Monday, 28 August 2023

चाची तुम जीत गयी अपना अस्तित्व बचाने में....

आशीष कुमार तिवारी
                              ...........................
मैं लगभग पांच साल का रहा हूँगा जब मेरे चाचा कि शादी हुई थी। चाची जी के आने पर हम सभी भाई-बहन बहुत खुश थे। हम लोगों का पूरा दिन उनके आस-पास ही गुजरता था। वो भी हम सब को बड़े दुलार से अपने पास बैठाये रखती थी। यहां तक कि हम लोगों की अक्षर-पहचान शिक्षा भी उन्हीं के द्वारा सिखाई गयी। हालांकि चाची केवल कक्षा आठवीं तक ही पढ़ी थी पर बेसिक शिक्षा उनकी मजबूत थी। हम लोगों को गिनती,पहाड़ा और अंग्रेजी वर्णमाला का ज्ञान उन्हीं के द्वारा मिला। बचपन में बड़ा प्यार मिला था उनका,जो आज भी कभी-कभी याद आ जाता है जब वो हम लोगों से दूर दिल्ली में रह रही हैं।

हमारी चाची खूबसूरत थी और काफी पतली, पर मिज़ाज़ उनके काफी कड़े थे। शायद उनकी यह प्रवृति ही थी। आज से लगभग बीस साल पहले चाची की शादी हुई थी। चाची बताती थी कि शादी से पहले अपने घर उन्होंने दूरदर्शन पर जितनी फ़िल्में आती थीं,लगभग सब देखी थी और उनकी बात सच भी लगती थी क्योंकि जब टीवी पर कोई फ़िल्म आने लगती तो चाची महाभारत के संजय की तरह सारी घटना फ़िल्म के आगे बढने के पहले ही बताने लगती और जब तक फ़िल्म खत्म न हो जाती तब तक वो फ़िल्म के साथ -साथ चलती रहती-" देखो अब ये होगा.....देखो अब वो मारेगा..... देखो अब वो बचाएगा।" इस तरह से सारी फ़िल्म गुजरती। जिसमें हम कुछ न ठीक से देख पाते थे न ही कुछ सुन पाते थे। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि हमारे घर पहली बार टीवी आई थी वो भी चाची के साथ। इसलिए शायद वो हमें टीवी देखना सीखा भी रही थी।

आज सोचता हूँ तो बड़ा आश्चर्य होता है कि जिन दिनों की फ़िल्में देखकर चाची बड़ी हुई थी वो दौर शायद नाइनटीज़ की फिल्मों का था जिनमे रुमानियत, भावुकता, परिवार  और प्रेम पर ही सारी फ़िल्में दिखाई जाती थीं। पर उनके अंदर की जागरूकता और विद्रोह की प्रवृत्ति को देखकर तो लगता है कि वो अपने दौर की महिलाओं से बहुत आगे की कसौटी थीं। चाची हमारी जुवान की भी बहुत कड़ी थी। शुरुआत में तो मेरी माँ और दादी से अदब से ही बात करती थी पर धीरे -धीरे समय के साथ अदब पीछे हटने लगा। बात चाहे कितनी भी सीधी क्यूँ ना हो, उस पर सही या गलत बीस लाइन जैसे उन्हें बोलना ही था और हर लाइन में किसी फ़िल्म की, किसी घटना या संवाद का रिफरेन्स जरूर आ जाता था जिसे वो अपनी बात की सार्थकता और पुष्टि के लिए जरूरी समझती थी।

कुछ भी था पर चाची तो चाची थी। चाचा हमारे शुरुआत से ही घर के दाने के आदी हो गए। बाहर शहर में जाकर नौकरी करना उन्हें अच्छा न लगता था क्योंकि उन्हें लगता था कि वो बस अधिकारी से कम के लिये बने ही नहीं हैं। इस भ्रम के टूटने पर कई बार उन्हें शहरों में नौकरी के लिए जाना ही पड़ा पर हर बार किसी न किसी का सिर फोड़कर ही वापस आते थे। समय के साथ-साथ खर्च बढते गए और अभावग्रस्तता के चलते वो धीरे-धीरे कुंठित होते गए।

