Monday, 28 August 2023

मैं प्यार करता हूँ, पर मेरा प्रेम क्रूर है

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ऐसा अक्सर हो जाया करता था कि किसी-किसी बात को लेकर हम दोनों में बहुत देर तक झगड़ा हो जाता था। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि एक-दो दिन तक रूखी-सूखी नाराजगी से हमारी बात होती थी जिसका फार्मेट झगड़े वाला ही होता था। पर ये झगड़ा हमेशा ही एकपक्षीय होता था। जिसमें मैं आक्रामक होता था और वो रक्षात्मक। वो अपने आप को मारती हुई,घुटती हुई मेरी तमाम तरह की बातें सहती फिर भी विद्रोह का स्वर न निकलता। पर मैं चाहता था कि वो भी मुझ पर आरोप लगाये,मेरी गलतियों को उजागर करे,मुझपे चिल्लाये...पर वो ऐसा कुछ भी न करती। पर हाँ कभी-कभी मेरे आक्षेपों का प्रतिउत्तर देने के लिए उसकी आत्मा तड़प उठती और वो शुरुआत के पहले अक्षर पर ही सारा जोर डाल कर साँसे भरती और फिर सारे शब्दों को जैसे पी जाती। मैं आगे इंतज़ार  रहता कि आज मुझे अपने सभी अत्याचारों का प्रतिउत्तर मिलेगा परन्तु उसने मेरे इन उम्मीदों को कभी खरा न साबित होने दिया।मेरा उसके शब्दों को सुनने का इंतज़ार तब खत्म होता जब उसकी सारी प्रतिक्रिया,सारे शब्द उसकी आँसुओं की क्रमबद्धता के साथ बहने लगते। उन्हें देखकर ऐसा लगता मानों सारे वाक्य- विन्यास आँसुओं की क्रमबद्धता में सब कुछ कह देना चाहते हों। मेरे सारे आरोप,सारे झगड़े की जड़ वहीं समाप्त हो जाती। 

आज एक ऐसा ही दिन था जब मैंने अब तक का सबसे कठोर कदम उठाया। हम दोनों विश्वविद्यालय के ग्राउंड के किनारे लगे वृक्षो की छाया में थोड़ा ठंडापन महसूस करते हुए बैठे पर मेरे चेहरे की कठोरता को उसने शायद भांप लिया। वो समझ गयी थी कि मन में फिर किसी उष्णता को दबाना होगा अन्यथा सब जल कर नष्ट हो जाएगा। 
उसने पूछा-कैसे हो ?
मैंने बिना चेहरे का भाव बदले उस प्रश्न को अनसुना कर दिया।
"आज बहुत गर्मी है ना"
"मुझे नहीं पता" मैंने कहा।"
"खाना खाकर आये हो" उसने पूछा।
"कसम खाके आया हूँ"
"क्या"
"कि आज तुमसे सारे रिश्ते तोड़ दूंगा"

हालांकि मेरा ऐसा इरादा कभी न रहा लेकिन उसे अपने लिए तड़पता हुआ देखने की मुझे पता नहीं क्यों आदत सी हो गयी थी। मुझे अच्छा लगता जब वो मेरे लिए रोती,मेरे लिए घण्टों बैठकर मुझे निहारती। पता नहीं कैसा क्रूर हो चला था मेरा प्रेम। प्रेम ही कहेंगे क्योंकि उससे दूर जाने की मैं कभी सोच ही नही सकता था पर वो थी कि मेरी क्रूरता में भी अपने लिये प्यार ढूंढ लेती थी। 

मेरे इस तरह के निरर्थक वार्तालाप की जैसे उसे आदत सी पड़ गयी थी। उसने हँस के कहा-"कसम खाके आये हो कि मेरा साथ कभी नहीं छोड़ोगे....है ना।"
"नहीं आज के बाद कभी नहीं मिलूंगा ये कसम"

आज जैसे वो सब जानती थी कि बहुत सारी बातें कहूँगा मैं इसलिए उसने कोई लम्बी सांस भी न ली। मेरी बात सुनकर खामोश सी होकर मन्द-मन्द चलती हवाओं को महसूस करने की कोशिश वो करने लगी। वो मुझे दिखाना चाहती थी कि उसे सब खबर है मैं क्या कहना चाहता हूँ। हवाओं को महसूस करते हुए उसके आँखों से पानी की धार बहने लगी। मेरी नजर उसके चेहरे पर पहुंची तो मैं बड़ा निराश हुआ कि मैं आज कुछ भड़ास निकाल ही न पाया और ये अभी से शुरू हो गयी। मुझे ये उम्मीद न थी। पर आज वो धार बन्द होने का नाम न ले रही थी। दरसल आज मैं भी समझ गया था। उसके धैर्य का बाँध आज उसके बस में न था। आज उसने अपनी सहनशक्ति की सीमा मुझे बता दी। एक जोर कि रुँधी गले की आवाज़ निकली उसके मुंह से और वो अपना सर मेरे पैर पर रखकर रो पड़ी। मुझे लगता है वो रोने की आवाज़ आज मेरे परीक्षा लेने की सीमा थी। मैं इससे ज्यादा कुछ तकलीफ न दे सकता था। पता नहीं क्यों वो मुझे इतना प्यार कर रही थी। मेरी क्रूरता के बावजूद। उसकी पीड़ा देखकर मुझसे भी रहा न गया और मैं भी उसके रोने में शामिल हो गया। मुझे रोता देख कर उसने अपने को पता नहीं कैसे चुप करा लिया और मुझे चुप कराने लगी।

