एक नोंक जो चुभ जाती है असत्य और छल की दीवार में, जो एक सुराख़ बना जाती है सत्य के प्रवेश के लिए... हिंदी साहित्य के माध्यम से।
Saturday, 1 June 2024
हिंदी साहित्य शॉर्ट नोट्स UGCNET MPPSC UPHESC UGCNET EMRS KVS TGT PGT UK LT, DSSSB, Chandigarh TGT Hindi
Thursday, 30 November 2023
हिंदी साहित्य प्रैक्टिस सेट - १ BPSC TRE 2.0 UGCNET RPSC MPPSC UPHESC Assistant Professor Hindi sahitya
हिंदी साहित्य क्विज मैराथन 2
हिंदी साहित्य के चुनिंदा प्रश्नों का संग्रह - 2
हिंदी साहित्य के चुनिंदा प्रश्नों का संग्रह - 3
हिंदी साहित्य के चुनिंदा प्रश्नों का संग्रह - 4
हिंदी साहित्य प्रैक्टिस सेट 1
https://youtu.be/K9LPmCkgvvM
हिंदी साहित्य प्रैक्टिस सेट 2
https://youtu.be/K5BXl7o_muI
हिंदी साहित्य प्रैक्टिस सेट 3
https://youtu.be/es4pJdLoY4E
हिंदी साहित्य प्रैक्टिस सेट 4
https://youtu.be/7v3n_qVmSxM
हिंदी साहित्य प्रैक्टिस सेट 5
https://youtu.be/DeCC-8MKoPY
हिंदी साहित्य के - हालावाद
https://youtu.be/42GlDqQZs3o
हिंदी आत्मकथाओं से पूछे जाने वाले प्रश्न
https://youtu.be/Y7qFu0ArDOM
रोज कहानी की समीक्षा - अज्ञेय
https://youtu.be/JHQxWSWG3X8
बातचीत निबंध - बालकृष्ण भट्ट
https://youtu.be/OiVaAkVqUTg
उसने कहा था - गुलेरी
https://youtu.be/PEBsXDo0-VM
अज्ञेय की कहानी - 'रोज' का सारांश
https://youtu.be/yduHvo_Bbcw
अज्ञेय की कविता - 'असाध्य वीणा' का सारांश
https://youtu.be/ENzqBHLcvM4
सुमित्रानंदन पंत से पूछे जाने वाले प्रश्न
https://youtu.be/KaM9nu3BKj8
कवि बिहारीलाल से पूछे जाने वाले प्रश्न
https://youtu.be/5eYJyaunVYA
प्रगतिवाद
https://youtu.be/Il3SSj-BIA0
भक्तिकाल
https://youtu.be/Z28pG3Fgz8M
Friday, 24 November 2023
हिंदी साहित्य प्रैक्टिस सेट BPSC HINDI TEACHER, UGCNET 2023 UPHESC, RPSC ASSISTANT PROFESSOR EXAM
HINDI SAHITYA PRACTICE SET
UGCNET HINDI SAHITYA CLASSES
RPSC ASSISTANT PROFESSOR VACANCY
BPSC HINDI TEACHER 2023
HINDI SAHITYA MCQS
1. 1. जन्मकाल के अनुसार निम्नलिखित कवियों का सही अनुक्रम है –
a. कबीर, नानक, दादू, सुंदरदास
b. नानक, कबीर, सुंदरदास, दादूदयाल
c. कबीर, दादूदयाल, नानक, सुंदरदास
d. नानक, सुंदरदास, कबीर, दादूदयाल
कबीर – 1398, जन्मस्थान – काशी
नानक – 1469, जन्मस्थान – तलवंडी
(लाहौर)
दादूदयाल – 1544, जन्मस्थान
– अहमदाबाद
सुंदरदास – 1596, जन्मस्थान
– राजस्थान
· आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने
किस कवि पर स्वतंत्र रूप से आलोचना नहीं लिखी है – कबीरदास
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने निम्न कवियों पर स्वतंत्र रूप से
आलोचना लिखी –
गोस्वामी तुलसीदास (1923)
जायसी ग्रंथावली (1924)
भ्रमरगीत सार (1925)
· कबीरदास रामानंद की शिष्य परंपरा में आते हैं।
· आचार्य रामचंद्र शुक्ल कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी भाषा
कहा है।
· श्यामसुंदर दास ने कबीर की भाषा को पंचमेल खिचड़ी कहा
है।
· हजारी प्रसाद द्विवेदी इन्हें भाषा के मामले में वाणी का
डिक्टेटर कहते हैं।
· बच्चन सिंह कबीर की भाषा को संतभाषा कहते हैं।
· कबीर की वाणी का संग्रह बीजक नाम से प्रसिद्ध है। इसके
तीन भाग हैं – साखी, सबद, रमैनी।
· कबीर परिचई के लेखक
कौन हैं – अनंतदास
· दादूदयाल के संप्रदाय का नाम ब्रह्म संप्रदाय था। इनके
पंथ का उत्तराधिकारी इनके पुत्र गरीबदास तथा मिस्कीनदास थे।
· दादू के दो प्रसिद्ध शिष्य रजज़्ब और सुंदरदास
थे।
· इनकी रचनाएं – हरडे बानी, अंगवधू, काया बोली।
· गुरु नानक की रचनाएं – जपुजी, आसदीबार, रहिरास, सोहिला।
· गुरु नानक जी सिक्ख संप्रदाय के आदि गुरु थे।
2.