चाची चाहती थी कि वो कहीं बाहर जाएँ और कमाएं क्योंकि उनका कहना था कि,-
" ब्याह के लाये हो तो खर्च उठाने की हिम्मत भी करो.....बच्चे बड़े हो रहे हैं उनके लिए खर्च कौन पूरा करेगा।"
पर चाचा थे कि सब अनसुना कर देते थे और चाची के जिद करने पर उनसे मारपीट भी करते थे। चाची के शरीर में बस प्राण सुरक्षित रखने भर को ही जान थी पर वो अपने अधिकार का हवाला देकर उनसे तब तक लड़ती थी जब तक चाचा थक नहीं जाते थे। चाचा ने चाची की बातों को अनसुना करने का एकमात्र रास्ता चुना कि जब ज्यादा बोले तो जीभर के पीट दो। जब चाचा मारपीट करते तो मेरी माँ,दादी और हम सब भी रोते-रोते चाचा से विनती करते कि बस करिये नही तो मर जायेगी। तब कहीं जाकर वो छोड़ते। बचपन में कुछ ऐसे बर्बर तरीके देखे हैं हम लोगों ने जिससे चाचा उनके साथ मारपीट करते थे जिसको याद करते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हम पूरे परिवार के लोग घण्टों चाची के होश में आने का इन्तज़ार करते पर उनके लिये कोई कुछ कर न सकता।

हमने चाची का जो जागरूक रुप देखा था, वो समय के साथ और प्रखर होने लगा और चाचा पूरी कोशिश के साथ लगे थे उसे खत्म करने में। पर पता नहीं कैसी चिंगारी लेकर वो पैदा हुई थी कि शांत होने का नाम ही नही लेती थी। अभावग्रस्तता के चलते चाची को बड़ी तकलीफ होती थी अपने जीवन को लेकर क्योंकि एक नए समय की महिला जो आधुनिकता की आहट को गंगा के किनारे के कछारी गाँवों से सुन रही थी,उसने कुछ सपने सजा रखे थे,अपना जीवन-स्तर अपने स्वाभिमान के साथ बनाये रखने के बारे में कुछ योजना बना रखी थी ,वो सब ध्वस्त होते जा रहे थे और वो अपनी उस विद्रोही प्रवृत्ति की वजह से उसे नष्ट होता न देख पा रही थी।


चाची ने धीरे -धीरे खुद को समायोजित करना भी शुरू कर दिया था पर बच्चों की जरूरतें उन्हें फिर उकसाती कि वो फिर चाचा से ज़िद करें नौकरी करने के लिए। जब चाची दूसरों के बच्चों को ढंग के कपड़े पहनते देखती तो अपने बच्चों को देखकर रो पड़ती। पापा जब हम भाई बहनों के लिए त्यौहारों पर कपड़े लाते तो चाचा के तीनों बच्चों को भी वैसे ही नए कपड़े लाते पर चाची को ये पसन्द न था कि किसी का दिया हुआ उनके बच्चे पहनें। इसलिये उन्होंने दादी से कहवा के पापा को मना करवा दिया कि कपड़े न लाया करें। इससे पापा बहुत दुखी भी हुए। जब हम नए कपड़े पहनते तो एक बार मन में संकोच जरूर आता कि वो बच्चे क्या सोचेंगे। इसीलिए मैं तो खासकर कभी जल्दी नए कपड़े पहनने में बड़ा दुखी होता था।

चाचा कि हिंसात्मक प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। बात -बात पर मारपीट करने लगे और चाची भी ये अन्याय सहन करने को तैयार न थी । उन्हें लगता था कि जब वो उनके जीवन के किसी काम के नहीं तो फिर उन्हें मारने का क्या हक.....। अब तक मैं इंटर में पहुंच चुका था। आये दिन इतनी मारपीट देखकर मन तो करता था कि चाचा को आज मैं भी पीटूं पर शरीर अभी बचपने जैसी ही थी। कई बार तो चाची बेहद परेशान होकर कहती कि बेटा जाओ आज पुलिस को बुला लाओ। पर चाचा की क्रुरता देखकर हम लोगो की कुछ करने की हिम्मत ही न पड़ती। चाची भी ये कहने के बाद फिर मौन हो जाती। उनकी तकलीफ का दिन आज भी याद है।