मैं हैरान हूँ उसके और अपने प्रेम के अंतर पर। मेरा क्रूर प्रेम उसकी संवेदना में धँसता जा रहा और उस धँसन से निकलने वाला खून मुझे राहत देता है। हाँ मेरा प्रेम निर्दयी है।
                            ....आशीष कुमार तिवारी

बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कोऊ नाहीं


काल्पनिक

चुनाव जीतने के लिए नेताजी जी ने बहुत संघर्ष किये,पार्टी कार्यालय के चक्कर पे चक्कर लगाते पाँव में बिवाई फूट चली थी पर कोई जुगत काम न आती थी। कोई रास्ता न सूझता दिखने पर उनकी आत्मा ने थक हार कर आह भरी-"हे राम!"।राम के उदार चरित्र और सहृदयता के विषय में तुलसीदास जी ने लिखा है-

ऐसे को उदार जग माहीं
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर,राम सरिस कोऊ नाहीं।

इस पंक्ति का ध्यान आते ही उन्होंने तय कर लिया कि वही पार्टी चुनाव में उनकी नैया पार लगाएगी जो राम की उदारता पर चल रही हो। बस फिर क्या था उन्होंने पुरानी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। पता लगाने पर मालुम चला कि "रामाधार पार्टी" पूरी की पूरी राम भरोसे ही चल रही है और देश में आजकल राम पर विश्वास प्रबल होता जा रहा है। इसलिये इस बार पार्टी के नियम कानून पक्के तरीके से निभा दिए तो जरूर जीतेंगे। 'बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर' को वे पार्टी का गाइडलाइन मानकर बड़ी सतर्कता से पालन करना शुरू कर दिए थे। उनकी आस्था राम पर प्रबल हो गयी क्योंकि इस बार चुनाव जनता नहीं बल्कि राम की उदारता जितायेगी। जनता  का क्या, जनता तो धोखेबाज होती है। उसने तो नेताजी के कैरियर से खिलवाड़ कर दिया था। प्रभु श्री राम के धैर्य,पराक्रम और तेजस्विता जैसे सारे गुण इन दीनों को देखकर द्रवित हो जाते थे और प्रभु को द्रवित करने के उद्देश्य से पार्टी के सभी कार्यकर्ता और नेता दीनता और सेवा-भावना से रहित होने का हरसम्भव प्रयास करते। प्रभु श्रीराम ने देखा कि इन दीनों का एकमात्र एजेंडा उनका नाम ही है-

एक भरोसो,एक बल,एक आस विसवास।

वे सचमुच द्रवित हो उठे और एक अजब सी लहर लेकर आये जिसमें सभी दीन नेताओं की नैया पार लगी। बोलो जय श्री राम।
 राजनीति एक ऐसा फार्मूला है जो योग्य महापुरुषों के डी एन ए को अपनी मजबूती और कमजोरी को साधने का अच्छा जरिया है। प्रभु के उदार चरित्र का लाभ राजनीति में वैसे ही है जैसे-चिट भी मेरी, पट भी मेरा। ऐसे में भला नेताजी को कौन हरा सकता था।
   आशीष कुमार तिवारी

जिसने बनाये सबके घर उसका कोई घर नहीं - चिट्ठी




हम फारबिसगंज, सिमराही, भुतहा,फुलपरास, दरभंगा मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, गोपालगंज ,कुशीनगर, गोरखपुर लखनऊ, कानपुर, आगरा, मथुरा होते हुए बस में भरकर दिल्ली आए थे। बस साल में दुइ बार घर जाते हैं। एक बार होली में, एक बार छठ में। बाकी समय प्रेमनगर, मोतीनगर, नेहरूनगर,करोलबाग, पटेलनगर, कर्मपुरा, से होते हुए रजौली गार्डन, राजा गार्डन से लेकर मोहन गार्डन और इधर शास्त्री नगर शाहदरा मंडोली, चुंगी, आदि जगहों पर काम करते रहे हैं। अप्रैल से धूप चढ़ जाती है। जुलाई तक मौसम गर्म रहता है। अपना काम लेबर-मिस्त्री का है। काम 9 बजे दिन से शाम 6 बजे तक चलता है। 2007 में लेबर को 170 रुपये मिलते थे, मिस्त्री को कहीं 300 रूपये, तो कहीं 270 रुपये। लेबर चौक से बिककर काम पर जाने वाले थोड़ा ज्यादा कमा लेते थे। ओवर टाइम काम पर लगाने से ये लेबर मिस्त्री बहुत खुश होते थे। आठ बाई नौ वाले कमरे में चार से पांच लोग रात भर रहते थे। नगर निगम के शौचालय में लंबी लाइन लगी होती थी। मरद-जनाना एक ही साथ लंबी कतार में लगे रहते थे। पहले एक ही रुपये लेते थे, अब जमाना मंहगाई का है इसीलिए 5 लेते हैं । अगर नहाइयेगा तो 10 रुपये लेने लगे हैं।