निम्नलिखित में से कौन सा मोहन राकेश का नाटक नहीं
है –
a.
लहरों के
राजहंस
b.
आषाढ़ का एक
दिन
c.
आधे अधूरे
d.
अंधायुग
·
मोहन राकेश
के प्रसिद्ध नाटक –
आषाढ़ का एक दिन – 1958 – ऐतिहासिक नाटक
लहरों के राजहंस – 1963 – ऐतिहासिक नाटक
आधे – अधूरे – 1969 – समकालीन जिंदगी का पहला सार्थक हिंदी नाटक
·
आधे-अधूरे
नाटक को ‘मील पत्थर’ भी कहा जा सकता है।
·
लहरों के
राजहंस नाटक की रचना मोहन राकेश ने अश्वघोष के सौरानंद के आधार पर किया।
·
नई कहानी
के प्रवर्तकों में तीन लोगों का नाम आता
है –
राजेन्द्र यादव
मोहन राकेश
कमलेश्वर
·
अंधायुग (1955)
एक काव्य-नाटक है। इसके लेखक धर्मवीर भारती हैं। अंधायुग महाभारत के अवसान के
बाद की स्थिति का चित्रण है।
·
धर्मवीर भारती
की अन्य रचनाएं –
ठंडा लोहा (1952)
अंधा युग (1955)
कनुप्रिया (1959) – राधा और कृष्ण के प्रेम का वर्णन।
सात गीत वर्ष (1959)
देशान्तर – विदेशी कविताओं का संग्रह।
·
धर्मवीर भारती
मूलतः प्रेम के कवि हैं।
·
भारती जी
की कविता ‘प्रेमथ्यु गाथा’ एक लंबी कविता है।
3.
‘भट्टिनी’
किस उपन्यास की नायिका है –
a.
बाणभट्ट की
आत्मकथा
b.
चित्रलेखा
c.
दिव्या
d.
पुर्ननवा
· बाणभट्ट की आत्मकथा (1946) – हजारी प्रसाद द्विवेदी – उदात्त
प्रेम और सम्राट हर्षकालीन व्यवस्थाओं पर केंद्रित।
· चित्रलेखा (1934) –
भगवती चरण वर्मा – पाप और पुण्य के नैतिक प्रश्नों पर आधारित। इस उपन्यास पर फ्रेंच
उपन्यासकार अनातोले के उपन्यास थाया का प्रभाव माना जाता है।
· दिव्या (1945) – यशपाल – ऐतिहासिक कल्पना पर आधारित।
· पुनर्नवा (1973) – हजारीप्रसाद द्विवेदी
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Saturday, 18 November 2023
हिंदी साहित्य की तैयारी UGC NET Hindi sahitya BPSC hindi Teacher Assistant Professor Exam
Monday, 2 October 2023
UGC-NET DEC 2023 : HINDI SAHITYA SPECIAL NOTES - हिंदी भाषा की संवैधानिक स्थिति BPSC HINDI TEACHER VACENCY 2023
हिंदी भाषा की
संवैधानिक स्थिति
भारत के
संविधान में 14 सितंबर
1949 ई. को हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की गई।
संविधान
के भाग-17 में अनुच्छेद 343-351 तक राजभाषा के विषय में प्रावधान किया गया
है।
इसके
अलावा संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भारतीय भाषाओं को मान्यता प्रदान
किया की गई है।
मूल संविधान की आठवीं अनुसूची में कुछ 14 भाषाएं सम्मिलित थीं। वे निम्न हैं –
असमिया, बंगला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम,
मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू।
v 21वें
संविधान संशोधन अधिनियम, 1967 द्वारा सिन्धी जोड़ी गई
14 + सिन्धी =
15
v 71वें
संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा
15 + कोंकणी +
नेपाली + मणिपुरी = 18
v 92
वें संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा
18 + बोडो + डोंगरी
+ मैथिली + संथाली = 22
Ø अनुच्छेद 343 –
भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी व लिपि देवनागरी होगी। भारतीय अंकों का रूप
अंतर्राष्ट्रीय होगा।
Ø अनुच्छेद 344 –
राष्ट्रपति आरंभिक 5 वर्षों के बाद से प्रत्येक 10 वर्षों पर राजभाषा आयोग का
गठन करेगा। आयोग हिंदी भाषा के आधिकारिक और शासकीय प्रयोजनों में प्रयोग की
सिफारिश करेगा। संघ और राज्य, एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच पत्रादि की भाषा के
रूप में हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित करेगा।
Ø अनुच्छेद 345 – किसी
राज्य का विधान मंडल, विधि द्वारा उस राज्य में प्रयोग की जा रही किसी एक या अधिक
भाषा को, या हिंदी को उस राज्य में शासकीय प्रयोजनों के लिए अंगीकार कर सकता है।
जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक अंग्रेजी का प्रयोग यथावत होता रहेगा।
