठ के बाद का पूरा हिस्सा पुस्तक समीक्षा पर आधारित है, परंतु जीवन सिंह इन पुस्तक समीक्षाओं को आज की घोषित बेस्टसेलर किताबों के ‘बुक रिव्यू’ की परंपरा से अलग अच्छी और गंभीर विश्लेषणपरक पुस्तक समीक्षा मानते हैं, जिससे साहित्य में समीक्षा के नए मानदंड सृजित होते हैं। इस पुस्तक में भी कवियों की कविताओं के मूल्यांकन और उनकी अर्थमीमांसाओं का अध्ययन करने पर विशेष नए मूल्यों की ओर ध्यान आकर्षित होता है।   

पूरी पुस्तक दो खंडों में विभाजित है – प्रथम खंड, शब्दार्थ और दूसरा खंड, अर्थवत्ता नाम से। भारतीय काव्यशास्त्र में शब्दार्थ की महत्ता को दृष्टि में रखते हुए उन्होंने प्रथम खंड में हिंदी के कुछ प्रतिष्ठित कवियों की प्रसिद्ध कविताओं का पुनर्पाठ करते हुए उनके वास्तविक रचना-उत्पत्ति के कारणों के केंद्र की तलाश की है। इन कवियों में निराला की कविता ‘तोड़ती पत्थर’, ‘वनबेला’ और ‘महगू महंगा रहा’, नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके बाद’, केदारनाथ सिंह की कविता ‘भोजपुरी’ और विजेंद्र की कविता ‘कठफूला बाँस’ शामिल है। दूसरे खंड में उन्होंने अपने अध्ययन-क्रम में समय-समय पर प्रकाशित भिन्न आयुवर्ग के कवियों के काव्यसंग्रहों की पुस्तक समीक्षाओं को शामिल किया है। इन कवियों में नंद चतुर्वेदी, विजेंद्र, ऋतुराज, ज्ञानेन्द्रपति, अनिल गंगल, एकांत श्रीवास्तव, निर्मला पुतुल, केशव तिवारी, बलभद्र, महेशचंद्र पुनेठा, सुरेश सेन ‘निशांत’ और अविनाश मिश्र के एक-एक काव्यसंग्रहों की पुस्तक समीक्षा शामिल है। इस खंड के अंतर्गत ही रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, धूमिल, विष्णुचंद्र शर्मा और केदारनाथ सिंह की कविताओं पर लंबा आलेख भी है।

साहित्य में ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ की महत्ता का प्रतिपादन काव्यशास्त्र के महान आचार्यों ने शताब्दियों पहले ही कर दिया था, परंतु आधुनिक हिंदी साहित्य के मूल्यांकन के दौरान प्रायः पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को विशेष महत्त्व दिया गया। यह महज वैश्विक साहित्यिक प्रचलन के प्रभाववश ही था। वास्तव में किसी भाषा के साहित्य रूपों में प्रयुक्त शब्द उस भाषिक समाज के किन्हीं विशेष बोध का सूचक होता है। यह विशिष्ट बोध किसी जीवनदृष्टि का परिचायक हो सकता है। जीवन सिंह निराला की कविता ‘तोड़ती पत्थर’, ‘वनबेला’ और ‘महगू महंगा रहा’ में प्रयुक्त शब्द संरचना में निहित जीवन दृष्टियों को प्रकट करने का प्रयास करते हैं। ‘तोड़ती पत्थर’ कविता को वे ‘गुंफित कविता’ की संज्ञा देते हैं। जीवन सिंह इस कविता के पुनर्पाठ की मांग को पाठकों से गंभीरता से कहते हैं। अपने विश्लेषण में वे लिखते हैं कि निराला की इस कविता में ‘इलाहाबाद के पथ पर’ पद की प्रयुक्ति को साधारण बात नहीं है, बल्कि अपने स्थान-विशेष के प्रति कवि की सजगतापूर्ण चेतनदृष्टि का बोध है। किसी स्थान-विशेष में कर्मसौंदर्य में तल्लीन पेशेवर जातियों की दशा और उस स्थान के अर्थवैभव के बीच की खाई समाज के सत्ता-संरचना का प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध कराता है। इसी तरह ‘तरुमालिका अट्टालिका’ जैसे शब्द की प्रयुक्ति सड़क पर भरी दुपहरी पत्थर तोड़ने वाली स्त्री की दृष्टि में सामंती शोषण की प्रतिमूर्ति खड़ी करती है। अट्टालिकाओं का निर्माण श्रमिक वर्ग अपने श्रम से सींचकर करता है, परंतु उस पर उसका अधिकार रंचमात्र भी नहीं होता। इसलिए ‘अट्टालिका’ शब्द कभी भी श्रमिक के घर का पर्याय हो ही नहीं सकती। नंददुलारे वाजपेयी इस कविता में प्रयुक्त ‘अट्टालिका’ शब्द का निहित आशय इलाहाबाद में स्थित ‘आनंद भवन’ से जोड़कर इसका निहितार्थ राजनीतिक व्यंग्य के रूप में देखते हैं, जो जीवन सिंह का भी आशय है। आगे इसी कविता में प्रयुक्त ‘सजा सहज सितार’ शब्दपद जीवन सिंह को निराला के संगीत पक्ष की ओर विचार का तार जोड़ने का अवसर देता है, जो उपयुक्त ही है। कविता की यह पंक्ति उन्हें निराला की ‘बादल राग’ और ‘संध्या सुंदरी’ कविता का भी स्मरण कराती है। इन सभी कविताओं में संगीत का राग तत्व मौजूद है। वे लिखते हैं, “निराला स्वयं संगीत में इतने डूबे हुए थे कि जहां भी सहजता से कोई अवसर आता वहाँ वे संगीत के लिए स्थान निकाल लेते थे। बादल के साथ राग की कल्पना बादल-राग के रूप में निराला ही कर सकते थे। गर्जना और घनघोरता के साथ मृदुता का साहचर्य वे ही बिठा सकते थे” (जीवन सिंह, कविता की अर्थवत्ता, पृ. 20)  