दिल्ली बदल रही थी। शिला दीक्षित दिल्ली को चमका रही थी। कांग्रेस का हर तरफ बोलबाला था। गांधी परिवार की तूती बोलती थी। दिल्ली के कोने-कोने में पोस्टर बैनर दिखता था। पोस्टर में हंसते हुए नेताओं को देखकर हम मजदूरों को भी हंसी आती थी कि ये दिखाने के लिए हंस रहा है। पर ऐसा नहीं था उनका जीवन भी वैसा ही था जैसे बाहर, वैसे अंदर। दरभंगा, सहरसा, कटिहार, भागलपुर से चलने वाली गाड़ियों में भीड़ बहुत होती थी। हम लोग यह मान कर चलते थे कि जिस बोगी में ऊपर में लोहे का रॉड लगा होता है,उसी में बैठना है। खड़ी गाड़ी में फस्ट क्लास वाली बोगी को झाँककर कई बार देखते थे। देखने के बाद डर भी जाते थे कि बाबू साहब लोग गाली न बक दें। स्वतंत्रता सैनानी से आते वक्त ट्रेन में कुछ हो या न हो, चादर या मजबूत गमछा जरूर लाते थे। ये इसलिए कि पैर रखने तक की जगह नहीं होती है। कुछ लोग साथ में अखबार भी लाते थे। जब पीड़ा असहनीय हो जाती थी  तो फिर क्या...डाल देते थे बाथरूम में अखबार और लेट्रिन वाली सीट को ढक देते थे...अंदर से लॉक...फिर देते रहो गालियां। तब तक कानपुर आ जाते थे। फिर सफर मात्र छह घण्टे का।
दूसरा उपाय यह होता था कि पैर जब खड़े-खड़े जबाब दे देते थे तो उसके बाद रॉड दोनों सिरे में गमछी फंसाकर बांध देते थे और झुलनी बनाकर कुछ देर लेट जाते थे। बाकी सवारी ऐसे लोगों को काबिल सवारी समझती थी।

   हम अपने ऐसे कई लोगों को जानते हैं, जो खुद तो आते ही थे,अब उनके बेटे भी शहर में लेबर-मजदूरी करने आने लगे हैं। पिता अब सीमेंट की बोरी चार मंजिल पर नहीं चढ़ा पाते हैं इसलिए साहब लोग गाली देते रहते थे। वे अब कम क्षमता वाले काम खोजकर करने लगे है। जब जवानी थी तो बड़े दमदार लेबर माने जाते थे। राजधानी दिल्ली ने उसे बूढ़ा होते देखा है। उनके अनुभवों में त्रासदी का महाख्यान छुपा है। वे अपने जवान होते बेटे को मजदूर बनते देखकर बहुत निराश हो जाते हैं। पर कर भी क्या सकता है..? व्यवस्था की मार पीढ़ियों तक दस्तक दे रही थी....इसकी आहट हर एक मजदूर को मालूम हो जाती थी।

पहले गांव में जमींदारों की नौकरी करते थे। दिन रात काम करने के बाद भी वे पांच पेट को भरने में असमर्थ हो जाते थे। शहर ने उसे चमरवा, दुसाधवा, हलखोरबा जाति सूचक गालियों से मुक्ति दिलाई। वह यहां महज़ मजदूर था....दिल को थोड़ी तसल्ली होती थी।दिल्ली,कलकत्ता हैदराबाद ने पहली बार इनको जाति सूचक गालियों से मुक्त किया पर एक प्रदेश सूचक गाली आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ती। साले बिहारी निठल्ले, तेरी ब....तेरी म... कामचोर इत्यादि गालियाँ सुनते हुए धीरे-धीरे कान को आदत पड़ जाती है। मैला आँचल का 'कालीचरण' और गोदान का 'गोबर' भले ही गांव जाकर दूसरे मंगला, रामबिलसा और दुखना के लिए मॉडन लगता हो पर उनकी भी टिप-टॉप शहरी बाबुओं द्वारा दी गई गालियों से गीली होकर दिखती रहती हैं।
 पता नहीं, सुनने में आया है कि दिल्ली बदल रही है...इन साहब लोगों की जुबान कितनी बदली है, यह आज भी मजदूरों को ही पता होगा।
यही गाली देने वाले साहब लोगों को जब पैसे की हवस सताती है तो विदेश चले जाते हैं और जब मौत दिखाई पड़ती है तो देश की ओर दौड़ते है