आज चाची को अपने बच्चों समेत दिल्ली में अपने भाई के यहां रहते साल भर से ऊपर हो गए हैं। जब चाचा का पागलपन बढ़ता ही जा रहा था, तब चाची समझ चुकी थी कि अब वो कभी-भी उनकी जान ले सकते हैं और असल बात ये है कि पन्द्रह वर्षों से अधिक की हिंसा से अपने आत्मबल को हारता देख उन्होंने घर त्यागने का निर्णय लिया। उनके उस स्वाभिमान की हत्या हो चुकी थी जिसे वो अपनी ताकत मानती थी। ये एक घर भीतर एक औरत की जंग थी जिसे अभावग्रस्तता और हिंसा ने मिलकर उसे जीवन को बचाने के लिए घर छोड़ने पर विवश कर दिया था। उन्होंने जो सपने देखे थे उनको वो जीना भी चाहती थी पर यहां उन सपनों के लिए कोई उम्मीद ,कोई जगह बचा न दिखाई देने पर,उन्हें यहां से जाना पड़ा। आज वो सम्मान से अपने बच्चों को दिल्ली में अच्छे स्कूल में पढ़ा भी रही हैं और खुद का स्वाभिमान बना भी रही हैं। हालांकि चाची काफी गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो गयी थी जिसकी वजह से किसी से उनकी बनती न थी पर चाची के जाने का दुःख मुझे आज भी है। उनकी सहायता में अपनी असमर्थता को आज भी ग्लानि भाव से देखता हूँ पर खुश भी हूँ कि उन्होंने खुद बचा लिया। विजयी हुई तुम चाची।

                        -आशीष कुमार तिवारी

आइये महसूस करिये जिंदगी के ताप को,मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

आशीष कुमार तिवारी
                       ............................
जिस मोहल्ले में मैं रहता हूँ वह शहर की सबसे निचली बस्ती कही जाती है। जहाँ एक ऐसा तबका रहता है जिसके पास करने को कोई काम नहीं। शहर की भीड़ में उनका इलाका अराजक तत्वों वाले हिस्से के नाम से जाना जाता है। इस मुहल्ले का नौजवान सुबह उठकर सबसे पहले गोलबन्दी करके जुंआ खेलकर दिन की सार्थक शुरुआत करता है जिससे कुछ आमदनी के साथ बोहनी-बट्टा हो। फिर चार लोग इकट्ठा होकर एक-दूसरे की माँ-बहन का ऊँची आवाज़ में जनाज़ा निकालते हैं और शाम एक बोतल शराब के साथ ढलती है। फिर पूरी रात नशे में झगड़े जैसा वातावरण।

इस मुहल्ले में मुझे रहते लगभग तीन साल हो गए। शुरू में आया तो बड़ा अजीब सा लगता ये माहौल। हर घर से भयानक शोर की आवाज और लगभग हर घर की खिड़की के पास एक बड़ा सा साउंड बॉक्स रखा होता था, जिसका मुँह सड़क की ओर होता था। इन साउंड बॉक्सों से सभी घर से अपने-अपने पसंदीदा गानों की झड़ी लगा देते और गाने की टक्कर के बाद साउंड की आवाज़ को लेकर भीषण प्रतिस्पर्धा होती थी। जिसमें वह घर अपने को सामर्थ्यहीन समझता जिसके घर साउण्ड बॉक्स नहीं होता था।

इसी मोहल्ले में आज सुबह ही एक बारात वापस आई जिसमें साथ में दुल्हन भी थी। दुल्हन भी साथ में थी,ये बात इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इसी मुहल्ले से कई और बारातें गयी थी जो किसी तरीके से लौटी तो पर बिना दुल्हन के। छोर्रिया इस मुहल्ले का बड़ा सौभाग्यशाली दूल्हा माना गया क्योंकि बाइज्जत वापस आया था अन्यथा दूल्हे इज्जत वहीं उतरवा के वापस आते थे।

उस मुहल्ले के घरों की दशा ये थी कि मुश्किल से दो कमरे और जुगाड़ू शौचालय की ही व्यवस्था हो पाती थी क्योंकि उससे ज्यादा की न उनकी हैसियत थी और न ही उससे ज्यादा बनाने के लिए ज़मीन। उनके यहां जमीन की ही ज्यादा समस्या और वर्तमान सबसे ज्यादा जरूरत भी है। पूरे मोहल्ले के घरों की यही बनावट और क्षेत्रफल आप पाएंगे। रहने की इतनी किल्लत है इनके घरों में कि तीन-तीन पीढ़ियों के इंसान एक साथ रहने को मजबूर हैं। जिसका नतीजा है कि पर्याप्त स्पेस न बना पाने के कारण इनके बीच आये दिन बात-बात पर झगड़े होते रहते हैं। हर पीढ़ी के लोग अपने अनुकूल घर का माहौल और व्यवस्था चाहते हैं जिसके चलते व्यवस्था तो कुछ नहीं बन पाती,बल्कि पूरा घर और कमरे अस्त-व्यस्त बना रहता है।