   निराला का काव्य संघर्षशील और द्वन्द्वगत यथार्थ के मध्य सहजता और साहचर्य स्थापित करने का सूत्र बना। उनकी लंबी कविताओं में ‘तुलसीदास’, ‘राम की शक्तिपूजा’ इसी कोटि की श्रेष्ठ रचनाएं है। जीवन सिंह ने इन चर्चित लंबी कविताओं के क्रम में निराला की एक और लंबी कविता ‘वनबेला’ का नाम जोड़ा है, जो पाठकों के मध्य बहुत कम चर्चित है। उनके अनुसार यह लंबी भी जीवन की द्वन्द्वात्मकता को दृष्टिगत रखते हुए रची गई है। किसी भी कवि या रचनाकार का काव्य उसके देशगत परिस्थितियों और समाज संरचना की अनिवार्य छाप धारण किए रहता है। निराला का काव्यविकास भी अपने देश के भीतर काल-परिवर्तन के बावजूद जीवन-सौन्दर्य की महत्ता को छोड़ता नहीं, उसे मुखर रूप से अपनाता है। जीवन सिंह निराला की इन कविताओं का पुनर्पाठ करते हुए यह रेखांकित करते हैं कि “यह संयोग ही है कि तीनों क्लैसिक रचनाएं भारतीय इतिहास के विराट क्रम की तीन महत्वपूर्ण कड़ियाँ भी हैं। इनमें राम की कड़ी सबसे प्राचीन है, तुलसीदास की मध्यकालीन और वनबेला की आधुनिक । जीवन के संघर्ष और सौन्दर्य का क्रम और उसकी द्वन्द्वात्मकता तीनों कविताओं में है। तीनों का देश एक है, काल के संदर्भ भिन्न-भिन्न हैं”। (पृ. 29) ‘वनबेला’ कविता की विवेचना जीवन सिंह आधुनिक परिवेश और मूल्यों के आधार पर करते है। इस कविता का वस्तुतत्व अपने क्रमिक विकास के साथ नेहरुकालीन राजनीतिक अवमूल्यनों को केंद्र में रखता है। जीवन सिंह की राजनीतिक समझ और जानकारी इस लंबी कविता के अर्थ उद्घाटन में उपयोगी सिद्ध हुई है। नेहरू के राजनीतिक चरित्र की वर्तमान में अलग-अलग दृष्टिकोणों से काफी आलोचनाएं मौजूद हैं, तो उनके समर्थकों में उनके प्रगतिशील और आधुनिक विचारों के प्रति लगाव भी है लेकिन निराला की ‘वनबेला’ और ‘महगू महंगा रहा’ कविता में नेहरू के पाखंडपूर्ण व्यक्तित्व को व्यंग्य के माध्यम से प्रकट किया गया है। निराला समय के ‘गहन  अंधकार’ और ‘अमानिशा’ से बखूबी परिचित हैं। इसलिए उनमें इस भीषण अंधकार से उद्वेग और निराशा भी उत्पन्न होती है – “अन्याय जिधर है, उधर शक्ति”, तो दूसरी ओर प्रबल आशा का संचार भी है, जो बड़े शक्ति केंद्रों के दूसरे छोरों पर अपनी लघुता को अपनी ताकत बनाते हैं। निराला को इन लघुताओं पर भरोसा है। महगू सत्तासीन सामंती वर्गचरित्र से इतर निराला का मुख्य जनचरित्र है, जिसमें स्वाधीनता का गहनबोध है। वह भारत की गरीब और शोषित जनता के सजग नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है और उसे अपने वर्ग की ईमानदारी पर अभिमान है। यही भारतीयता की मुख्य जाति है। कविता के इस अर्थ का उद्घाटन यह पुस्तक प्रस्तुत करती है। इस दृष्टि इस पुस्तक में जीवन सिंह द्वारा निराला की इन कविताओं का चुनाव और उनकी भारतीय राजनीति से संबंधित विश्लेषण साहित्य अध्येताओं और निराला के पाठकों को उनकी कविताओं की गंभीर समझ से परिचित कराने में समर्थ है।   

