Monday, 28 August 2023

जिसने बनाये सबके घर उसका कोई घर नहीं - चिट्ठी




हम फारबिसगंज, सिमराही, भुतहा,फुलपरास, दरभंगा मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, गोपालगंज ,कुशीनगर, गोरखपुर लखनऊ, कानपुर, आगरा, मथुरा होते हुए बस में भरकर दिल्ली आए थे। बस साल में दुइ बार घर जाते हैं। एक बार होली में, एक बार छठ में। बाकी समय प्रेमनगर, मोतीनगर, नेहरूनगर,करोलबाग, पटेलनगर, कर्मपुरा, से होते हुए रजौली गार्डन, राजा गार्डन से लेकर मोहन गार्डन और इधर शास्त्री नगर शाहदरा मंडोली, चुंगी, आदि जगहों पर काम करते रहे हैं। अप्रैल से धूप चढ़ जाती है। जुलाई तक मौसम गर्म रहता है। अपना काम लेबर-मिस्त्री का है। काम 9 बजे दिन से शाम 6 बजे तक चलता है। 2007 में लेबर को 170 रुपये मिलते थे, मिस्त्री को कहीं 300 रूपये, तो कहीं 270 रुपये। लेबर चौक से बिककर काम पर जाने वाले थोड़ा ज्यादा कमा लेते थे। ओवर टाइम काम पर लगाने से ये लेबर मिस्त्री बहुत खुश होते थे। आठ बाई नौ वाले कमरे में चार से पांच लोग रात भर रहते थे। नगर निगम के शौचालय में लंबी लाइन लगी होती थी। मरद-जनाना एक ही साथ लंबी कतार में लगे रहते थे। पहले एक ही रुपये लेते थे, अब जमाना मंहगाई का है इसीलिए 5 लेते हैं । अगर नहाइयेगा तो 10 रुपये लेने लगे हैं।



दिल्ली बदल रही थी। शिला दीक्षित दिल्ली को चमका रही थी। कांग्रेस का हर तरफ बोलबाला था। गांधी परिवार की तूती बोलती थी। दिल्ली के कोने-कोने में पोस्टर बैनर दिखता था। पोस्टर में हंसते हुए नेताओं को देखकर हम मजदूरों को भी हंसी आती थी कि ये दिखाने के लिए हंस रहा है। पर ऐसा नहीं था उनका जीवन भी वैसा ही था जैसे बाहर, वैसे अंदर। दरभंगा, सहरसा, कटिहार, भागलपुर से चलने वाली गाड़ियों में भीड़ बहुत होती थी। हम लोग यह मान कर चलते थे कि जिस बोगी में ऊपर में लोहे का रॉड लगा होता है,उसी में बैठना है। खड़ी गाड़ी में फस्ट क्लास वाली बोगी को झाँककर कई बार देखते थे। देखने के बाद डर भी जाते थे कि बाबू साहब लोग गाली न बक दें। स्वतंत्रता सैनानी से आते वक्त ट्रेन में कुछ हो या न हो, चादर या मजबूत गमछा जरूर लाते थे। ये इसलिए कि पैर रखने तक की जगह नहीं होती है। कुछ लोग साथ में अखबार भी लाते थे। जब पीड़ा असहनीय हो जाती थी  तो फिर क्या...डाल देते थे बाथरूम में अखबार और लेट्रिन वाली सीट को ढक देते थे...अंदर से लॉक...फिर देते रहो गालियां। तब तक कानपुर आ जाते थे। फिर सफर मात्र छह घण्टे का।
दूसरा उपाय यह होता था कि पैर जब खड़े-खड़े जबाब दे देते थे तो उसके बाद रॉड दोनों सिरे में गमछी फंसाकर बांध देते थे और झुलनी बनाकर कुछ देर लेट जाते थे। बाकी सवारी ऐसे लोगों को काबिल सवारी समझती थी।