मंदिर मस्जिद करने वालों ने दिल्ली जलाया। दिल्ली जलने के साथ-साथ कई लोगों के अरमान भी जल गए। अब दिल जलाने वाली बीमारी ने इन मजदूरों को शहर से ही जुदा कर दिया। पुलिस तो हमेशा से मजदूरों पर ज़ुल्म घाटी रही हैं। उनकी गाली सुनने की आदत हर बिहारी मजदूरों को हो जाती है। कोरोना का कहर ने न सिर्फ उन्हें बेघर कर दिया है बल्कि उन्हें भूखे सोने पर भी मजबूर कर दिया है...कभी दशरथ मांझी इन्हीं व्यवस्थाओं से लड़ते हुए  पैदल चलकर दिल्ली आये थे, अब उन्हीं के वंशज दिल्ली से गया कि पहाड़ियों और गांवों में वापस लौट रहे हैं। व्यवस्था तब भी मजदूरों का गला घोंट रहा था। दिल्ली को संवारने वाले मजदूरों को दिल्ली ने बेघर कर दिया है।

"इस शहर में मजदूर जैसा दर-बदर कोई नहीं
जिसने बनाये सबके घर उसका कोई घर नहीं"

इनकी जीवन-यात्रा कितनी भयावह है, न व्यवस्था को पता है न ही अट्टालिकाओं में अट्टहास करने हुए रामायण का एपिसोड देखने वालों को।

रामलखन कुमार, शोधार्थी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय


पर्यावरण दिवस पर नन्हें पौधे का दर्द सुनो...


नन्हा हूँ.....एक पौधा हूँ....जरा सुन लो..
आशीष कुमार तिवारी


कल तक मैं ना जानें कहाँ था.....रात में अचानक बहुत तेज़ बारिश हुई। भींगती हुई मिट्टी की जिस्म में बारिश की नमीं पहुंची और उसमे दबा एक बीज आवरण तोड़कर कर अपनी ग्रन्थियों को विकसित करने लगा। जबसे वो आवरण टूटा है तब से मैं खुद को महसूस कर रहा हूँ। अचानक मेरे हाथ पंखों की तरह फैलने लगे। मुझे मज़ा आ रहा था ये जादुई विकास देखकर। भोर तक मैं खुद को पूरी तरह महसूस करने लगा। भोर की ठण्डी-ठण्डी हवा सरक-सरक के मेरे नन्हें हाथों को सहलाने लगी....मैं हंसने लगा.....गुदगुदी होने लगी....तभी एक रौशनी की किरण मेरे ऊपर पड़ी। उस रोशनी से मुझे ऊर्जा मिल रही थी। सब कुछ नया था मेरे लिए। दूर-दूर तक मेरे जैसे कई उस रोशनी में डूबे दिख रहे थे। मैं नई दुनिया में आँखें खोल चुका था।
मैं खुद को अभी महसूस ही कर रहा था कि तबसे एक नन्हा बच्चा डगमग-डगमग चाल भरता हुआ कोमल पैरों से मेरी ओर आता दिखा। उसने मुझे देखा और खिलखिलाकर हंस पड़ा। उसकी हंसी से मैं भी फूटकर हंसने लगा पर मुझे नहीं मालुम कि इसे हंसना कहते हैं। लेकिन इसमें बहुत मज़ा था। हंसने के साथ मैंने महसूस किया कि इससे मैंने अपने सारे अंगों को जैसे जान लिया हो। मुझे अपनी जड़ भी महसूस हुई जो मिट्टी में धँसी थी। बच्चा नजदीक आकर मेरे पास बैठ गया और चिड़िया की सी आवाज़ में चहककर हंसने लगा और उसने मुझे छूने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। मैं बहुत डर गया...मैं जोर से चिल्लाया....बहुत रोया पर वो नहीं मान रहा था। उसने मेरी पत्तियों को जब छुआ तो मैंने खुद को बहुत सिकोड़ लिया पर उसके नरम-नरम हाथों की छुअन मुझे बहुत अच्छी लगी। ये मेरे जीवन में किसी इंसानी स्पर्श का पहला अनुभव था। बच्चा तो मैं भी था। फिर मैंने अपने आप को उसकी छुअन के लिए फैला लिया। उसने मुझे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। बस मुझे छुए जा रहा था और खिलखिलाता जा रहा था। मैंने इंसान पहली बार देखा था और उसकी छुअन पहली बार महसूस किया। मुझे इस धरती से,इंसानों से प्रेम हो गया था। 