‘अकाल और उसके बाद’ बाबा नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता है। जीवन सिंह इस कविता को जीवन क्रियाओं से निर्मित कविता मानते हैं। वे लिखते हैं कि यह कविता केवल अकालजन्य स्थितियों का ही बयान न होकर आम किसान और गरीब जीवन की सामान्य परिस्थितियों का चित्र है। इसे यदि अकाल की कविता न भी माना जाए तब भी यह अपना पूर्ण अर्थ भारतीय सामान्य किसान जीवन की बदहाली को पूर्णतया प्रकट करती है। जीवन जी ने नागार्जुन की इस कविता में प्रयुक्त क्रियाओं को कवि के जीवन व्यापार की लोक समझ से अर्जित बताया है। वे बाबा नागार्जुन की इस कविता की रचना शिल्प को किसी तार्किक दृष्टि से न देखकर उसे जीवन संबद्धता से जोड़कर देखते हैं। चूल्हे के रोने और चक्की के उदास होने को, चूल्हे के उदास होने और चक्की के रोने में नहीं बदला जा सकता। इसके पीछे वे लोक मान्यताओं और जीवनक्रम की सत्यता की दृष्टि को स्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि बाबा नागार्जुन अट्टालिकाओं में बैठकर जीवन व्यापार  पर टिप्पणियाँ देने वालों से अलग इन जीवन क्रियाओं के गहरे साधक रहे हैं।

इसी क्रम में केदारनाथ सिंह की ‘सृष्टि पर पहरा’ कविता-संग्रह की चर्चित कविता ‘भोजपुरी’ और विजेंद्र कुमार की कविता- संग्रह ‘कठफूला बाँस’ के संबंध में जीवन सिंह के विश्लेषणों को एक साथ देखें तो केदारनाथ सिंह की कविता ‘भोजपुरी’ के माध्यम से उन्होंने समाज में बढ़ रही भाषिक संकीर्णताओं को खत्म करने का बेहतर विकल्प तलाशा है, जिसमें केदार जी ने बोली और भाषा के अंतःसंबंधों को स्पष्ट किया है। जीवन जी की दृष्टि केदार और विजेंद्र की उन कविताओं की ओर जाकर रुकी, जिनमें बोली और भाषा, स्थानीयता और वैश्वीकता, गाँव और शहर के बीच के संबंधों और संघर्षों का एक विकल्प प्रस्तुत है। ‘भोजपुरी’ कविता में जहां बलिया और भोजपुरी का पुरबिहापन उभरकर सामने आता है, वहीं विजेंद्र की कविताओं का ब्रज क्षेत्र अपने जनपदीय विशेषताओं के साथ-साथ जनपदीय इतिहास की प्रमुखता के साथ आता है। ये कविताएं संकीर्णता के उलट उदार चेतना की व्यापकता का प्रसार करने में सक्षम हैं। इन कविताओं में ऐंद्रिक क्रियाएं सक्रिय मिलती हैं। विजेंद्र अपने स्थानीय बोध को देखे हुए दृश्यों में व्यक्त करते हैं। जिनमें एक विशिष्ट अर्थ उभरता है और कविता स्थानीय रंग के साथ प्रकट होती है।

कविता में स्थानीयता या जनपदीयता के तत्व देखकर जीवन सिंह आह्लादित जान पड़ते हैं। यह आह्लाद स्थानीय तत्वों के आगमन मात्र से अतिभावुकता पैदा नहीं करती, बल्कि स्थानीयता के तत्वों का वैश्विक प्रसार उन्हें आकर्षित करता है। उनकी आलोचना परिधि इन कविताओं के साथ वैश्विक उदारता के बिन्दु तक पहुँचती है। पुस्तक में सम्मिलित नई पीढ़ी के कवियों के संग्रहों की समीक्षाओं का बीज तत्व इन्हीं स्थानीयताओं की तलाश तक पहुँचती है। इन स्थानीयताओं के आलोक में लगभग सभी कवियों की कविताओं के केंद्र में मेहनतकश वर्ग और उसके कर्म के प्रति ईमानदारी जीवन सौन्दर्य का निर्माण करती है। इसलिए ये संग्रह और इनकी कविताएं जीवन और प्रेम की कविताएं है। जीवन सौन्दर्य की कविताएं रीति कविताओं के फ्रेम को तोड़ती हैं। इनमें मध्यमवर्गीय उलझन, तनाव, जटिलताएं न होकर, अभाव में जीवन जी रहे निम्नवर्गीय किसान और ग्रामीण जीवन के सहज सौन्दर्य का भाव प्रस्फुटित होता है। जीवन सिंह सुरेश सेन ‘निशांत’ की कविताओं को ‘प्यार में जीवित कविता’ की संज्ञा देते हैं और उनकी कविताओं में पहाड़ी जीवन के संकेतों की भरमार बताते हैं – “... उनकी कविताओं के अधिकतम रूपक धरती, पहाड़, नदी, पेड़, बीज और पहाड़ी औरत के उन संघर्षों और सामंजस्यों से बने हैं, जहां व्यक्ति एक पहाड़ी रूपक में बदल जाता है और पहाड़ स्वयं एक व्यक्ति का जीवन जीने लगता है”। (पृ.166) इन कविताओं से पहाड़ी जीवन के तत्वों को निकाल देने पर ये संवेदनशून्य हो जाएंगी। पहाड़ी जीवन पर आधारित कविताओं का ऐसा ही रूप महेशचंद्र पुनेठा की कविताओं में भी मिलता है। केदारनाथ सिंह के विषय में जिस पुरबिहापन को जीवन सिंह जनपदीय विशेषता के रूप में विश्लेषित करते हैं, वह केशव तिवारी की कविताओं में दूसरे विशिष्ट तरीके से आता है। इनकी कविताओं में अवध क्षेत्र की संस्कृति बहती मिलती है। चाहे वह दरवाजे पर घूम-घूमकर गीत गाने वाले जोगियों पर लिखी कविता हो, या दीपावली पर ‘खेत जगाने’ की प्रचलित प्रथा। केशव तिवारी जितने इन प्रथाओं से परिचित है, उससे कम जीवन सिंह नहीं हैं। वे इन प्रथाओं के बारे में विस्तार से पाठकों को परिचित कराते है। अवध क्षेत्र में प्रचलित ये प्रथाएं एक लोक संस्कार के रूप में प्रचलित हैं। ये प्रथाएं जीवन में उत्सव बढ़ाती है। उत्सवधर्मिता भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व है, जो केवल अवध क्षेत्र की ही विशेषता नहीं, बल्कि ऐसे तमाम जनपदीय संस्कारों की उपज है। आगे बलभद्र, एकांत श्रीवास्तव और ऋतुराज की कविताएं इसी क्रम में विवेचित हैं। अविनाश मिश्र की कविताओं में परिपक्व दृष्टि की तलाश एक छोटे लेख में किया गया है।