Ø अनुच्छेद 346 – इस
अनुच्छेद के माध्यम से एक राज्य और दूसरे राज्य के मध्य पत्रादि की भाषा हिंदी हो
सकती है, यदि वे ऐसी माँग करते हों। यह अनुच्छेद इस प्रयोग को मान्यता प्रदान करता
है।
Ø अनुच्छेद 347 –
किसी राज्य की जनसंख्या के किसी भाग की माँग के अनुसार उस भाग द्वारा बोली जाने
वाली भाषा को राज्य की दूसरी भाषा के रूप में मान्यता प्रदान की जा सकती है।
Ø अनुच्छेद 348 – जब
तक संसद को उपबंध न करे, तब तक सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट की सभी कार्यवाहियाँ
अंग्रेजी में होगी। यदि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से
हाईकोर्ट की कार्यवाहियों में हिंदी के प्रयोग को या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों
के लिए प्रयुक्त भाषा के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकता है। लेकिन सारे निर्णय
अनिवार्य रूप से अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं।
Ø अनुच्छेद 349 – राष्ट्रपति
भाषा के संदर्भ में किसी भी विधेयक पर राजभाषा आयोग और भाषा समिति के प्रतिवेदन पर
विचार करेगा, तत्पश्चात यह विधेयक संसद में पेश हो सकेगा। अर्थात राष्ट्रपति के
पूर्वानुमति के बिना भाषा संबंधी कोई विधेयक संसद में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
Ø अनुच्छेद 350 – कोई
व्यक्ति संघ या राज्य के किसी अधिकारी को संघ या राज्य में प्रयोग होने वाली किसी
भी भाषा में अपनी शिकायत के लिए आवेदन करने का अधिकार रखता है।
भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में
शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होगा।
भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के लिए राष्ट्रपति एक अधिकारी
नियुक्त करेगा, जो उनके भाषाई हितों की रक्षा करेगा। उसके निर्देशों को राष्ट्रपति
संसद में रखवाएगा और राज्यों की सरकारों को भेजवाएगा।
Ø अनुच्छेद 351 – संघ
का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार एवं विकास करे। आठवीं अनुसूची में
सम्मिलित सभी भाषाओं की शैलियोव और पदों को आत्मसात करके सामासिक व मिली-जुली
संस्कृति को बढ़ावा दे। मुख्य रूप से संस्कृत और गौण रूप से अन्य भाषाओं के शब्दों
का प्रयोग सुनिश्चित करना।
इसके
अलावा भी संविधान के भाग-5 के अनुच्छेद 120 में संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा
का प्रावधान किया गया है, जिसके अंतर्गत संसद का कार्य अंग्रेजी या हिंदी में किया
जाएगा। इसके अलावा कोई भी संसद सदस्य अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित कर सकता
है।
संविधान
के भाय-6 के अनुच्छेद 210 के अंतर्गत राज्य विधान मंडलों की भाषा के बारे में
प्रावधान है, जिसके अंतर्गत विधान मंडल में राज्य की राजभाषा या हिंदी या अंग्रेजी
में कार्य किया जा सकता है। विधान मंडल का कोई सदस्य अपनी मातृभाषा में संबोधित
करने की अनुमति प्राप्त कर सकता है।
Wednesday, 30 August 2023
शौचालय शास्त्र
घर में कई दिनों से टूटे हुए शौचालय को लेकर झगड़े-बहस चल रहे थे। किसी सदस्य का कहना था कि अबकी बार जो शौचालय बनेगा वो वेस्टर्न कमोड वाला हो,तो किसी का कहना था कि ,‘नहीं-नहीं हमारे भारतीय सभ्यता वाला कमोड ही होना चाहिए क्योंकि इस पर आसानी से पेट साफ़ होता है।’
ऊँचाइयों वाले बौनेपन से दूर : परितोष चक्रवर्ती का काव्य
कवि परिचय-