पर आज पहली बार मैंने अपनी कच्ची उम्र में ही कुछ ऐसे इंसानों को देखा जिनके हाथ हमारी प्रजातियों की छालों से भी ज्यादा कठोर और खुरदुरे थे, जिनके हाथों में इस्पात का हथियार था। वो दादा को काट रहे थे। दादा के शरीर से खून बह रहा था,दादा चिल्ला रहा था पर वे काटते जा रहे थे। मुझे लगा वो इंसान उस बच्चे से बहुत अलग थे जिनमें हँसी नहीं थी,जिनमे स्पर्श नहीं था। वो दादा के रक्त को इसलिए नहीं समझ पा रहे थे क्योंकि उनका खून इंसानों जैसा लाल नहीं था बल्कि सफेद था। मैं डर गया था इन इंसानों से....कहीं दूर भाग जाना चाहता था पर मुझे ये भी पहली दफा महसूस हुआ कि हम अपनी जड़ें नहीं छोड़ सकते पर इंसान छोड़ चुका है.........अब मेरी भी बारी आएगी....उस बच्चे को याद कर रहा हूँ जिसने मुझे छुआ था। काश वो आ जाता और मुझे हंसा के सारे दुख भुला देता.......इस पर्यावरण दिवस पर मेरे लिए कुछ उपाय कर देता हंसने का, गुदगुदाने का........

चाची तुम जीत गयी अपना अस्तित्व बचाने में....

आशीष कुमार तिवारी
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मैं लगभग पांच साल का रहा हूँगा जब मेरे चाचा कि शादी हुई थी। चाची जी के आने पर हम सभी भाई-बहन बहुत खुश थे। हम लोगों का पूरा दिन उनके आस-पास ही गुजरता था। वो भी हम सब को बड़े दुलार से अपने पास बैठाये रखती थी। यहां तक कि हम लोगों की अक्षर-पहचान शिक्षा भी उन्हीं के द्वारा सिखाई गयी। हालांकि चाची केवल कक्षा आठवीं तक ही पढ़ी थी पर बेसिक शिक्षा उनकी मजबूत थी। हम लोगों को गिनती,पहाड़ा और अंग्रेजी वर्णमाला का ज्ञान उन्हीं के द्वारा मिला। बचपन में बड़ा प्यार मिला था उनका,जो आज भी कभी-कभी याद आ जाता है जब वो हम लोगों से दूर दिल्ली में रह रही हैं।

हमारी चाची खूबसूरत थी और काफी पतली, पर मिज़ाज़ उनके काफी कड़े थे। शायद उनकी यह प्रवृति ही थी। आज से लगभग बीस साल पहले चाची की शादी हुई थी। चाची बताती थी कि शादी से पहले अपने घर उन्होंने दूरदर्शन पर जितनी फ़िल्में आती थीं,लगभग सब देखी थी और उनकी बात सच भी लगती थी क्योंकि जब टीवी पर कोई फ़िल्म आने लगती तो चाची महाभारत के संजय की तरह सारी घटना फ़िल्म के आगे बढने के पहले ही बताने लगती और जब तक फ़िल्म खत्म न हो जाती तब तक वो फ़िल्म के साथ -साथ चलती रहती-" देखो अब ये होगा.....देखो अब वो मारेगा..... देखो अब वो बचाएगा।" इस तरह से सारी फ़िल्म गुजरती। जिसमें हम कुछ न ठीक से देख पाते थे न ही कुछ सुन पाते थे। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि हमारे घर पहली बार टीवी आई थी वो भी चाची के साथ। इसलिए शायद वो हमें टीवी देखना सीखा भी रही थी।

आज सोचता हूँ तो बड़ा आश्चर्य होता है कि जिन दिनों की फ़िल्में देखकर चाची बड़ी हुई थी वो दौर शायद नाइनटीज़ की फिल्मों का था जिनमे रुमानियत, भावुकता, परिवार  और प्रेम पर ही सारी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। पर उनके अंदर की जागरूकता और विद्रोह की प्रवृत्ति को देखकर तो लगता है कि वो अपने दौर की महिलाओं से बहुत आगे की कसौटी थीं। चाची हमारी जुवान की भी बहुत कड़ी थी। शुरुआत में तो मेरी माँ और दादी से अदब से ही बात करती थी पर धीरे -धीरे समय के साथ अदब पीछे हटने लगा। बात चाहे कितनी भी सीधी क्यूँ ना हो, उस पर सही या गलत बीस लाइन जैसे उन्हें बोलना ही था और हर लाइन में किसी फ़िल्म की, किसी घटना या संवाद का रिफरेन्स जरूर आ जाता था जिसे वो अपनी बात की सार्थकता और पुष्टि के लिए जरूरी समझती थी।