निर्मला पुतुल की कविताओं को जीवन सिंह दोहरी चुनौतियों से टकराते हुए देखते हैं। एक आदिवासी जीवन, दूसरे स्त्री- जीवन की चुनौतियाँ। प्रकृति का साहचर्य आदिवासी जीवन का प्राण है। वे निर्मला की कविताओं को वैश्वीकरण की वैश्विक चुनौतियों को उजागर करते देखते है। आदिवासियों की आजीविका का साधन जल, जंगल और जमीन केवल आजीविका का साधनमात्र न होकर उनके प्रेम, उत्सव और जीवन व्यापार का अंग है। नंद चतुर्वेदी और ज्ञानेंद्रपति अपनी कविताओं के माध्यम से गहन अंधकार से परिपूर्ण इन शताब्दियों में आशा का संचार करते हैं। मुख्य रूप से नंद बाबू की कविताएं इस कठिन दौर में बलवती आशा का पुंज बनकर आती है। उनकी अधिकांश कविताओं की शुरुआत समय की क्रूरताओं और उसके परिणामों से होती हुई आगी बढ़ती हैं, परंतु इस कविताओं का अंत प्रबल आशाओं का कोई न कोई सूक्त बना जाती हैं। इस पूरी पुस्तक में जीवन सिंह ने निराला, नागार्जुन, केदारनाथ सिंह आदि हिंदी के बड़े कवियों की कविताओं के माध्यम से जिस मेहनतकश वर्ग के जीवन सौंदर्य को स्थापित करने का प्रयास किया है, कमोबेश चयित सभी संग्रहों का स्वर अपनी विशिष्टताओं के साथ उसी वर्ग के साथ रही है। अन्याय अत्याचार के प्रति सच्ची हिंदी कविता का पक्ष सदैव स्पष्ट रहा है। जीवन सिंह की इस आलोचना पुस्तक को सैद्धांतिक आलोचना के मानकों से देखने के बजाय लोक चेतना संपन्न व्यावहारिक आलोचना का सशक्त उदाहरण माने जाने में कोई हिचक नहीं। निश्चित रूप से यह आलोचना पुस्तक हिंदी कविता के पाठक वर्ग को राजनीतिक और भारतीयता के रूपों से समृद्ध करेगी। जितनी आलोचना है, उतनी ही रचनात्मकता भी है यहाँ।

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कविता की अर्थवत्ता : जीवन सिंह, प्रकाशककौटिल्य बुक्स, दरियागंज, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण : 2021, कुल पृ.सं. 194

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आशीष कुमार तिवारी, शोध छात्र, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, 202001, मो. 7905429287

Monday, 28 August 2023

जीवन के प्रति अनुराग मात्र संघर्ष से ही सम्भव है

जीवन संघर्ष में पलता है। संघर्ष से जीवन में सौंदर्य का समावेश होता है,एक अनुराग पैदा होता है। संघर्ष में पला जीवन एक रसीली अनुभूति में डूबा होता है। जिसके स्मरण मात्र से एक दीर्घ स्वांस के साथ एक ऊर्जा भर जाती है। जिसका ताप मुख को ढाँप लेता है और नेत्र किसी अनन्त ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं। जीवन के प्रति अनुराग यहीं से उत्पन्न होता है। हम सभी को संघर्ष से प्रेम करना चाहिए,तब जीवन अपने आप सुगम हो जाएगा।
                               -आशीष कुमार तिवारी