मैं दोपहर की धूप से बचने के लिए दोपहर भर सोया और शाम को नींद खुली तो बाहर झाँककर मुहल्ले की तरफ देखा तो कई सारी औरतें मिलकर दुल्हन का स्वागत गीत गा रही थी। छोर्रिया नज़र दौड़ा-दौड़ाकर चारों ओर देख रहा था कि सब देख रहे हैं कि नहीं मेरी दुल्हन जो आई है और सीना फुलाये बिना किसी काम के औरतों से हाल-चाल पूछता- "ओये चाची.......होये चाची।" मुहल्ले की सारी पुरानी औरतें....(पुरानी इसलिए कि नइयों का अभी कोई आगमन सम्भव ही नहीं हो पाता था)....छोर्रिया की फिलिंग को समझ रही थी। इसलिए जरा सा मुस्कुरा देती थी। शाम को ही मैंने देखा कि छोर्रिया मुहल्ले के लड़को को एक-एक पैक पिलाने का वादा कर रहा था। शायद आज जीवन का जरूरी लक्ष्य पूरा हो गया था। बहुत खुश होकर छोर्रिया चारों ओर शादी वाला रंगीन जूता पहनकर और बारात जाने के पहले बुआ द्वारा लगाया गया काजल आज तक लपेटे घूम रहा था।

छोर्रिया के इतनी ख़ुशी के बाद उसके दिमाग में एक समस्या भी चल रही थी कि घर में गुजर कैसे होगी। घर में बड़ा भाई, भाभी,उनके बच्चे और अम्मा बाबू हैं।कमरे दो ही हैं। एक में भैया-भाभी और बच्चे हो जाएंगे....चलो ये ठीक है। फिर एक में मैं और मेरी दुल्हन। उसने ये तो सोच लिया कि किसी तरह हो जाएगा। पर अम्मा-बाबू कहाँ जाएंगे। आज छोर्रिया को गाँव की याद आई कि अगर यही गाँव में होते तो अम्मा-बाबू बाहर किसी मड़ैया में रह लेते लेकिन यहां तो दो कमरे के बाद बाहर सड़क है और उस पार मुहल्ले के दूसरे आदमी का घर। बाहर जाएँ तो लेकिन रहेंगे कहाँ....? आज उसने गाँव की बेचीं गयी जमीनों को भी याद किया होगा जो शहर में रहने के लालच में बेच दी गई थी। आज उसे अपनी जड़ कटी हुई लगी।

शहर में बसने वाले धनिकों और बाहरी बाशिंदों ने शहर की सारी जमीन खरीद ली और सबसे पहले इलाहाबाद के अल्लापुर में बसने वाले छोर्रिया के पूर्वजों की बस्ती सिकुड़ती गई। नतीजा ये है कि आज इस वर्ग के लोग न जमीनें पा रहे हैं और न गाँव वापस ही लौट पा रहे हैं। शायद छोर्रिया के बाद उनके बच्चे शहर से बाहर न कर दिए जांय क्योंकि इतनी घुटन शायद अगली पीढ़ी को तोड़ दे और वे बहचड़िया कहे जाने वाले घुमक्कड़ प्रजातियों में शामिल हो जाँय क्योंकि आने वाले दिनों में जमीन खरीदना इस वर्ग के लोगों के लिए बड़ा ही दुष्कर हो। तमाम विकास की बातों के बावजूद भी इनका अपना कुछ नही होगा क्योंकि जिसके पास जमीन नहीं उसके सर पर अपना छत कभी नहीं हो पायेगा।

फिर इतनी समस्याओं के बाद होना क्या था रात को एक बजे के लगभग छोर्रिया को दस्त की आमद लगी शायद सासू माँ और सालियों ने मिलकर कुछ ज्यादा ही प्यार से खिला दिया था। घर के शौचालय का रास्ता भाभी के कमरे से होकर जाता था। भाभी को ये अच्छा न लगा क्योंकि आज ही तो उनकी सौत या दुश्मन,जो भी कह लें, देवरानी घर आई थी और उन्होंने छोर्रिया को न पेट हल्का करने न जाने दिया। छोर्रिया को दस्त सड़क की नाली के पास करना पड़ा। बस फिर क्या था......हल्का होने के बाद छोर्रिया ने अपनी नई दुल्हन के आते ही अपनी बेज्ज्जती का बदला भाभी से तुरन्त ले लिया। भाभी लेटी रही और वो डंडे से पीटने लगा। मामला मर्दों की सीमा रेखा पार कर गया। फिर क्या था.......भीषण ताडंव, नींद हराम,पुलिस, छोर्रिया का पीटा जाना और हमारी नींद हराम............................