कुछ भी था पर चाची तो चाची थी। चाचा हमारे शुरुआत से ही घर के दाने के आदी हो गए। बाहर शहर में जाकर नौकरी करना उन्हें अच्छा न लगता था क्योंकि उन्हें लगता था कि वो बस अधिकारी से कम के लिये बने ही नहीं हैं। इस भ्रम के टूटने पर कई बार उन्हें शहरों में नौकरी के लिए जाना ही पड़ा पर हर बार किसी न किसी का सिर फोड़कर ही वापस आते थे। समय के साथ-साथ खर्च बढते गए और अभावग्रस्तता के चलते वो धीरे-धीरे कुंठित होते गए।

चाची चाहती थी कि वो कहीं बाहर जाएँ और कमाएं क्योंकि उनका कहना था कि,-
" ब्याह के लाये हो तो खर्च उठाने की हिम्मत भी करो.....बच्चे बड़े हो रहे हैं उनके लिए खर्च कौन पूरा करेगा।"
पर चाचा थे कि सब अनसुना कर देते थे और चाची के जिद करने पर उनसे मारपीट भी करते थे। चाची के शरीर में बस प्राण सुरक्षित रखने भर को ही जान थी पर वो अपने अधिकार का हवाला देकर उनसे तब तक लड़ती थी जब तक चाचा थक नहीं जाते थे। चाचा ने चाची की बातों को अनसुना करने का एकमात्र रास्ता चुना कि जब ज्यादा बोले तो जीभर के पीट दो। जब चाचा मारपीट करते तो मेरी माँ,दादी और हम सब भी रोते-रोते चाचा से विनती करते कि बस करिये नही तो मर जायेगी। तब कहीं जाकर वो छोड़ते। बचपन में कुछ ऐसे बर्बर तरीके देखे हैं हम लोगों ने जिससे चाचा उनके साथ मारपीट करते थे जिसको याद करते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हम पूरे परिवार के लोग घण्टों चाची के होश में आने का इन्तज़ार करते पर उनके लिये कोई कुछ कर न सकता।

हमने चाची का जो जागरूक रुप देखा था, वो समय के साथ और प्रखर होने लगा और चाचा पूरी कोशिश के साथ लगे थे उसे खत्म करने में। पर पता नहीं कैसी चिंगारी लेकर वो पैदा हुई थी कि शांत होने का नाम ही नही लेती थी। अभावग्रस्तता के चलते चाची को बड़ी तकलीफ होती थी अपने जीवन को लेकर क्योंकि एक नए समय की महिला जो आधुनिकता की आहट को गंगा के किनारे के कछारी गाँवों से सुन रही थी,उसने कुछ सपने सजा रखे थे,अपना जीवन-स्तर अपने स्वाभिमान के साथ बनाये रखने के बारे में कुछ योजना बना रखी थी ,वो सब ध्वस्त होते जा रहे थे और वो अपनी उस विद्रोही प्रवृत्ति की वजह से उसे नष्ट होता न देख पा रही थी।


चाची ने धीरे -धीरे खुद को समायोजित करना भी शुरू कर दिया था पर बच्चों की जरूरतें उन्हें फिर उकसाती कि वो फिर चाचा से ज़िद करें नौकरी करने के लिए। जब चाची दूसरों के बच्चों को ढंग के कपड़े पहनते देखती तो अपने बच्चों को देखकर रो पड़ती। पापा जब हम भाई बहनों के लिए त्यौहारों पर कपड़े लाते तो चाचा के तीनों बच्चों को भी वैसे ही नए कपड़े लाते पर चाची को ये पसन्द न था कि किसी का दिया हुआ उनके बच्चे पहनें। इसलिये उन्होंने दादी से कहवा के पापा को मना करवा दिया कि कपड़े न लाया करें। इससे पापा बहुत दुखी भी हुए। जब हम नए कपड़े पहनते तो एक बार मन में संकोच जरूर आता कि वो बच्चे क्या सोचेंगे। इसीलिए मैं तो खासकर कभी जल्दी नए कपड़े पहनने में बड़ा दुखी होता था।

चाचा कि हिंसात्मक प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। बात -बात पर मारपीट करने लगे और चाची भी ये अन्याय सहन करने को तैयार न थी । उन्हें लगता था कि जब वो उनके जीवन के किसी काम के नहीं तो फिर उन्हें मारने का क्या हक.....। अब तक मैं इंटर में पहुंच चुका था। आये दिन इतनी मारपीट देखकर मन तो करता था कि चाचा को आज मैं भी पीटूं पर शरीर अभी बचपने जैसी ही थी। कई बार तो चाची बेहद परेशान होकर कहती कि बेटा जाओ आज पुलिस को बुला लाओ। पर चाचा की क्रुरता देखकर हम लोगो की कुछ करने की हिम्मत ही न पड़ती। चाची भी ये कहने के बाद फिर मौन हो जाती। उनकी तकलीफ का दिन आज भी याद है।