मैं प्यार करता हूँ, पर मेरा प्रेम क्रूर है

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ऐसा अक्सर हो जाया करता था कि किसी-किसी बात को लेकर हम दोनों में बहुत देर तक झगड़ा हो जाता था। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि एक-दो दिन तक रूखी-सूखी नाराजगी से हमारी बात होती थी जिसका फार्मेट झगड़े वाला ही होता था। पर ये झगड़ा हमेशा ही एकपक्षीय होता था। जिसमें मैं आक्रामक होता था और वो रक्षात्मक। वो अपने आप को मारती हुई,घुटती हुई मेरी तमाम तरह की बातें सहती फिर भी विद्रोह का स्वर न निकलता। पर मैं चाहता था कि वो भी मुझ पर आरोप लगाये,मेरी गलतियों को उजागर करे,मुझपे चिल्लाये...पर वो ऐसा कुछ भी न करती। पर हाँ कभी-कभी मेरे आक्षेपों का प्रतिउत्तर देने के लिए उसकी आत्मा तड़प उठती और वो शुरुआत के पहले अक्षर पर ही सारा जोर डाल कर साँसे भरती और फिर सारे शब्दों को जैसे पी जाती। मैं आगे इंतज़ार  रहता कि आज मुझे अपने सभी अत्याचारों का प्रतिउत्तर मिलेगा परन्तु उसने मेरे इन उम्मीदों को कभी खरा न साबित होने दिया।मेरा उसके शब्दों को सुनने का इंतज़ार तब खत्म होता जब उसकी सारी प्रतिक्रिया,सारे शब्द उसकी आँसुओं की क्रमबद्धता के साथ बहने लगते। उन्हें देखकर ऐसा लगता मानों सारे वाक्य- विन्यास आँसुओं की क्रमबद्धता में सब कुछ कह देना चाहते हों। मेरे सारे आरोप,सारे झगड़े की जड़ वहीं समाप्त हो जाती। 

आज एक ऐसा ही दिन था जब मैंने अब तक का सबसे कठोर कदम उठाया। हम दोनों विश्वविद्यालय के ग्राउंड के किनारे लगे वृक्षो की छाया में थोड़ा ठंडापन महसूस करते हुए बैठे पर मेरे चेहरे की कठोरता को उसने शायद भांप लिया। वो समझ गयी थी कि मन में फिर किसी उष्णता को दबाना होगा अन्यथा सब जल कर नष्ट हो जाएगा। 
उसने पूछा-कैसे हो ?
मैंने बिना चेहरे का भाव बदले उस प्रश्न को अनसुना कर दिया।
"आज बहुत गर्मी है ना"
"मुझे नहीं पता" मैंने कहा।"
"खाना खाकर आये हो" उसने पूछा।
"कसम खाके आया हूँ"
"क्या"
"कि आज तुमसे सारे रिश्ते तोड़ दूंगा"

हालांकि मेरा ऐसा इरादा कभी न रहा लेकिन उसे अपने लिए तड़पता हुआ देखने की मुझे पता नहीं क्यों आदत सी हो गयी थी। मुझे अच्छा लगता जब वो मेरे लिए रोती,मेरे लिए घण्टों बैठकर मुझे निहारती। पता नहीं कैसा क्रूर हो चला था मेरा प्रेम। प्रेम ही कहेंगे क्योंकि उससे दूर जाने की मैं कभी सोच ही नही सकता था पर वो थी कि मेरी क्रूरता में भी अपने लिये प्यार ढूंढ लेती थी। 

मेरे इस तरह के निरर्थक वार्तालाप की जैसे उसे आदत सी पड़ गयी थी। उसने हँस के कहा-"कसम खाके आये हो कि मेरा साथ कभी नहीं छोड़ोगे....है ना।"
"नहीं आज के बाद कभी नहीं मिलूंगा ये कसम"

आज जैसे वो सब जानती थी कि बहुत सारी बातें कहूँगा मैं इसलिए उसने कोई लम्बी सांस भी न ली। मेरी बात सुनकर खामोश सी होकर मन्द-मन्द चलती हवाओं को महसूस करने की कोशिश वो करने लगी। वो मुझे दिखाना चाहती थी कि उसे सब खबर है मैं क्या कहना चाहता हूँ। हवाओं को महसूस करते हुए उसके आँखों से पानी की धार बहने लगी। मेरी नजर उसके चेहरे पर पहुंची तो मैं बड़ा निराश हुआ कि मैं आज कुछ भड़ास निकाल ही न पाया और ये अभी से शुरू हो गयी। मुझे ये उम्मीद न थी। पर आज वो धार बन्द होने का नाम न ले रही थी। दरसल आज मैं भी समझ गया था। उसके धैर्य का बाँध आज उसके बस में न था। आज उसने अपनी सहनशक्ति की सीमा मुझे बता दी। एक जोर कि रुँधी गले की आवाज़ निकली उसके मुंह से और वो अपना सर मेरे पैर पर रखकर रो पड़ी। मुझे लगता है वो रोने की आवाज़ आज मेरे परीक्षा लेने की सीमा थी। मैं इससे ज्यादा कुछ तकलीफ न दे सकता था। पता नहीं क्यों वो मुझे इतना प्यार कर रही थी। मेरी क्रूरता के बावजूद। उसकी पीड़ा देखकर मुझसे भी रहा न गया और मैं भी उसके रोने में शामिल हो गया। मुझे रोता देख कर उसने अपने को पता नहीं कैसे चुप करा लिया और मुझे चुप कराने लगी।