हिंदी साहित्य समुदाय में परितोष चक्रवर्ती का नाम नया नहीं है, यह भी नहीं कि वे अपनी पहचान स्थापित करने के लिए संघर्षरत हैं, बल्कि वे तो अपनी कविताओं के बल पर अपनी पहचान स्थापित कर चुके हैं। इनका जन्म 7 अप्रैल, 1951 को सक्ति, मध्यप्रदेश में हुआ। इनके प्रथम काव्यसंग्रह ‘अक्षरों की नाव’ का प्रकाशन 1996 में हुआ। पेशे से मूलतः पत्रकार होने के नाते पत्रकारिता में तल्लीनता के चलते इनका दूसरा संग्रह ‘ऊंचाइयों वाला बौनापन’ ग्यारह वर्षों के बाद सन् 2007 में प्रकाशन में आया। परितोष मूलतः कहानीकार के रूप में जानें जाते हैं लेकिन कविता में भी उनकी कलम उतनी ही सधी हुई है। पत्रकार होने के नाते उनके मानस में तमाम घटनाओं और कथाओं की स्मृति संचित रही है, जिसके प्रभाव में उनकी कविताएं भी कथात्मक हो गई हैं। उनकी कविताओं में भी एक प्रखर पत्रकार का तेवर दिखाई पड़ता है। इनके साहित्यिक योगदान की चर्चा में काव्यसंग्रहों के अलावा एक उपन्यास ‘अभिशप्त दाम्पत्य’, एक नाटक ‘मुखौटे’, एक कहानीसंग्रह ‘घर बुनते हुए’ प्रकाशित हुआ। इसके अलावा बांग्ला उपन्यासकार मतिनंदी के तीन उपन्यासों- ‘स्टॉपर’, ‘स्ट्राइकर’ और ‘कोनी’ का अनुवाद किया। परितोष सितंबर 2003 में राष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका ‘लोकायत’ के संस्थापक संपादक रहे हैं, परंतु उन्हें साहित्यिक बिरादरी के कुछ नामचीनों के षड्यंत्र का शिकार होना पड़ा और पत्रिका का मालिकाना हक उनसे छिन गया। वर्तमान में लोकायत के संपादक कहानीकार बलराम हैं। इसी घटना के बाद परितोष ने दिल्ली छोड़ दिया और रायपुर में ‘जनसत्ता’ अखबार के संपादक के रूप में कार्यभार संभाला। वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निवास कर रहे हैं।
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साहित्य में जब गूढ़ शब्दों का प्रयोग बढ़ जाए, तब मनःस्थितियों को व्यक्त कर पाना और पाठकों द्वारा उसे आसानी से समझ पाना दुष्कर हो जाता है। भाषा की गुरुता भावों को दबा देती है। मन व्यथित का व्यथित ही रह जाता है, पर भावों को पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं मिल पाती। वर्तमान दौर की छद्म संस्कृति ने भावों की प्रबलता को उत्तेजना में तब्दील कर दिया है। यही उत्तेजना कविमन में उफनकर उससे सवाल करती है- “भीतर की उत्तेजना ने/उफनकर पूछा/ क्यों लिखते हो तुम”1 ‘ उत्तेजना’ से पैदा हुए सवाल, “क्यों लिखते हो तुम” से कवि उत्तेजित नहीं है, बल्कि वह संयत भाव से अपने भीतर उपजे असंतोष को कविता में अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम है। कवि अपनी आत्मीयता की रक्षा, उत्तेजना से कर सकता है। इस संदर्भ में नामवर सिंह, सुरेन्द्र चौधरी का एक कथन उद्धृत करते हैं, “आज के उत्तेजित वातावरण में कवि की आत्मीयता की रक्षा सबसे जटिल प्रश्न बन गई है। असफल कवि इस आत्मीयता को उत्तेजना की कीमत पर बेच रहा है और नाम युग-संवेदना का दे रहा है। अपना असंतोष उसके लिए रचनात्मक माध्यम उतना नहीं है जितना प्रचारात्मक माध्यम है। वह अपने नैतिक भोंथरेपन को उपचारों से ढाँकने में अपना अपव्यय कर रहा है।”2 कवि परितोष अपनी कविताओं में इस ‘नैतिक भोंथरेपन’ को खुद पर लादते नहीं दिखते, बल्कि वे इसे उतार फेंकना चाहते हैं-
“क्या उत्तर देता ?
इंटरव्यू देता होता
तो
भारी-भरकम ओवरकोट की
भाषा तराशता
सिद्धांत बघारता
या विसंगतियों को रोते हुए
टीवी की दीवानगी से
दांत खुरचकर
खुश हो लेता”3
तब कवि को भाषा के लबादे को उतारकर अपनी व्यथा कहनी पड़ती है। न्याय करना पड़ता है अपनी अंतरात्मा की पीड़ा के साथ मानव द्वारा किए जा रहे अन्याय व अत्याचार को नैतिक मूल्यों ने साधारण अपराध न मानकर चुप्पी साध ली। यह उन नैतिकताओं की सतही सहिष्णुता या सहिष्णु होने का ढोंग कहा जा सकता है, परंतु सारे नैतिक मूल्य तब पूर्णतःअसहिष्णु हो जाते हैं, जब दमित मानव मन की आवाज को अनसुना व उपेक्षित छोड़ दिया जाता है। तब कविता अपने समस्त हथियारों से सुसज्जित होकर उस पीड़ा के कारणों को कोसना व धिक्कारना शुरू कर देती है और कवि ‘अक्षरों की नाव पर’ सवार होकर इन दुखों की नदी को पार करने की कोशिश करता है। लेकिन कवि को सुबह की प्रतीक्षा में रात भर जागी आँखों की तुलना में अपनी अक्षरों की नाव कम अहमियत वाली मालूम होती है।
“क्या उत्तर देता ?