आज चाची को अपने बच्चों समेत दिल्ली में अपने भाई के यहां रहते साल भर से ऊपर हो गए हैं। जब चाचा का पागलपन बढ़ता ही जा रहा था, तब चाची समझ चुकी थी कि अब वो कभी-भी उनकी जान ले सकते हैं और असल बात ये है कि पन्द्रह वर्षों से अधिक की हिंसा से अपने आत्मबल को हारता देख उन्होंने घर त्यागने का निर्णय लिया। उनके उस स्वाभिमान की हत्या हो चुकी थी जिसे वो अपनी ताकत मानती थी। ये एक घर भीतर एक औरत की जंग थी जिसे अभावग्रस्तता और हिंसा ने मिलकर उसे जीवन को बचाने के लिए घर छोड़ने पर विवश कर दिया था। उन्होंने जो सपने देखे थे उनको वो जीना भी चाहती थी पर यहां उन सपनों के लिए कोई उम्मीद ,कोई जगह बचा न दिखाई देने पर,उन्हें यहां से जाना पड़ा। आज वो सम्मान से अपने बच्चों को दिल्ली में अच्छे स्कूल में पढ़ा भी रही हैं और खुद का स्वाभिमान बना भी रही हैं। हालांकि चाची काफी गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो गयी थी जिसकी वजह से किसी से उनकी बनती न थी पर चाची के जाने का दुःख मुझे आज भी है। उनकी सहायता में अपनी असमर्थता को आज भी ग्लानि भाव से देखता हूँ पर खुश भी हूँ कि उन्होंने खुद बचा लिया। विजयी हुई तुम चाची।

                        -आशीष कुमार तिवारी

आइये महसूस करिये जिंदगी के ताप को,मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

आशीष कुमार तिवारी
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जिस मोहल्ले में मैं रहता हूँ वह शहर की सबसे निचली बस्ती कही जाती है। जहाँ एक ऐसा तबका रहता है जिसके पास करने को कोई काम नहीं। शहर की भीड़ में उनका इलाका अराजक तत्वों वाले हिस्से के नाम से जाना जाता है। इस मुहल्ले का नौजवान सुबह उठकर सबसे पहले गोलबन्दी करके जुंआ खेलकर दिन की सार्थक शुरुआत करता है जिससे कुछ आमदनी के साथ बोहनी-बट्टा हो। फिर चार लोग इकट्ठा होकर एक-दूसरे की माँ-बहन का ऊँची आवाज़ में जनाज़ा निकालते हैं और शाम एक बोतल शराब के साथ ढलती है। फिर पूरी रात नशे में झगड़े जैसा वातावरण।

इस मुहल्ले में मुझे रहते लगभग तीन साल हो गए। शुरू में आया तो बड़ा अजीब सा लगता ये माहौल। हर घर से भयानक शोर की आवाज और लगभग हर घर की खिड़की के पास एक बड़ा सा साउंड बॉक्स रखा होता था, जिसका मुँह सड़क की ओर होता था। इन साउंड बॉक्सों से सभी घर से अपने-अपने पसंदीदा गानों की झड़ी लगा देते और गाने की टक्कर के बाद साउंड की आवाज़ को लेकर भीषण प्रतिस्पर्धा होती थी। जिसमें वह घर अपने को सामर्थ्यहीन समझता जिसके घर साउण्ड बॉक्स नहीं होता था।

इसी मोहल्ले में आज सुबह ही एक बारात वापस आई जिसमें साथ में दुल्हन भी थी। दुल्हन भी साथ में थी,ये बात इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इसी मुहल्ले से कई और बारातें गयी थी जो किसी तरीके से लौटी तो पर बिना दुल्हन के। छोर्रिया इस मुहल्ले का बड़ा सौभाग्यशाली दूल्हा माना गया क्योंकि बाइज्जत वापस आया था अन्यथा दूल्हे इज्जत वहीं उतरवा के वापस आते थे।

उस मुहल्ले के घरों की दशा ये थी कि मुश्किल से दो कमरे और जुगाड़ू शौचालय की ही व्यवस्था हो पाती थी क्योंकि उससे ज्यादा की न उनकी हैसियत थी और न ही उससे ज्यादा बनाने के लिए ज़मीन। उनके यहां जमीन की ही ज्यादा समस्या और वर्तमान सबसे ज्यादा जरूरत भी है। पूरे मोहल्ले के घरों की यही बनावट और क्षेत्रफल आप पाएंगे। रहने की इतनी किल्लत है इनके घरों में कि तीन-तीन पीढ़ियों के इंसान एक साथ रहने को मजबूर हैं। जिसका नतीजा है कि पर्याप्त स्पेस न बना पाने के कारण इनके बीच आये दिन बात-बात पर झगड़े होते रहते हैं। हर पीढ़ी के लोग अपने अनुकूल घर का माहौल और व्यवस्था चाहते हैं जिसके चलते व्यवस्था तो कुछ नहीं बन पाती,बल्कि पूरा घर और कमरे अस्त-व्यस्त बना रहता है।