मैं हैरान हूँ उसके और अपने प्रेम के अंतर पर। मेरा क्रूर प्रेम उसकी संवेदना में धँसता जा रहा और उस धँसन से निकलने वाला खून मुझे राहत देता है। हाँ मेरा प्रेम निर्दयी है।
                            ....आशीष कुमार तिवारी

बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कोऊ नाहीं


काल्पनिक

चुनाव जीतने के लिए नेताजी जी ने बहुत संघर्ष किये,पार्टी कार्यालय के चक्कर पे चक्कर लगाते पाँव में बिवाई फूट चली थी पर कोई जुगत काम न आती थी। कोई रास्ता न सूझता दिखने पर उनकी आत्मा ने थक हार कर आह भरी-"हे राम!"।राम के उदार चरित्र और सहृदयता के विषय में तुलसीदास जी ने लिखा है-

ऐसे को उदार जग माहीं
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर,राम सरिस कोऊ नाहीं।

इस पंक्ति का ध्यान आते ही उन्होंने तय कर लिया कि वही पार्टी चुनाव में उनकी नैया पार लगाएगी जो राम की उदारता पर चल रही हो। बस फिर क्या था उन्होंने पुरानी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। पता लगाने पर मालुम चला कि "रामाधार पार्टी" पूरी की पूरी राम भरोसे ही चल रही है और देश में आजकल राम पर विश्वास प्रबल होता जा रहा है। इसलिये इस बार पार्टी के नियम कानून पक्के तरीके से निभा दिए तो जरूर जीतेंगे। 'बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर' को वे पार्टी का गाइडलाइन मानकर बड़ी सतर्कता से पालन करना शुरू कर दिए थे। उनकी आस्था राम पर प्रबल हो गयी क्योंकि इस बार चुनाव जनता नहीं बल्कि राम की उदारता जितायेगी। जनता  का क्या, जनता तो धोखेबाज होती है। उसने तो नेताजी के कैरियर से खिलवाड़ कर दिया था। प्रभु श्री राम के धैर्य,पराक्रम और तेजस्विता जैसे सारे गुण इन दीनों को देखकर द्रवित हो जाते थे और प्रभु को द्रवित करने के उद्देश्य से पार्टी के सभी कार्यकर्ता और नेता दीनता और सेवा-भावना से रहित होने का हरसम्भव प्रयास करते। प्रभु श्रीराम ने देखा कि इन दीनों का एकमात्र एजेंडा उनका नाम ही है-

एक भरोसो,एक बल,एक आस विसवास।

वे सचमुच द्रवित हो उठे और एक अजब सी लहर लेकर आये जिसमें सभी दीन नेताओं की नैया पार लगी। बोलो जय श्री राम।
 राजनीति एक ऐसा फार्मूला है जो योग्य महापुरुषों के डी एन ए को अपनी मजबूती और कमजोरी को साधने का अच्छा जरिया है। प्रभु के उदार चरित्र का लाभ राजनीति में वैसे ही है जैसे-चिट भी मेरी, पट भी मेरा। ऐसे में भला नेताजी को कौन हरा सकता था।
   आशीष कुमार तिवारी

जिसने बनाये सबके घर उसका कोई घर नहीं - चिट्ठी




हम फारबिसगंज, सिमराही, भुतहा,फुलपरास, दरभंगा मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, गोपालगंज ,कुशीनगर, गोरखपुर लखनऊ, कानपुर, आगरा, मथुरा होते हुए बस में भरकर दिल्ली आए थे। बस साल में दुइ बार घर जाते हैं। एक बार होली में, एक बार छठ में। बाकी समय प्रेमनगर, मोतीनगर, नेहरूनगर,करोलबाग, पटेलनगर, कर्मपुरा, से होते हुए रजौली गार्डन, राजा गार्डन से लेकर मोहन गार्डन और इधर शास्त्री नगर शाहदरा मंडोली, चुंगी, आदि जगहों पर काम करते रहे हैं। अप्रैल से धूप चढ़ जाती है। जुलाई तक मौसम गर्म रहता है। अपना काम लेबर-मिस्त्री का है। काम 9 बजे दिन से शाम 6 बजे तक चलता है। 2007 में लेबर को 170 रुपये मिलते थे, मिस्त्री को कहीं 300 रूपये, तो कहीं 270 रुपये। लेबर चौक से बिककर काम पर जाने वाले थोड़ा ज्यादा कमा लेते थे। ओवर टाइम काम पर लगाने से ये लेबर मिस्त्री बहुत खुश होते थे। आठ बाई नौ वाले कमरे में चार से पांच लोग रात भर रहते थे। नगर निगम के शौचालय में लंबी लाइन लगी होती थी। मरद-जनाना एक ही साथ लंबी कतार में लगे रहते थे। पहले एक ही रुपये लेते थे, अब जमाना मंहगाई का है इसीलिए 5 लेते हैं । अगर नहाइयेगा तो 10 रुपये लेने लगे हैं।