   हम अपने ऐसे कई लोगों को जानते हैं, जो खुद तो आते ही थे,अब उनके बेटे भी शहर में लेबर-मजदूरी करने आने लगे हैं। पिता अब सीमेंट की बोरी चार मंजिल पर नहीं चढ़ा पाते हैं इसलिए साहब लोग गाली देते रहते थे। वे अब कम क्षमता वाले काम खोजकर करने लगे है। जब जवानी थी तो बड़े दमदार लेबर माने जाते थे। राजधानी दिल्ली ने उसे बूढ़ा होते देखा है। उनके अनुभवों में त्रासदी का महाख्यान छुपा है। वे अपने जवान होते बेटे को मजदूर बनते देखकर बहुत निराश हो जाते हैं। पर कर भी क्या सकता है..? व्यवस्था की मार पीढ़ियों तक दस्तक दे रही थी....इसकी आहट हर एक मजदूर को मालूम हो जाती थी।

पहले गांव में जमींदारों की नौकरी करते थे। दिन रात काम करने के बाद भी वे पांच पेट को भरने में असमर्थ हो जाते थे। शहर ने उसे चमरवा, दुसाधवा, हलखोरबा जाति सूचक गालियों से मुक्ति दिलाई। वह यहां महज़ मजदूर था....दिल को थोड़ी तसल्ली होती थी।दिल्ली,कलकत्ता हैदराबाद ने पहली बार इनको जाति सूचक गालियों से मुक्त किया पर एक प्रदेश सूचक गाली आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ती। साले बिहारी निठल्ले, तेरी ब....तेरी म... कामचोर इत्यादि गालियाँ सुनते हुए धीरे-धीरे कान को आदत पड़ जाती है। मैला आँचल का 'कालीचरण' और गोदान का 'गोबर' भले ही गांव जाकर दूसरे मंगला, रामबिलसा और दुखना के लिए मॉडन लगता हो पर उनकी भी टिप-टॉप शहरी बाबुओं द्वारा दी गई गालियों से गीली होकर दिखती रहती हैं।
 पता नहीं, सुनने में आया है कि दिल्ली बदल रही है...इन साहब लोगों की जुबान कितनी बदली है, यह आज भी मजदूरों को ही पता होगा।
यही गाली देने वाले साहब लोगों को जब पैसे की हवस सताती है तो विदेश चले जाते हैं और जब मौत दिखाई पड़ती है तो देश की ओर दौड़ते है


मंदिर मस्जिद करने वालों ने दिल्ली जलाया। दिल्ली जलने के साथ-साथ कई लोगों के अरमान भी जल गए। अब दिल जलाने वाली बीमारी ने इन मजदूरों को शहर से ही जुदा कर दिया। पुलिस तो हमेशा से मजदूरों पर ज़ुल्म घाटी रही हैं। उनकी गाली सुनने की आदत हर बिहारी मजदूरों को हो जाती है। कोरोना का कहर ने न सिर्फ उन्हें बेघर कर दिया है बल्कि उन्हें भूखे सोने पर भी मजबूर कर दिया है...कभी दशरथ मांझी इन्हीं व्यवस्थाओं से लड़ते हुए  पैदल चलकर दिल्ली आये थे, अब उन्हीं के वंशज दिल्ली से गया कि पहाड़ियों और गांवों में वापस लौट रहे हैं। व्यवस्था तब भी मजदूरों का गला घोंट रहा था। दिल्ली को संवारने वाले मजदूरों को दिल्ली ने बेघर कर दिया है।

"इस शहर में मजदूर जैसा दर-बदर कोई नहीं
जिसने बनाये सबके घर उसका कोई घर नहीं"

इनकी जीवन-यात्रा कितनी भयावह है, न व्यवस्था को पता है न ही अट्टालिकाओं में अट्टहास करने हुए रामायण का एपिसोड देखने वालों को।

रामलखन कुमार, शोधार्थी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय


2 comments:

सुनील चौधरी said...

सच लिखा है साथी। यह वही दिल्ली है जहाँ की धरती को सँवारकर मजदूरी करने वाले हाथों ने राजधानी बनाया । वही आज पलायन को मजबूर हैं। उनकी तड़प से आज दिल्ली की इमारतें भरभराकर गिर जानी चाहिए। तब देखेंगे , कौन फिर से दिल्ली को राजधानी की तरह संवारेगा। देश मेहनतकश मजदूरों से चलता है पूंजीपतियों से नहीं। लेकिन सरकार की ऐसी अनदेखी असहनीय है।

सुशील कुमार जोशी said...

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