एक अदद सूर्योदय के लिए
अनगिनत आँखें
रात भर जागी हैं
ऐसे में
घुप्प अंधेरे के समुद्र में
अक्षरों की नाव पर
यात्रारत
भला क्या उत्तर देता?”4
जितनी तेजी से आधुनिकता बढ़ रही है,संवेदनहीनता का ग्राफ उसी
अनुपात में बढ़ता जा रहा है। वह कोमल प्रवृत्ति,जिसके होने से मानवीय मूल्य
अस्तित्व में है, जकड़बंदी का शिकार होता जा रहा है। जब संपूर्ण मानवता अपने
अस्तित्व और गरिमा की तलाश में है, तब एक कवि कैसे उन्हें मात्र अक्षरों के माध्यम
से बर्गला सकता है। “भला वह क्या उत्तर देता” यह विवशता की स्थिति को व्यक्त करता
है। लीलाधर जगूडी अपने आत्मवक्तव्य में कहते हैं, “मनुष्यता के मूलभूत गुण और
मानवीय क्रूरताओं के समकालीन अत्याचारों के बीच कोई भी एक तटस्थ लेखक हो ही नहीं
सकता। लेखक कैमरा नहीं है, लेखक एक संवेदनशील आँख है, जिसके पास विचारधारा से पहले
आंसुओं की धारा है। मुझे लगता है, मैं कवि होकर खुद का शिकार कर रहा हूँ और खुद
अपने मनुष्य होने का शिकार हो रहा हूँ”5 । इस स्थिति में
पहुंचा प्रत्येक संघर्षशील मन अपनी पूरी पीढ़ी के आगे निरुत्तर है। परितोष जी ने इस
निरुत्तरता की विवश मनोदशा को अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति प्रदान की है, परंतु
प्रश्न इतना जटिल है कि भाषा की पकड़ से बाहर प्रतीत होता है।
परितोष जी का यह प्रथम काव्यसंग्रह ‘अक्षरों की नाव’
विषयवैविध्य की दृष्टि से, खोटे हुए जीवनमूल्य, टूटते संबंध, सांप्रदायिकता की
त्रासदी, आत्मविरुद्धता और मानवाधिकारों की श्रेणी में या सक्ने वाले सभी बिंदु
समाहित हैं। परमानंद श्रीवास्तव ने उनकी कविताओं के संबंध में कहा, “मध्यमवर्गीय
परिवार और संबंधों में प्रवेश करते हुए परितोष एक ऐसी गाथात्मक कविता लिखते जान
पड़ते हैं, जिसमें स्मृतियाँ एक संसार बनाती हैं और अतीत को वर्तमान में, वर्तमान
को भविष्य में गड्डमड्ड करती हैं। नाम, चेहरे, परछाइयाँ, आँगन, चरित्र एकदूसरे में
विन्यस्त हो जाते हैं”6 ।
हमारे देश और समाज में सांप्रदायिकता की जो आग आज़ादी के ही
दिनों से लगी थी, उसकी लपटों ने आज तक न जाने कितने ही घरों को खाक में मिला दिया।
हिंसा के इस नंगे नाच में जिसकी वीभत्स हत्या हुई, वह थी- मानवता। परितोष ने
मानवता की इस हत्या को अपनी कविता ‘भेड़िये : हमनस्लों के बीच’ में चित्रित किया
है। पहली बार जब भेड़िये बस्ती में आए तो सारी बस्ती सतर्क थी, बकरियाँ भय के मारे
चारों ओर टुकुर-टुकुर ताक रही थीं,गाएं अपने बछड़ों की हिफ़ाजत में रात भर अपलक
ताकतीं रहीं, बच्चे भय के मारे बिना लोरियाँ सुने ही माँ की छाती से दुबककर सो गए।
इस शांत, परंतु चौकस बस्ती को सूंघकर भेड़िये लौट गए। जब भेड़िये पुनः लौटकर आए, तो
उन्होंने देखा कि इंसानों ने ही इंसानों के घर जलाकर राख कर दिया है, हर शरीर पर
धारदार हथियारों के गहरे घाव हैं, तब-
“फिर या गए भेड़िये
जंगल से बाहर
.......
जब आ गए भेड़िये
कोई सहमा नहीं,
भागा भी नहीं कोई
भेड़ियों ने देखा
आदमी की समूची देहसत्ता पर
उनके दांतों से ज्यादा
धारदार हथियारों के दाग,
कड़वाई आँखों में
खतरनाक नाखून की किरचें
पहले से ही शिकार कर गए थे यहाँ
............
जैसे आए थे भेड़िये
वैसे ही लौट गए
खिन्न..उदास..और अनमने...”7
इस कविता को पढ़ते हुए ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई’ फिल्म का
एक संवाद स्मरण आता है जिसमें पुरुषों के वहशीपन शिकार होने से बचने के लिए फिल्म
की नायिका गंगा सड़कों पर भागती हुई जाकर श्मशान घाट में छिप जाती है, जहां लाशें
जलाई जा रही होती हैं। डोम के पूछने पर कि क्या तुम यहाँ की लाशों से डर रही हो,
तब वह मानवीय सभ्यता पाशविकता की छाया तले आकर अपना क्षरण होता देख रही है। जब
मानव की पशुता के आगे पशु की पशुता भी स्तब्ध है तो मानवीय सभ्यता का और अधिक
मूल्यांकन करने में भी मन में असंतोष पैदा होता है। जब जीवन ही मृत्यु बन जाए तो
मृत्यु का कारोबार आसान हो जाता है।
यहाँ प्रश्न यह पैदा होता है कि जब पशु अपनी पशु अपनी पशुता
नहीं छोड़ पाता, तो हम इंसान अपनी इंसानियत कैसे छोड़ रहे हैं? क्या हम इंसानों की
संतानें नहीं हैं, जो अपने मूल्यों की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं? और यदि हम ही हैं
तो कहाँ गई हमारी इंसानियत?