दिल्ली बदल रही थी। शिला दीक्षित दिल्ली को चमका रही थी। कांग्रेस का हर तरफ बोलबाला था। गांधी परिवार की तूती बोलती थी। दिल्ली के कोने-कोने में पोस्टर बैनर दिखता था। पोस्टर में हंसते हुए नेताओं को देखकर हम मजदूरों को भी हंसी आती थी कि ये दिखाने के लिए हंस रहा है। पर ऐसा नहीं था उनका जीवन भी वैसा ही था जैसे बाहर, वैसे अंदर। दरभंगा, सहरसा, कटिहार, भागलपुर से चलने वाली गाड़ियों में भीड़ बहुत होती थी। हम लोग यह मान कर चलते थे कि जिस बोगी में ऊपर में लोहे का रॉड लगा होता है,उसी में बैठना है। खड़ी गाड़ी में फस्ट क्लास वाली बोगी को झाँककर कई बार देखते थे। देखने के बाद डर भी जाते थे कि बाबू साहब लोग गाली न बक दें। स्वतंत्रता सैनानी से आते वक्त ट्रेन में कुछ हो या न हो, चादर या मजबूत गमछा जरूर लाते थे। ये इसलिए कि पैर रखने तक की जगह नहीं होती है। कुछ लोग साथ में अखबार भी लाते थे। जब पीड़ा असहनीय हो जाती थी  तो फिर क्या...डाल देते थे बाथरूम में अखबार और लेट्रिन वाली सीट को ढक देते थे...अंदर से लॉक...फिर देते रहो गालियां। तब तक कानपुर आ जाते थे। फिर सफर मात्र छह घण्टे का।
दूसरा उपाय यह होता था कि पैर जब खड़े-खड़े जबाब दे देते थे तो उसके बाद रॉड दोनों सिरे में गमछी फंसाकर बांध देते थे और झुलनी बनाकर कुछ देर लेट जाते थे। बाकी सवारी ऐसे लोगों को काबिल सवारी समझती थी।

   हम अपने ऐसे कई लोगों को जानते हैं, जो खुद तो आते ही थे,अब उनके बेटे भी शहर में लेबर-मजदूरी करने आने लगे हैं। पिता अब सीमेंट की बोरी चार मंजिल पर नहीं चढ़ा पाते हैं इसलिए साहब लोग गाली देते रहते थे। वे अब कम क्षमता वाले काम खोजकर करने लगे है। जब जवानी थी तो बड़े दमदार लेबर माने जाते थे। राजधानी दिल्ली ने उसे बूढ़ा होते देखा है। उनके अनुभवों में त्रासदी का महाख्यान छुपा है। वे अपने जवान होते बेटे को मजदूर बनते देखकर बहुत निराश हो जाते हैं। पर कर भी क्या सकता है..? व्यवस्था की मार पीढ़ियों तक दस्तक दे रही थी....इसकी आहट हर एक मजदूर को मालूम हो जाती थी।

पहले गांव में जमींदारों की नौकरी करते थे। दिन रात काम करने के बाद भी वे पांच पेट को भरने में असमर्थ हो जाते थे। शहर ने उसे चमरवा, दुसाधवा, हलखोरबा जाति सूचक गालियों से मुक्ति दिलाई। वह यहां महज़ मजदूर था....दिल को थोड़ी तसल्ली होती थी।दिल्ली,कलकत्ता हैदराबाद ने पहली बार इनको जाति सूचक गालियों से मुक्त किया पर एक प्रदेश सूचक गाली आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ती। साले बिहारी निठल्ले, तेरी ब....तेरी म... कामचोर इत्यादि गालियाँ सुनते हुए धीरे-धीरे कान को आदत पड़ जाती है। मैला आँचल का 'कालीचरण' और गोदान का 'गोबर' भले ही गांव जाकर दूसरे मंगला, रामबिलसा और दुखना के लिए मॉडन लगता हो पर उनकी भी टिप-टॉप शहरी बाबुओं द्वारा दी गई गालियों से गीली होकर दिखती रहती हैं।
 पता नहीं, सुनने में आया है कि दिल्ली बदल रही है...इन साहब लोगों की जुबान कितनी बदली है, यह आज भी मजदूरों को ही पता होगा।
यही गाली देने वाले साहब लोगों को जब पैसे की हवस सताती है तो विदेश चले जाते हैं और जब मौत दिखाई पड़ती है तो देश की ओर दौड़ते है


मंदिर मस्जिद करने वालों ने दिल्ली जलाया। दिल्ली जलने के साथ-साथ कई लोगों के अरमान भी जल गए। अब दिल जलाने वाली बीमारी ने इन मजदूरों को शहर से ही जुदा कर दिया। पुलिस तो हमेशा से मजदूरों पर ज़ुल्म घाटी रही हैं। उनकी गाली सुनने की आदत हर बिहारी मजदूरों को हो जाती है। कोरोना का कहर ने न सिर्फ उन्हें बेघर कर दिया है बल्कि उन्हें भूखे सोने पर भी मजबूर कर दिया है...कभी दशरथ मांझी इन्हीं व्यवस्थाओं से लड़ते हुए  पैदल चलकर दिल्ली आये थे, अब उन्हीं के वंशज दिल्ली से गया कि पहाड़ियों और गांवों में वापस लौट रहे हैं। व्यवस्था तब भी मजदूरों का गला घोंट रहा था। दिल्ली को संवारने वाले मजदूरों को दिल्ली ने बेघर कर दिया है।