                       -आशीष कुमार तिवारी

Sunday, 27 August 2023

साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है

इस निबंध की समीक्षा और व्याख्या के लिए इस यूट्यूब लिंक पर टच करें - 

Wednesday, 17 April 2019

पत्थरों पर पानी के बहाव का निशान
देखकर
सूखी नदी कल्पना में उभर जाती है
बह उठती है नदी स्मृति में
बुरे दिनों में वक्त के गहरे घावों पर
तुम्हारी सहानुभूति और प्यार की स्मृति
मेरे पत्थर मन मे
तुम्हारा चित्र उभर आया है

Monday, 15 January 2018

मजदूर का किला
________________

देश भर में खबर फैल गई कि
किला बनकर तैयार हो चुका है
किले को बनाने में जुटे लाखों हाथ
अपनी धूल झाड़कर
किले के मुख्य द्वार पर कतारबद्ध होकर
तालियां बजा रहे हैं
लाखों हाथों की तालियों की गूंज
आकाश में टकराती हुई
विश्व के कोने-कोने में बसे
इंसानों को न्यौता दे रही हैं
किले की मुँहदेखाई के लिए

लोग घरों से निकलकर
दौड़ पड़े हैं किले की ओर
धीरे-धीरे करोड़ों पाँवों की धमक
एक लय में बदल चुकी है
लयात्मकता में एक भयंकर आवृति से
धरती में भूकम्प जैसी हलचल होने लगी

राजा और सारे मंत्री,सिपहसालार सब
शराब के नशे में झूमकर आनन्द ले रहे थे
अचानक राजा की टोपी सिर से भसक गई
शराब गिलास से छलक कर गिर गई
सभी डगमगाने लगे...
जो लोग धरती पर पाँव टिकाकर
तालियां बजा रहे और
जो लोग पाँव के बल चलकर
किले की ओर आ रहे
वे तैयार हैं
अपने होश में हैं
पर जो महल में बैठे हैं
उनके लिए भयानक भूकम्प प्रतीत हो रहा

दर्शकों का हुजूम देखकर
मजदूरों ने आइये-आइये की मुद्रा में
हाथों से इशारा करते हुए
दौड़ते हुए भीतर की ओर जाने लगे
मानो बेसब्र हैं सारी कला दिखाने को

राजा ने महल की खिड़की से करोड़ों
मनुष्यों को आते देखा तो घबरा गया
राजा हकलाने लगा
रुँआसा हो गया
मानों आज अंत आ गया हो
उसने भागने के लिए प्रबन्ध करने को कहा
हाथ कांपने लगे उसके
तभी उसने देखा कि सारी भीड़
नए बने किले की ओर मुड़ गई
उसे ताज्जुब हुआ
उसने सोचा,इतने से कम मनुष्यों को लेकर
मैं तो राज्य नष्ट कर देता हूँ
नगर उजाड़ देता हूँ
धन-दौलत लूट लेता हूँ
पर ये तो भरे महल को छोड़ कर
ईंट पत्थरों के खाली किले की ओर मुड़ गए
मेरे साथ के मनुष्यों में
और इन मनुष्यों में कितना भेद है
लम्बी सांस लेते हुए वह सोच रहा कि
आज तो इन मनुष्यों ने बख्श दिया
ये किले में जाएँ तो जाएँ
इनसे छेड़खानी कोई न करे बस
क्या पता क्या हो जाय

उधर दर्शक एक-एक कलाकृति को
छूकर,आँखें फैलाकर
देख और महसूस कर रहे
एक दर्शक ने पूछा कि
कैसे इन पत्थरों में फूल उकेरा आपने
तभी एक मजदूर ने
अपनी कला को दिखाने के लिए
ख़ुशी से हड़बड़ाकर
हथौड़े और छेनी से एक पत्थर
पर धार बनाना शुरू किया
जल्दबाजी के वजह से हथौड़े का वार
उसकी ऊँगली पर पड़ गया
वो लहूलुहान हो गया
दर्शक ने तुरन्त मजदूर की उंगली से
निकलते खून को
मुँह लगाकर बन्द करना चाहा
और बोला तुम फिकर न करो
मैं आने वाले हर एक को
तुम्हारे रक्त की इस ललाहट
को इन पत्थरों पर दिखाऊंगा