“भेड़िये अगर भेड़िये हैं
तो आदमी, आदमी क्यों नहीं रह सकता!”8
मानव की इस दश को देखकर परितोष जी का कवि, कविता से माफी
माँगता है और उसे अक्षरों की नाव पर बैठाकर बहलाना-फुसलाना नहीं चाहता। कवि
विद्वतापूर्ण भाषा के प्रयोग के माध्यम से कविता को बोझिल नहीं करना चाहता। जिस
तरह से मानव होने की पहली शर्त है- संवेदनशीलता, उसी तरह कविता भी संवेदनशीलता की
प्रबल मांग करती है। शाश्वत मूल्यों से विहीन होकर कविता जहां क्रंदन कर रही है,
वहीं कवि वर्ग को अपने मंचीय प्रतिष्ठा से ही फुर्सत नहीं है। कविता की आंतरिक
अशांति को शांति-समितियों के माध्यम से शांत करने की कवियों द्वारा बचकानी कोशिश
की जा रही है-
“कविता
हमें माफ करना
तुम्हारा क्रंदन
अनसुना कर हमें जाना था
शांति-समितियों की प्रतिष्ठा-बैठक में.....”9
कवियों व लेखकों की इस प्रकार की निष्क्रियता पर व्यंग्य
करते हुए कवि अष्टभुजा शुक्ल अपने काव्यसंग्रह ‘पद-कुपद में लिखते हैं-
“कविजन खोज रहे अमराई।
जनता मरे मिटे या जूझै इनने ख्याति कमाई।”10
संबंध हमेशा ही मानव-जीवन में एक छत्रछाया का आभास कराते
हैं। जब छोटा बच्चा बाहर की दुनिया के अचंभे दृश्य देखता है तो डर के मारे वह माँ
को पुकारते हुए उसके आँचल तले जाकर छिप जाता है। उस वक्त वह स्वयं को सुरक्षित
पाता है और यह सत्य भी है कि माँ सारे दुखों और भ्रांतियों को निर्मूल कर देने की
पूरी कोशिश करती है। बाहरी हिंसात्मक शक्तियों से लड़ने में कवि ने संबंधों के घेरे
में जाकर एक ढाल बनाया है जिसने हिंसा, छल, भय इत्यादि से लड़ने की ताकत दी। यह
सत्य है कि संवेदना में बहुत सुकून मिलता है जिसके आश्रय में आने पर सारे दुख-दर्द
से राहत मिलती है। परितोष जब इन हिंसा-पशुओं से लड़ने के लिए ढाल उठाने जाते हैं तो
सबसे पहले माँ की याद आती है जो हर मुसीबत के वक्त उनका उत्साह बनाए रखती
थी, पर आज वो नहीं मिली-
“मेरी समझ में यह नहीं आया
कि तेज आंधी में
जड़ सहित उखड़े पेड़ को देखकर
माँ!
तुम्हारी याद क्यों आती है”11
जब-जब भाइयों के खेत के गन्ने उनकी लाठियाँ बन गई, तब-तब
कवि परितोष को माँ की याद आती है जो उन गन्नों की गांठों के बीच रस बनकर हमेशा
दौड़ना चाहती थी। जिससे वो गन्ने रसयुक्त ही बनें रहें। रसीले गन्ने सूखकर लाठियाँ
न बन जाएँ। इसलिए माँ हमेशा रस बनकर उन दोनों के बीच संचरित होना चाहती थी। अपनी
‘गन्ना’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं-
“जाने कब लट्ठ बन गए
दोनों भाइयों के गन्ने
और कई-कई गांठों के बीच
रस बनकर रहने को
तरस गई थी माँ”12
तीव्र गति से बदलते मूल्यों के दौर में कवि वर्तमान
समस्याओं का हल संबंधों के सम्मुख खड़ा होकर ढूँढता है। स्त्री को उपभोग की वस्तु
समझकर जिस तरह से उसके प्रति हिंसा व बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं, उसका हल उन्हें
माँ के सम्मुख जाने पर मिलता है। ‘माँ की तरह देखना’ कविता में वे इंसान के भीतर
के रह रहे बलात्कारी कीड़े की परख करते हैं, जिसका बड़ा होते जाना समाज के लिए कैंसर
के समान खतरनाक रोग बन जाता है-
“बस तभी वह
आँखों से उतर
पीठ पर उतर जाता है
जब माँ सामने पड़ जाती है
स्नेह-थपकियाँ माँ की
हमारी पीठ पर
कीड़ों को भी सहला जाती है
उतना ही देर तक
प्रवृत्तियों की साँसे रोक लेता है वह
माँ के जाते ही फिर छा जाता है
सभ्यता को
डँसता रहेगा यह कीड़ा लगातार
जब तक हमें
माँ की तरह देखना
नहीं आ जाएगा”13
कवि परितोष अक्षरों की नाव पर सवार होकर कविता के साथ न्याय
चाहते हैं। उन हजार-हजार आँखों को शब्दों की जुगाली में उलझाना नहीं चाहते, जो
अपने अस्मिता के सूरज को उगता हुआ देखने के लिए रात भर जागते रहे हैं। वे कविता
में मूल्यों की मांग करते हुए दिखाई देते हैं। इस संग्रह में बहुत सारे मानवीय पक्ष
मौजूद हैं,जिन पर व्यापक चिंतन किए जाने की जरूरत है। मूल्यों में इस प्रकार का
स्खलन मानवता के बौनेपन का एहसास कराता है। इन मूल्यों की स्थापना के लिए कवि पाठक
का ध्यान मासूमियत भरे बचपन की ओर ले जाता है, जहां संवेदनाएं अपने विशुद्ध रूप
में संचित है। कवि अपनी कविताओं में बार-बार बचपन का जिक्र करते हैं। इस जिक्र के
पीछे कवि का बचपन के प्रति कोई मोह नहीं, बल्कि बचपन की ओर हमारे इंसानियत के मूल
तत्वों का कोष की ओर इशारा करना है, जिसकी ओर समाज को आकृष्ट करना है। अपनी कविता
‘चलो छूकर आएं’ और ‘शिशु की तरह’ में वे बार-बार शिशुपन व बालपन को खुलकर जीने की
सलाह देते हैं-
“गेंद किसकी
इसकी परवाह बड़ों को है
शिशु बनकर जीने में
खेलना प्रमुख होगा
गेंद की मिल्कियत गौण..