"इस शहर में मजदूर जैसा दर-बदर कोई नहीं
जिसने बनाये सबके घर उसका कोई घर नहीं"

इनकी जीवन-यात्रा कितनी भयावह है, न व्यवस्था को पता है न ही अट्टालिकाओं में अट्टहास करने हुए रामायण का एपिसोड देखने वालों को।

रामलखन कुमार, शोधार्थी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय


पर्यावरण दिवस पर नन्हें पौधे का दर्द सुनो...


नन्हा हूँ.....एक पौधा हूँ....जरा सुन लो..
आशीष कुमार तिवारी


कल तक मैं ना जानें कहाँ था.....रात में अचानक बहुत तेज़ बारिश हुई। भींगती हुई मिट्टी की जिस्म में बारिश की नमीं पहुंची और उसमे दबा एक बीज आवरण तोड़कर कर अपनी ग्रन्थियों को विकसित करने लगा। जबसे वो आवरण टूटा है तब से मैं खुद को महसूस कर रहा हूँ। अचानक मेरे हाथ पंखों की तरह फैलने लगे। मुझे मज़ा आ रहा था ये जादुई विकास देखकर। भोर तक मैं खुद को पूरी तरह महसूस करने लगा। भोर की ठण्डी-ठण्डी हवा सरक-सरक के मेरे नन्हें हाथों को सहलाने लगी....मैं हंसने लगा.....गुदगुदी होने लगी....तभी एक रौशनी की किरण मेरे ऊपर पड़ी। उस रोशनी से मुझे ऊर्जा मिल रही थी। सब कुछ नया था मेरे लिए। दूर-दूर तक मेरे जैसे कई उस रोशनी में डूबे दिख रहे थे। मैं नई दुनिया में आँखें खोल चुका था।
मैं खुद को अभी महसूस ही कर रहा था कि तबसे एक नन्हा बच्चा डगमग-डगमग चाल भरता हुआ कोमल पैरों से मेरी ओर आता दिखा। उसने मुझे देखा और खिलखिलाकर हंस पड़ा। उसकी हंसी से मैं भी फूटकर हंसने लगा पर मुझे नहीं मालुम कि इसे हंसना कहते हैं। लेकिन इसमें बहुत मज़ा था। हंसने के साथ मैंने महसूस किया कि इससे मैंने अपने सारे अंगों को जैसे जान लिया हो। मुझे अपनी जड़ भी महसूस हुई जो मिट्टी में धँसी थी। बच्चा नजदीक आकर मेरे पास बैठ गया और चिड़िया की सी आवाज़ में चहककर हंसने लगा और उसने मुझे छूने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। मैं बहुत डर गया...मैं जोर से चिल्लाया....बहुत रोया पर वो नहीं मान रहा था। उसने मेरी पत्तियों को जब छुआ तो मैंने खुद को बहुत सिकोड़ लिया पर उसके नरम-नरम हाथों की छुअन मुझे बहुत अच्छी लगी। ये मेरे जीवन में किसी इंसानी स्पर्श का पहला अनुभव था। बच्चा तो मैं भी था। फिर मैंने अपने आप को उसकी छुअन के लिए फैला लिया। उसने मुझे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। बस मुझे छुए जा रहा था और खिलखिलाता जा रहा था। मैंने इंसान पहली बार देखा था और उसकी छुअन पहली बार महसूस किया। मुझे इस धरती से,इंसानों से प्रेम हो गया था। 

पर आज पहली बार मैंने अपनी कच्ची उम्र में ही कुछ ऐसे इंसानों को देखा जिनके हाथ हमारी प्रजातियों की छालों से भी ज्यादा कठोर और खुरदुरे थे, जिनके हाथों में इस्पात का हथियार था। वो दादा को काट रहे थे। दादा के शरीर से खून बह रहा था,दादा चिल्ला रहा था पर वे काटते जा रहे थे। मुझे लगा वो इंसान उस बच्चे से बहुत अलग थे जिनमें हँसी नहीं थी,जिनमे स्पर्श नहीं था। वो दादा के रक्त को इसलिए नहीं समझ पा रहे थे क्योंकि उनका खून इंसानों जैसा लाल नहीं था बल्कि सफेद था। मैं डर गया था इन इंसानों से....कहीं दूर भाग जाना चाहता था पर मुझे ये भी पहली दफा महसूस हुआ कि हम अपनी जड़ें नहीं छोड़ सकते पर इंसान छोड़ चुका है.........अब मेरी भी बारी आएगी....उस बच्चे को याद कर रहा हूँ जिसने मुझे छुआ था। काश वो आ जाता और मुझे हंसा के सारे दुख भुला देता.......इस पर्यावरण दिवस पर मेरे लिए कुछ उपाय कर देता हंसने का, गुदगुदाने का........

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