मजदूर भावुक हो गया
उसके आंसू छलक पड़े
भरी आँखों से उसने दर्शक से कहा
आप मेरे हथौड़े के गलत वार को देखकर
सोच रहे होंगे कि
मैंने इसमें कोई मेहनत नहीं की होगी
पर मेरा यकीन कीजिये
मैंने जी-जान से इसमें अपनी कला उतारी है
दर्शक हाथ उठाकर
उसे यह समझाना चाह रहा कि
वह सब जान रहा
पर मजदूर भावुक मन से
अपने मेहनत की सफाई दे रहा
वो बहते खून की परवाह किये बिना
दर्शक का हाथ पकड़ कर उसे दौड़ाकर
दूसरी दीवार तक ले गया
उसने इशारा करते हुए कहा
"वो देखिये
इन दीवारों पर जो पत्तियों की छितरन
दिखाई पड़ रही है
वो मेरी माँ के आँचल के किनारों
की नकल है
जो मैंने बचपन में
माँ के आँचल में
अपने भीगे चेहरे को पोछते हुए
देखा था.....

Friday, 23 June 2017

माँ के जैसा सोच पाना बहुत कठिन है


● कविता

बच्चा रो रहा है
पैर पटक रहा है
आँखों से आँसू बह रहा है
पर माँ उसका हाथ अपने हाथ में लेकर
बच्चे का बस्ता अपने कन्धे पर लटकाये
निर्दयी होकर स्कूल ले जा रही है

बच्चे को देखकर दया तो बहुत आ रही
पर माँ की नज़र से सोच पाना बड़ा कठिन है
वो जानती है भविष्य के थपेड़ो को
जो इसी बच्चे को आगे बेरोजगार बना देगी
इसलिए उसे मजबूत बनाने के लिए
निष्ठुर बन गयी

बहुत दूर तक देख पा रहा हूँ कि
माँ उसे लेकर चली जा रही है
माँ रुक नहीं रही उस बच्चे के आँसुओं से
माँ उसे पहुंचा आना चाहती है
उस जगह तक
जहां से वो अपना भविष्य बनाने में समर्थ हो सके

माँ के जैसा सोच पाना बड़ा कठिन है....

     आशीष कुमार तिवारी

Thursday, 22 June 2017

मुझे पीड़ा है सरकारों के होने से

आशीष कुमार तिवारी

●कविता

घुटन होती है मुझे
जब सुनता हूँ किसी नेता को 
फलां पदाधिकारी नियुक्त किया जा रहा

दुःखी होता हूँ जब विश्व-शान्ति के लिए
हथियारों की खरीद-फरोख्त से 
सन्तुलन बनाने की कोशिश होती है
और देश के भीतर कोई परिवार
रोटी और मकान के लिए जंग लड़ता है

ये कोई प्रचलित मुहावरा नहीं
बल्कि चिरपरिचित भारत की दशा है

दर्द होता है तब जब नौजवानों की तादात
सड़कों पर निरुद्देश्य 
साँझ-सवेरे हिलती-डुलती दिखाई देती है
जिनमें लाचारी और टूटन के अलावा 
कुछ नहीं है

और इनके बरक्स देश के अधबुढ़ नेता
मरते दम तक रोजगार में बने रहते हैं

टूट जाता हूँ जब सुनता हूँ 
कोई नौजवान सरकारी विचारधारा से
असहमति के कारण गायब कर दिया जाता है
और उसकी माँ उसका सूनापन आँखों में लिए
सरकार से भीख मांगती है उसके पते की

पर सरकार है कि 
उम्मीदों का दिया बुझाने में माहिर है
पर सरकार है कि बस विदेशों से सौदा करती है
न जाने कौन सा सौदा करती है 
जिसका प्रतिफल किसी दूर के गाँव में रहने वाला 
सत्तर सालों में अपने घर से खोजता है
पर कुछ पाता नहीं

समय ऐसा है जिसमें
भैंसा भी इंसान के बैल बनने पर हंसता होगा
तब क्या आप को पीड़ा नहीं होती
मुझे तो पीड़ा होती है सरकारों से....
 




हिंदी साहित्य शॉर्ट नोट्स UGCNET MPPSC UPHESC UGCNET EMRS KVS TGT PGT UK LT, DSSSB, Chandigarh TGT Hindi

💐DSSSB TGT PGT, UK LT, MPPSC UPHESC💐 UGCNET EMRS सभी परीक्षाओं के लिए बेहतरीन नोट्स। साथियों आप सभी के सुविधानुसार हिंदी साहित्य के स्पेशल...