विसंगतियाँ डरती हैं तो सिर्फ उन्हीं से
इसलिए
चलो शिशु के साथ हो लें...”14
‘चलो शिशु के साथ हो लें’ यह पंक्ति शिशुपन से प्रेम को
व्यक्त करती है, दूसरी ओर, कविता के आशय में शिशु के साथ होने का अर्थ संवेदनशीलता
से है। सभी दिखने की होड़ में हमने अपने भीतर की संवेदना को निर्जीव कर दिया।
सभ्यता के भारीपन ने इंसान के जीवन से मौजमस्ती और फक्कड़पन को खत्म करके उसे
अय्याश बना दिया है। इंसान अब जानवरों से भी खतरनाक प्रवृत्ति धारण करने लगा है।
एक कविता में जंगल का राजा शेर इस बात को भलीभाँति समझ चुका है-
“जंगल के राजा को पता है
बदल जाते हैं यहाँ के समीकरण
जब ‘दुनाली’ लिए फनफनाकर आता है
‘जानवरखोर’ आदम”15
अब जानवर की आदमखोरी, इंसान के जानवरखोरी के आगे बौनी पड़ गई
है। तब कविता प्रासंगिक हो उठती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार,
“ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे, त्यों-त्यों
एक ओर कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कविकर्म कठिन होता जाएगा”16 ।
वृत्तियों पर सभ्यता का आवरण चढ़ना नैसर्गिकता के लिए चुनौती है, तो दूसरी ओर ऐसे
में कविता की आवश्यकता का बढ़ते जाना और कविकर्म का कठिन होते जाना विसंगति है।
चुनौती और विसंगति से संघर्ष के दौरान कवि तब असमंजस में पड़ता है, जब पिता की असमय
मृत्यु के बाद बड़े भाई पर दायित्व का भार आ पड़ता है और कवि को लेखनकर्म में संलग्न
देखकर बड़े भाई उन पर क्रोधित नहीं होते, बल्कि चिंतित होते हैं। वे कवि को समझाते
हैं कि मनुष्य की विसंगतियों को लिखकर अकेले कितना बुन पाओगे। बड़े भाई कवि को भूख
की तृप्ति को सबसे पहला धर्म बताते हैं। बड़े भाई की मृत्यु के बाद ‘अतीत की
शवयात्रा’ में वे उन्हें याद करते है-
“तुमने कितनी बार कहा है-
हमारी पहली जरूरत रोटी है
और रोटी फुसफुसे आक्रोश की रेत पर नहीं,
श्रम-सिंचित धरती पर
उगा करती है”17
बड़े भाई की मृत्यु के बाद ‘तर्पण’ के दौरान कवि को लगा जैसे
बड़े भाई उन्हें चेताकर कह रहे हों कि यदि लिखना तुम्हें यदि सच में आश्वस्त करता
हो, तो लिखते रहो। बस याद रखना-
“मनुष्य अपनी ही दुनिया में
टापुओं में अकेला न हो जाय
शब्द-सामर्थ्य स्पर्श का पर्याय बनें
स्पंदन कभी
दरवाजे पर से
लौट न जाए बिना दस्तक
एक अदने याचक की तरह..”18
इन मिटती संवेदनाओं को ज़िंदा रखने और इंसान को इंसानियत के
मूल्यों से लबरेज बनाए रखने के लिए कवि परितोष ‘कांटा’ कविता में कांटे का आह्वान
करते हैं-
“ऐ कांटे, सुन
मुझे चुभ
मरी हुई संवेदनाओं को जगा
......
कई लोग सूखकर कांटा बन गए
पर्याप्त भोजन के बिना
भला बता फिर
कांटे को कांटा क्यों चुभता है?