मैं दोपहर की धूप से बचने के लिए दोपहर भर सोया और शाम को नींद खुली तो बाहर झाँककर मुहल्ले की तरफ देखा तो कई सारी औरतें मिलकर दुल्हन का स्वागत गीत गा रही थी। छोर्रिया नज़र दौड़ा-दौड़ाकर चारों ओर देख रहा था कि सब देख रहे हैं कि नहीं मेरी दुल्हन जो आई है और सीना फुलाये बिना किसी काम के औरतों से हाल-चाल पूछता- "ओये चाची.......होये चाची।" मुहल्ले की सारी पुरानी औरतें....(पुरानी इसलिए कि नइयों का अभी कोई आगमन सम्भव ही नहीं हो पाता था)....छोर्रिया की फिलिंग को समझ रही थी। इसलिए जरा सा मुस्कुरा देती थी। शाम को ही मैंने देखा कि छोर्रिया मुहल्ले के लड़को को एक-एक पैक पिलाने का वादा कर रहा था। शायद आज जीवन का जरूरी लक्ष्य पूरा हो गया था। बहुत खुश होकर छोर्रिया चारों ओर शादी वाला रंगीन जूता पहनकर और बारात जाने के पहले बुआ द्वारा लगाया गया काजल आज तक लपेटे घूम रहा था।

छोर्रिया के इतनी ख़ुशी के बाद उसके दिमाग में एक समस्या भी चल रही थी कि घर में गुजर कैसे होगी। घर में बड़ा भाई, भाभी,उनके बच्चे और अम्मा बाबू हैं।कमरे दो ही हैं। एक में भैया-भाभी और बच्चे हो जाएंगे....चलो ये ठीक है। फिर एक में मैं और मेरी दुल्हन। उसने ये तो सोच लिया कि किसी तरह हो जाएगा। पर अम्मा-बाबू कहाँ जाएंगे। आज छोर्रिया को गाँव की याद आई कि अगर यही गाँव में होते तो अम्मा-बाबू बाहर किसी मड़ैया में रह लेते लेकिन यहां तो दो कमरे के बाद बाहर सड़क है और उस पार मुहल्ले के दूसरे आदमी का घर। बाहर जाएँ तो लेकिन रहेंगे कहाँ....? आज उसने गाँव की बेचीं गयी जमीनों को भी याद किया होगा जो शहर में रहने के लालच में बेच दी गई थी। आज उसे अपनी जड़ कटी हुई लगी।

शहर में बसने वाले धनिकों और बाहरी बाशिंदों ने शहर की सारी जमीन खरीद ली और सबसे पहले इलाहाबाद के अल्लापुर में बसने वाले छोर्रिया के पूर्वजों की बस्ती सिकुड़ती गई। नतीजा ये है कि आज इस वर्ग के लोग न जमीनें पा रहे हैं और न गाँव वापस ही लौट पा रहे हैं। शायद छोर्रिया के बाद उनके बच्चे शहर से बाहर न कर दिए जांय क्योंकि इतनी घुटन शायद अगली पीढ़ी को तोड़ दे और वे बहचड़िया कहे जाने वाले घुमक्कड़ प्रजातियों में शामिल हो जाँय क्योंकि आने वाले दिनों में जमीन खरीदना इस वर्ग के लोगों के लिए बड़ा ही दुष्कर हो। तमाम विकास की बातों के बावजूद भी इनका अपना कुछ नही होगा क्योंकि जिसके पास जमीन नहीं उसके सर पर अपना छत कभी नहीं हो पायेगा।

फिर इतनी समस्याओं के बाद होना क्या था रात को एक बजे के लगभग छोर्रिया को दस्त की आमद लगी शायद सासू माँ और सालियों ने मिलकर कुछ ज्यादा ही प्यार से खिला दिया था। घर के शौचालय का रास्ता भाभी के कमरे से होकर जाता था। भाभी को ये अच्छा न लगा क्योंकि आज ही तो उनकी सौत या दुश्मन,जो भी कह लें, देवरानी घर आई थी और उन्होंने छोर्रिया को न पेट हल्का करने न जाने दिया। छोर्रिया को दस्त सड़क की नाली के पास करना पड़ा। बस फिर क्या था......हल्का होने के बाद छोर्रिया ने अपनी नई दुल्हन के आते ही अपनी बेज्ज्जती का बदला भाभी से तुरन्त ले लिया। भाभी लेटी रही और वो डंडे से पीटने लगा। मामला मर्दों की सीमा रेखा पार कर गया। फिर क्या था.......भीषण ताडंव, नींद हराम,पुलिस, छोर्रिया का पीटा जाना और हमारी नींद हराम............................

                       -आशीष कुमार तिवारी

Sunday, 27 August 2023

साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है

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