इन विसंगतियों का हल ढूंढ
आबादी को डँसने वाले को पहचान
ऐ कांटे, सुन”19
तमाम वनस्पतियों, फूलों और वृक्षों में उगे काँटे अपनी चुभन
के माध्यम से इंसान की चेतना को झकझोरते हैं और स्मरण कराते हैं उन तमाम वृक्षों
की पीड़ा, जिन्हें इंसान अपने लोभवश काटने में संकोच नहीं करता। कांटे को अपने तथा
उन तमाम वृक्षों को कटने से बचाने के लिए चुभना पड़ेगा मानव की चेतना में, ताकि वह
समझ सके पेड़ों के अस्तित्व की आवश्यकता को। अपनी कविता ‘ऊंचाइयों वाला बौनापन’ में
वे जंगलों, पेड़ों और नदियों व पहाड़ों के अस्तित्व की आवश्यकता और उनकी महानता के
आगे इंसान की महानता को बौना बताते हैं। एक बूढ़ा वृक्ष, जिसकी जड़ों को छूकर गाँव
की बहु ने अपने वजूद पर आरोपित ‘बांझ’ की संज्ञा को मिटाने की विनती की थी और वह
बूढ़ा वृक्ष उसे संतान का आशीर्वाद देकर भावुक हो गया था, वर्षों पहले इन्हीं
वृक्षों की रक्षा में डटे बंशी गोंड की गर्दन ठेकेदार की टँगिया ने काट दिया था।
उसके सूखे खून के धब्बों की कीमत वर्षों से पलाश का वृक्ष अपने रत्नाभ लाल फूलों
से अदा कर रहा है, उसका काटा जाना अत्यंत पीड़ादायक है। अगर न होते जंगल तो
महाश्वेता देवी को कहाँ से मिलते बिरसा मुंडा, वीरनारायण और प्रवीरचंद जैसे नायक,
कैसे रच पाते रेणु ‘परती परिकथा’ का विन्यास। एक पेड़ का काटा जाना केवल पेड़ का कट
जाना भर नहीं होता, बल्कि हमारे साँसों की रसद पहुंचाने वाली धमनियों का कट जाना
होता है। पर्यावरण के प्रति उनकी सघन सजगता व प्रेम उनकी कविताओं में कवि की भाषा
में-
“हम कब समझेंगे कि
पेड़ और पहाड़ हमें दिलासा देते हैं
नदियां साथ-साथ चलकर जीना सिखाती हैं
गनीमत है कि
हमारी दुष्ट
प्रवृत्तियों कि परवाह नहीं है
उदार प्रकृति को
जो इतना सहकर भी
हमें दुलारती रही है आज तक
कहीं बदतमीजी की
वह एचडी न पार कर लें हम
कि नाराज प्रकृति
पैबंद लगी ओज़ोन की चादर ही उतार फेंके..”20
निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि परितोष चक्रवर्ती के
जैसे तमाम कवियों को साहित्यिक गुटबाजी के कारण भुला दिया जाता है, जिससे उनकी
रचनाओं का जिक्र आलोचकों व समीक्षकों के बीच शून्य है। लेकिन उनकी काव्यात्मक
महत्ता व गुणवत्ता किसी भी ख्यातिप्राप्त, चर्चित बड़े कवि से कम नहीं है। संबंधों
व अपने परिवेश की हर आहट को सजग होकर सुनने और उसे अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले
कवि के रूप में परितोष चक्रवर्ती सदैव का कद कभी बौना न हो पाएगा। बदलते युग के
मूल्यों से बढ़ती अपसंस्कृति का हल वे अपने निकट संबंधों के पास रहकर हासिल करते
हैं। उनके कवित्व की ऊंचाई मूल्यविहीन समय और परिस्थियों के बौनेपन से काफी अधिक
है।
_______________________________
संदर्भ-ग्रंथ-
1. परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई
दिल्ली, 1996, पृ. सं. 70
2. नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, चौथा संस्करण : 1990, पृ.
सं. 204-05
3. परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई
दिल्ली, 1996, पृ. सं. 70
4. वही, पृ. सं., 71
5. लीलाधर जगूडी, कवि-कथन : अपनी भाषा पर संदेह करो, समकालीन भारतीय साहित्य, अंक
: जनवरी-फरवरी 2017, पृ. सं. 26
6. परितोष चक्रवर्ती, भूमिका, ऊंचाइयों वाला बौनापन (कविता-संग्रह), सारांश
प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. सं. 7
7. परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई
दिल्ली, 1996, पृ. सं. 26-27
8. परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई
दिल्ली, 1996, पृ. सं. 32
9. परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई
दिल्ली, 1996, पृ. सं. 20
10. अष्टभुजा शुक्ल, पद-कुपद (कविता-संग्रह), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012,
पृ. सं. 14
11. परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई
दिल्ली, 1996, पृ. सं. 13
12. वही, पृ. सं. 68
13. परितोष चक्रवर्ती, ऊंचाइयों वाला बौनापन (कविता-संग्रह), सारांश प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2007, पृ. सं. 63-64
14. वही, पृ. सं. 49
15. वही, पृ. सं. 21
16. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, चिंतामणि (निबंध-संग्रह), लोकभारती प्रकाशन, संस्करण :
12, 2014, पृ. सं. 84
17. परितोष चक्रवर्ती, अक्षरों की नाव (कविता-संग्रह ), सारांश प्रकाशन, नई
दिल्ली, 1996, पृ. सं. 53-54
18. परितोष चक्रवर्ती,ऊंचाइयों वाला बौनापन (कविता-संग्रह), सारांश प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2007, पृ. सं. 78
19. वही, पृ. सं. 34-35
20. वही, पृ. सं. 24-25
ईमेल : ashish9696994252@gmail.com
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